Monday, 12 March 2012


वाराणसी (एसएनबी)। गंगा तप पर बैठे स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द (पर्यावरणविद् प्रो. जी.डी.अग्रवाल) का तप भंग कराने की पटकथा तो बीती रात ही तैयार कर ली गयी थी। इसे पूरा करने के उद्देश्य से प्रशासनिक अमला लाली घाट पहुंचा भी था। हालांकि उस वक्त उन्हें सफलता नहीं मिली। मगर रात की अधूरी योजना रविवार की सुबह (शेष पेज 15) ‘स्वामी ज्ञानस्वरूपसानन्द ने मुख से कुछ भी ग्रहण नहीं किया है। वे संकल्प पथ पर अब भी अडिग हैं। उन्हें अस्पताल लाने का कदम सरकारी है। इसके लिए स्वामीजी ने खुद से कोई पहल नहीं की है। दिल्ली से दूत आये और उनसे बातचीत भी हुई। जहां तक रहा गंगा को बचाने का संघर्ष तो वो जारी रहेगा।’

-स्वामी अविमुक्तेरानन्द सरस्वती महाराज, श्री विद्या मठ ‘ये उच्चस्तरीय विषय हैं। इस पर फैसला केन्द्र की सुप्रीम अथर्रिटी ही ले सकती है। इस बारे में केन्द्र को अवगत भी करा दिया गया है। इस पर चर्चा होने के बाद ही कोई निर्णय हो सकता है। जहां तक बात स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द जी के स्वास्थ्य की है तो फिलहाल उनका स्वास्थ्य स्थिर है। उनके स्वास्थ्य के लिए सभी चिंतित हैं।’

-रविन्द्र, जिलाधिकारी प्रशासन ने स्वामी ज्ञानस्वरूप को जबरन उठाया, इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया हृदय का बांया हिस्सा बढ़ा अस्पताल में मुख्य चिकित्साधिकार डा. डी. वी. सिंह और डा. एस. जे. वर्मा ने स्वामीजी का स्वास्थ्य परीक्षण किया। डाक्टरों ने बताया कि स्वामीजी का स्वास्थ्य धीरे-धीर सामान्य हो रहा है। हालांकि उन्ह डिहाइड्रेशन है और ईसीजी की रिपरेट में उनके हृदय का बांया भाग बढ़ने की बात सामने आयी है। इसकी वजह स्वामी जी का वयोवृद्ध होना है। तप् स्थल पर गंगा (शेष पेज 15)

कब क्या हुआ

प्रात: 6:30 बजे- प्रशासनिक अमला लाली घाट प्रात: 7:15 बजे- स्वामीजी को लेकर प्रशासनिक अमला अस्पताल रवाना प्रात: 7:30 बजे- अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में स्वामी जी भर्ती शाम तीन बजे-डीएम अस्पताल पहुंचे 3:45 बजे-नेशनल क्लीन गंगा मिशन 20:20 के मिशन निदेशक राजीव शर्मा अस्पताल पहुंचे शाम 4:15 बजे- राजीव शर्मा और स्वामीजी के पहले चरण की वार्ता समाप्त सायं 6:15 बजे-दूसरे चरण की वार्ता


बेहद खफा हैं महंत जी


वाराणसी, सिटी रिपोर्टर : संकटमोचन के महंत प्रो.वीरभद्र मिश्र ने राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण यानी एनजीआरबीए के औचित्य पर सवाल उठाया है। प्राधिकरण के काम-काज से बेहद खफा महंत जी एनजीआरबीए की सदस्यता से इस्तीफा देने का मन बना रहे हैं। ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली संस्था से नाराज मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह, पर्यावरणविद् एमसी मेहता व अनशनरत प्रो.जीडी अग्रवाल ने एनजीआरबीए को पहले ही छोड़ने का मन बना लिया है। भारतीय संस्कृति की जीवन रेखा मां गंगा की निर्मलता व अविरलता के लिए लगभग साढ़े तीन वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन की अध्यक्षता में एनजीआरबीए का गठन किया गया था। एनजीआरबीए के सदस्यों का मानना है कि संस्था अपने उद्देश्यों को पाने में नाकाम रही है। यह संस्था न तो गंगा को उचित सम्मान दिला सकी और न ही उसकी धारा का अविरल प्रवाह ही सुनिश्चित कर पाई। एनजीआरबीए के प्रमुख सदस्य प्रो.वीरभद्र मिश्र ने जागरण से बातचीत में अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण में बेसिन शब्द यानी घाटी जुड़ जाने के कारण संस्था का कार्यक्षेत्र काफी व्यापक हो गया है। यह प्राधिकरण पूरी तरह गंगा पर ही केंद्रित होना चाहिए, जिसका काम सिर्फ और सिर्फ गंगा की निर्मलता व अविरलता को अक्षुण्ण रखना हो यानी गंगा की सेहत सुधारना ही एनजीआरबीए का एकमात्र उद्देश्य होना चाहिए। प्रो.मिश्र ने कहा कि प्रधानमंत्री अपनी व्यस्तता के कारण प्राधिकरण की बैठकों में पूरा समय नहीं दे पा रहे हैं। मैने प्रधानमंत्री से बात करने की कोशिश की, किंतु उनसे संपर्क नहीं हो पाया। यदि उनसे बात नहीं हो पाई तो मैं उन्हें पत्र लिखूंगा और अपनी पीड़ा से अवगत कराऊंगा। महंत जी ने स्पष्ट किया कि फिलहाल उन्होंने एनजीआरबीए की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है, किंतु प्राधिकरण का कामकाज संतोषजनक न होने के कारण दुखी जरूर हूं। प्राधिकरण की सदस्यता छोड़ने के मुद्दे पर अन्य सहयोगियों से वार्ता के बाद निर्णय लूंगा। ज्ञात रहे कि करोड़ों की गंगा एक्शन प्लान की भारी असफलता के बाद सन् 2009 में गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन किया गया था। इस प्राधिकरण में केंद्र सरकार के शहरी विकास, जल संसाधन, पर्यावरण तथा विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्रियों के अलावा गंगा के प्रवाह क्षेत्र में आने वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित कुल 24 सदस्य शामिल हैं।

..और जुड़ती कडि़यां बनने लगीं जंजीर


वाराणसी : स्वामी सानंद की तपस्या के समर्थन में क्रमश: एक-एक कर जुड़ती कडि़यां अभियान के दूसरे ही दिन एक मजबूत कड़ी का रूप लेती नजर आयीं। तपस्या को आंदोलन का रूप देने से परहेज कर रहे संतो के बयानों के बावजूद तपस्या के समर्थन में रविवार को जिस तरह विविध आयोजनों के रूप में प्रतिक्रियाएं सामने आई उनके स्वत:स्फूर्त नागरिक आंदोलन का आकार लेने की संभावनाएं नकारी नहीं जा सकतीं। दंडी स्वामियों ने भी की तपस्या शिव काशी मंच के नेतृत्व में मुमुक्षु भवन के दंडी स्वामियों ने अन्न-जल त्याग कर पूरे दिन तपस्या की। साथ ही धर्म सभा का भी आयोजन किया। धर्म सभा को दंडी स्वामी ईश्वरानंद तीर्थ ने संबोधित किया। कहा गया कि गंगा की निर्मलता-अविरलता हमारा प्रथम लक्ष्य है। इसके लिए प्राण की आहुति देने की जरूरत पड़ी तो पीछे नहीं हटेंगे। इस मौके पर स्वामी रामस्वरूपानंदजी तीर्थ, स्वामी जनकेश्वरानंद तीर्थ, स्वामी देवाश्रम, संजय पाण्डेय, ललित बहादुर सिंह, डॉ. गिरीश तिवारी, पं. नवीन गिरि, पं. आत्माराम दूबे, अरविंद गिरि, अमर पाण्डेय आदि ने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता पं. सुरेश त्रिपाठी ने की। गंगा के लिए संघर्ष का निर्णय गंगा मुक्ति एवं प्रदूषण विरोधी अभियान की बैठक में गंगा मुक्ति के लिए संघर्ष का निर्णय किया गया। साथ ही नगर वासियों से आगे आने का आ ान किया गया। बैठक में कविंद्र तिवारी, त्रिलोचन शर्मा, नंदकुमार, राजेश गौड़, वीरेंद्र कुमार गुप्त, शैलेष कुमार मिश्र, प्रेमशंकर मिश्र, विकासचंद्र आदि ने विचार व्यक्त किये। निकाला मशाल जुलूस-नगर के विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोगों ने स्वामी सानंद की तपस्या के समर्थन में लहुराबीर से कबीरचौरा अस्पताल तक मशाल जुलूस निकाला। जुलूस में वागीशदत्त मिश्र, रमेश चोपड़ा, अल्पनाराय चौधरी, राजेंद्र उपाध्याय, मोहनलाल सरावगी, प्रथमेश पाण्डेय, बृजकिशोर, छेदीलाल वर्मा, डॉ. उपेंद्रविनायक सहस्त्रबुद्धे, रागिनी पाण्डेय आदि ने हिस्सा लिया। पंचकीर्तन जुलूस आज-अखिल भारतीय आध्यात्मिक मंडल की ओर से सोमवार का शाम बेनियाबाग से कबीरचौरा अस्पताल तक पंचकीर्तन जुलूस निकाला जाएगा।

अस्पताल में प्रार्थना


वाराणसी : मां गंगा को बचाने के लिए जल त्यागकर अपना जीवन संकट में डालने वाले स्वामी सानंद के स्वास्थ्य के लिए रविवार को विशाल भारत संस्थान के बच्चों ने कबीरचौरा अस्पताल पहुंचकर ईश्वर से प्रार्थना की। बच्चो के साथ संस्थान के संस्थापक डॉ.राजीव श्रीवास्तव, नजमा परवीन, पूजा भारतवंशी भी स्वामी जी से मिले और उनकी तपस्या में अपनी भगीदारी का संकल्प जताया। सिद्धांत सिंह, ताजीम भारतवंशी, आफरीन भारतवंशी, तौहीद तवरेज, नंदन मिश्रा, धनन्जय यादव, आत्मा प्रकाश सिंह, धर्मेद्र नारायण, नीलेश राय, रियाजुद्दीन अख्तर, गाजी शोएब आदि ने भी प्रार्थना में भाग लिया।

स्वामी सानंद अस्पताल में भी तपस्या पर अडिग


वाराणसी, संवाददाता : गंगा की अविरलता-निर्मलता की मांग को लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद रविवार को तीसरे दिन अस्पताल पहुंचने पर भी अपनी निर्जल तपस्या पर अडिग रहे। उन्हे ड्रिप चढ़ायी जा रही है मगर मुंह से कुछ भी लेने का निवेदन उन्होने दृढ़ता से ठुकरा दिया। सुबह स्थिति बिगड़ने की सूचना पर प्रशासन ने उन्हें तपस्या स्थल से उठा कर कबीरचौरा स्थित राजकीय मंडलीय अस्पताल में भर्ती करा दिया है, जहां उन्हें ड्रिप पर रखा गया है। उधर स्वामी सानंद को तपस्या स्थल से हटाये जाते ही स्वामी गंगा प्रेमी भिक्षु ने तपस्या स्थल की कमान संभाल ली है। स्वामी गंगा प्रेमी भिक्षु ने कहा कि फिलहाल वह जल त्याग तपस्या पर नहीं है लेकिन आंदोलन को धार देने के लिए जैसे ही इसकी जरूरत पड़ेगी वे तक्षण ही जल तज देंगे। दूसरी तरफ स्वामी सानंद की दशा बिगड़ने की सूचना पर नेशनल क्लीन गंगा मिशन, भारत सरकार के डायरेक्टर राजीव शर्मा जिलाधिकारी रवींद्र के साथ अपराह्न चार बजे अस्पताल पहुंचे और स्वामी जी का हाल जाना। साथ ही उनकी मांगों से भी अवगत हुए। हालांकि डायरेक्टर श्री शर्मा और स्वामी जी के बीच अपराह्न चार बजे से सायंकाल सात बजे तक तकरीबन तीन चक्र वार्ता हुई लेकिन कोई सार्थक हल सामने नहीं आया। वैसे श्री शर्मा सोमवार को भी नगर में रहेंगे और स्वामी जी से वार्ता कर समाधान निकालने की कोशिश करेंगे। प्रशासन बल पूर्वक पानी चढ़ा रहा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि गंगा की प्राण रक्षा के लिए प्राण त्यागने का संकल्प अडिग है और यह मांग पूरी होने तक जारी रहेगा। स्पष्ट किया कि ड्रिप चढ़ाने से तपस्या भंग नहीं होती। तपस्या इच्छा शक्ति और निष्ठा से जुड़ी होती है। स्वामी सानंद ने अब तक अपने मुंह से कोई अन्न-जल नहीं लिया। शास्त्रों में कहा गया है कि बल पूर्वक किया गया कार्य न के बराबर होता है। यहां भी प्रशासन बल पूर्वक पानी चढ़ा रहा है। बताया कि शनिवार को ही जिलाधिकारी ने कह दिया था कि स्थिति बिगड़ने पर स्वामीजी को अस्पताल में भर्ती किया जाएगा। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि हमारे सामने एक तरफ गंगा का प्राण है तो दूसरी तरफ भाई का। हमें दोनों को बचाना है लेकिन मां के जीवन रक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि तपस्या का मकसद देश में अशांति पैदा करना कदापि नहीं है। लिहाजा इसे आंदोलन का रूप नहीं दिया जा रहा है। संत समाज मां गंगा की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति को संकल्प बद्ध है। मंत्रालय को अवगत करा दिया नेशनल क्लीन गंगा मिशन के डायरेक्टर राजीव शर्मा ने कहा कि यहां के हालातों की जानकारी पर्यावरण मंत्रालय को दे दी गई है। जल्द ही कोई न कोई समाधान सामने होगा। वह अस्पताल में तपस्यारत स्वामी सानंद से तीन चक्र की वार्ता करने के बाद प्रेस से मुखातिब थे। बताया कि स्वामी जी से बात हुई है। उनकी मांगों को विस्तार से सुना और समझा। हम यहां एक मध्यस्थ की भूमिका में है लिहाजा कोई घोषणा अथवा निर्णय सुनाने की स्थिति में नहीं हैं। इस मसले को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की बैठक में रखना होगा। इस प्राधिकरण से पांच राज्यों के मुख्यमंत्री व वैज्ञानिक, विशेषज्ञ जुड़े हैं। हां, काशी के संतों की बातों को पूरी गंभीरता से ऊपर पहुंचाने की कोशिश मैं जरूर करूंगा। वैसे अभी कल भी नगर में ही रहूंगा और स्वामीजी से एक चक्र और मिलूंगा। उम्मीद है कोई न कोई हल निकल आएगा।

काशी में अनशन, दिल्ली में भूचाल




राजेन्द्र सिंह, रवि चोपड़ा व आरएच सिद्दीकी का एनजीआरबीए से इस्तीफा

नई दिल्ली (एजेंसी)। मैगसेसे पुरस्कार विजेता जल संरक्षण विशेषज्ञ राजेन्द्र सिंह और दो अन्य लोगों ने गंगा नदी के प्रति सरकार की अनदेखी के विरोधस्वरूप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए) से शनिवार को इस्तीफा दे दिया। राजेन्द्र सिंह के साथ गंगा प्राधिकरण के दो अन्य सदस्यों रवि चोपड़ा और आर एच सिद्दिकी ने भी गंगा नदी की सफाई पर जोर देने के लिए पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल के आमरण अनशन के समर्थन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना इस्तीफा भेज दिया। राजेन्द्र सिंह ने कहा कि जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल के साथ हुई बैठक के बाद इस्तीफा भेजा गया। इसमें अग्रवाल के विरोध के विषय में उन्हें अवगत कराया गया। अग्रवाल ने कल घोषणा की थी कि गंगा का स्वच्छ एवं निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए जोर देने के वास्ते वह आमरण अनशन के अंतिम दौर में जल ग्रहण नहीं करेंगे। चोपड़ा देहरादून स्थित पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट में निदेशक है,

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Sunday, 11 March 2012

Protesting negligence, Rajendra Singh, two others quit NGRB

Magsaysay award-winner
‘Wa t e r m a n’ R a j e n d r a
S i ng h and t wo ot he r s on
S a t u r d a y q u i t t h e P r i m e
Minister Manmohan Singhchaired National Ganga River
Basin Authority (NGRBA),
protesting the government’s
“negligence” of the river.
Besides Singh, two other
NGRBA members Ravi Chopra
and RH Siddiqi also submitted
their resignation letters to
Prime Minister Manmohan
Singh expressing solidarity with
noted environmentalist GD
Agrawal who is on “fast-untodeath” to press for cleaning up
the Ganges.
Rajendra Singh told PTI
that the resignations were sent
after their meeting with Water
Resources Minister Pawan
Kumar Bansal during the day
when they apprised him of the
agitation of Agrawal, who is
known as Swami Gyanswaroop
Anand.
Agrawal had on Friday
announced that he will not take
water in the last phase of his
fast-unto-death to press for
uninterrupted clean flow of the
Ganga.
W h i l e C h o p r a i s t h e
Director of Dehradun-based
Pe op l e’s S c i enc e In s t itut e ,
Siddiqi is a former Professor of
Aligarh Muslim University.
“ S w a m i G y a n s w a r o o p
Anand’s demand is respect
river Ganga and ensure clean
and continuous flow of the
river. He has been on agitation
for the last 47 days in Varanasi
on the bank of the Ganga. But
g o v e r n m e n t s e e m s t o b e
neglecting his demand. He
entered his second phase of agitation yesterday declaring he
will not take water. His life is in
danger,” Rajendra Singh said.
He alleged NGRBA was
constituted three and half years
ago and it had met only twice
since its formation. The last
meeting of the Authority was
held one and half years ago, he
said.
“My decision to quit the
panel was conveyed to the
Prime Minister in November
last year,” he said.
Singh said the Ganges “is
dying” and instead of ensuring
its free flow, the government is
giving clearance to construction of more and more dams in
its upstream.
Several Union Ministers
— Fi nanc e , Env i ronment ,
Urban Development, Water
Resources, Power, Science and
Technolgy— and Planning
C om m i s s i o n D e p u t y
Chariman are the ex-officio
members of NGRBA.
Other ex-officio members
include Chief Ministers of
Uttarakhand, Uttar Pradesh,
Bihar, Jharkhand and West
Bengal, the states through
which the river flows.
Besides Rajendra Singh,
Ravi Chopra and RH Siddiqi,
there are six other expert members in the committee including noted environmentalist
Sunita Narain.
Na t i o n a l G a n g a R i v e r
Basin Authority was constituted on February 20, 2009, under
S e c t i o n 3 ( 3 ) o f t h e
Environment (Protection) Act,
1986.
The objective of NGRBA is
to ensure effective control of
pollution and conservation of
the river by adopting a riverbasin approach for comprehensive planning and management.
The Authority has both
regulatory and developmental
functions. The Authority is
also to take measures for effective abatement of pollution
and conservation of the river
Ganga in keeping with sustainable development needs.

काशी में अनशन,

मुझसे ज्यादा गंगा को बचाना जरूरी



अपने संकल्प पर अडिग स्वामी ज्ञानस्वरूपसानन्द

वाराणसी (एसएनबी)। शंकराचार्य घाट पर शनिवार को सुबह से शाम तक प्रशासनिक अधिकारियों का आना-जाना लगा रहा। वजह एक गंगा को बचाने के लिए अन्न,फल और जल का त्याग कर चुके स्वामी ज्ञानस्वरूपसानन्द के गंगा तप तोड़ने के लिए उन्हें मनाना। मगर कामयाबी नहीं मिली। स्वामी ज्ञानस्वरूपसानन्द ने अधिकारियों सहित उनके प्राणों की चिंता करने वाले और इस तप को समर्थन देने वालों से दो टूक कहा- ‘मुझे बचाने के लिए प्रयास न करें। अपनी भावनाओं को गंगा की निर्मलता और अविरलता को अछुण्ण बनाये और बचाये रखने में लगायें। गंगा को बचना सवरेपरी है।’ इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ‘मुझे बचाने की कोशिश में किये गये प्रयास और चिंता तप में बाधा के समान है।’

घाट पर पूर्वाह्न लगभग 11 बजे स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द (पर्यावरणविद् प्रो. जीडी अग्रवाल) से मिलने एसीएम तृतीय भानु प्रताप यादव पहुंचे। उन्होंने स्वामीजी के गिरते स्वास्थ्य से जिलाधिकारी को अवगत कराया। अपराह्न 3:30 बजे एसपी सिटी मानसिंह चौहान और एडीएम प्रशासन रामयज्ञ मिश्र पहुंचे। उन्होंने स्वामीजी को तप तोड़ने के लिए मनाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने। देर शाम जिलाधिकारी रवीन्द्र, डीआईजी राम कुमार, एडीएम प्रशासन रामयज्ञ मिश्र और एसपी सिटी मान सिंह चौहान सहित प्रशासनिक अमला घाट पहुंचा। आलाधिकारियों ने स्वामी ज्ञानस्वरूपसानन्द को तप तोड़ने के लिए मनाने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली और प्रशासनिक अमला वापस लौट गया। इस बारे में अविछिन्न गंगा सेवा तपस्या से जुड़े श्रीविद्या मठ स्वामी अविमुक्तेरानन्द सरस्वती महाराज ने बताया कि प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष प्रमुख पांच मांगें रखी गयीं।

प्रशासन का रुख तो सकारात्मक रहा, लेकिन फौरी तौर पर कुछ भी करने की स्थिति में वो नहीं थे। स्वामी अविमुक्तेरानन्द का कहना है कि इन मांगों से सक्षम व्यक्ति यानि प्रधानमंत्री को अवगत कराया जाये। अगर उनके द्वारा मांगों के बारे सारी जिम्मेदारी जिला प्रशासन को लिखित रूप से दी जाये तो इस पर आगे बात संभव है। अन्यथा संकल्प कायम रहेगा। वहीं, घाट पर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द से मिलने और संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र भी पहुंचे थे। इसके अलावा श्रीविद्या मठ की ब्रrाचारिणी शारदाम्बा, पूर्णाम्बा व ब्रrाचारी ज्योर्तिमयादित्य और बटुक सहित विभिन्न संस्थाओं के सदस्य आदि मौजूद थे।

‘स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द (प्रो. जी.डी.अग्रवाल) की बातों का मैं पूरी तरह समर्थन करता हूं। मेरा मन बहुत दुखी है। इस अनशन का भविष्य बहुत दुखदायी है। ऐसे वैज्ञानिकों को हमें बचाकर रखनी चाहिए। गंगा जी को बचाने के लिए टेक्नोलॉजी का प्रयोग बेहद जरूरी है। मैं स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द के त्याग को नमन करता हूं। उनके जैसा दूसरा कोई नहीं हो सकता। भारत सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता सोचना होगा।’

-महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र, संकट मोचन मंदिर

गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण भी हुआ कागजी!


नई दिल्ली गंगा नदी की सेहत सुधारने के लिए प्रधानमंत्री की नेतृत्व में बने राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का स्वास्थ्य ही विवादों से लड़खड़ाने लगा है। प्राधिकरण को कागजी संस्था बताते हुए मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और जल पुरुष राजेंद्र सिंह सहित तीन सदस्य इस्तीफे की तैयारी कर चुके हैं। इस बीच गंगा के लिए प्रो. जीडी अग्रवाल के आमरण अनशन को लेकर केंद्र सरकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की शनिवार को हुई मुलाकात में भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। दैनिक जागरण से बातचीत में राजेंद्र सिंह का कहना था कि बीते साढ़े तीन साल में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए) अपने उद्देश्य को पाने में नाकाम रहा है। यह संस्था न तो गंगा को उचित राष्ट्रीय सम्मान दिलवा सकी और न ही उसकी धारा का अविरल प्रवाह सुनिश्चित कर पाई। ऐसे में इसका सदस्य बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। सिंह रविवार को औपचारिक ऐलान की तैयारी कर रहे हैं। वहीं देहरादून स्थित पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट के निदेशक रवि चोपड़ा और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राशिद हयात सिद्दीकी भी उनके साथ एनजीआरबीए को विदा कह सकते हैं। संकेत हैं कि एनजीआरबीए के एक अन्य सदस्य व मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पर्यावरणविद एमसी मेहता ने भी संस्था के कामकाज को लेकर उठे असंतोष के सुरों में सुर मिलाया है। इस बीच गंगा के लिए वाराणसी में जारी पर्यावरणविद प्रो. जीडी अग्रवाल के अनशन को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं व केंद्रीय जल संसाधन और संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल की मुलाकात कोई ठोस नतीजा नहीं दे पाई। मुलाकात के बाद राजेंद्र सिंह का कहना था कि बंसल ने उन्हें केवल आश्वासन दिया कि वे इस मामले को उच्च स्तर पर रखेंगे। एनजीआरबीए सदस्यों ने गंगा को लेकर प्रधानमंत्री के रुख पर भी सवालिया निशान लगाए हैं। सिंह का कहना है कि गंगा रक्षा के मुद्दों पर प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रधानमंत्री से शीघ्र बैठक बुलाने का आग्रह करते हुए सदस्यों ने 20 नवंबर 2011 को पत्र लिखा था। लेकिन तीन महीने के इंतजार के बाद न तो इसका कोई जवाब आया और न ही बैठक की कोई तारीख निकली। सदस्यों का कहना है कि गठन के बाद कभी भी एनजीआरबीए की नियमित बैठकें नहीं हुई। साथ ही उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित तो कर दिया, लेकिन यह महज दिखावा ही साबित हो रही है। उल्लेखनीय है कि गंगा एक्शन प्लान की असफलता और करोड़ों रुपये बहाने के बाद 2009 में गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन किया गया था। इसमें केंद्र सरकार के शहरी विकास, जल संसाधन, पर्यावरण तथा विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्रियों के अलावा गंगा प्रवाह क्षेत्र वाले राज्यों के मुख्यमंत्रियों समेत कुल 24 सदस्य हैं।

अप स्ट्रीम की दो नदियों ने मोक्षदायिनी को किया मैला


वाराणसी, संवाददाता : गंगा का पानी अब स्नान की कौन कहे, आचमन योग्य भी नहीं रहा। गंगा की ऐसी दशा से आस्थाएं आहत हो रही हैं। ऐसे में संत समाज इसकी रक्षा के लिए अन्न-जल त्यागने पर विवश हो उठा है। इसके बाद भी ऐसी कोई सूरत नजर नहीं आ रही जो ऐसी स्थिति से निजात दिला सके। गंगा का पानी मैला से काला होता देख इस पवित्र नदी के अविरल-निर्मल होने की रही-सही उम्मीदों पर अब पानी फिरता जा रहा है। साथ ही गंगा को राष्ट्रीय नदी का दिया गया दर्जा और इससे जुड़े अरबों के एक्शन प्लान सिर्फ सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। अब तो गंगा निर्मलीकरण अभियान से जुड़े विशेषज्ञ भी स्वीकारने लगे हैं कि गंगा की दशा काफी चिंताजनक है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के वैज्ञानिक सदस्य व पर्यावरण विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी ने भारत सरकार को पिछले दिनों बाकायदे पत्र लिख कर ताकीद की है कि गंगा की निर्मलता अविरलता खतरे में है। इसके संरक्षण की दिशा में त्वरित व ठोस कदम न उठाए गए तो इसे मैला ढोने वाली नदी में तब्दील होने से नहीं रोका जा सकेगा। प्रो. त्रिपाठी का मानना है कि गंगा की बिगड़ती दशा के पीछे प्रॉपर प्लॉनिंग का अभाव है। बताया कि गंगा का पानी मैला से अब काला होता जा रहा है। यह इस बात का संकेत है कि इसमें पेपर व टेक्सटाइल्स मिलों का केमिकल युक्त पानी अधिक मात्रा में गिराया जा रहा है। प्रवाह के दौरान नदी में जहां-जहां गहराई अधिक होगी वहां पानी कुछ ज्यादा ही काला नजर आएगा। पिछले दिनों करायी गई जांच में पाया गया कि घुलित कार्बनिक पदार्थो के साथ-साथ इसके ठोस भी काफी मात्रा में मौजूद हैं। ये जल जीवों के साथ ही जन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी खतरे की घंटी है। जांच के ही दौरान गंगा के पानी में घुलित आक्सीजन (डीओ) की मात्रा जहां कम से कम छ: मिलीग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए वहीं इसकी मात्रा घट कर एक मिलीग्राम तक जा पहुंची है। इसी तरह बीओडीएल भी मिनिमम तीन मिलीग्राम से बढ़ कर 25 से 35 मिलीग्राम तक पहुंच चुका है। इसके लिए गंगा के अपस्ट्रीम में मिलने वाली उत्तराखंड की दो सहायक नदियों (ढेला व रामगंगा) को सबसे बड़े कारण के रूप में देखा जा रहा है। इन दोनों नदियों में काफी मात्रा में पेपर व टेक्सटाइल मिलों का केमिकल युक्त पानी बिना ट्रीटमेंट किए गिराया जाता हैं। वही पानी अब गंगा को और प्रभावित कर रहा है। दूसरी तरफ माकूल प्रबंध का अभाव और आबादी विस्तार के चलते स्थानीय स्तर पर भी गंगा में मलजल का विस्तार 250 एमएलडी तक जा पहुंचा है। ऊपर से बांध व नहरों के जरिए बेहिसाब जल दोहन से इसके पाट सिकुड़ते जा रहे हैं और नदी छिछली होती जा रही है। चिंता की बात तो यह है कि पानी का स्तर गिरने से प्रदूषकों की मात्रा बढ़ती जा रही है। साथ ही गंगा की पाचन क्षमता भी घटती जा रही है। गंगा शोध व प्रबंधन संस्थान का शुभारंभ अब 26 अप्रैल को गंगा की मजबूत निगहबानी के साथ ही इस पवित्र नदी पर शोध, तकनीकी प्रशिक्षण के मसौदे को 12 मार्च को मूर्तरूप देने की योजना फिलहाल टल गई। यह आयोजन अब 26 अप्रैल को होगा। संस्था के संस्थापक सदस्य प्रो. यूके चौधरी के अनुसार गंगा पर शोध व प्रबंधन के लिए देश के प्रमुख साधु-संतों, विचारकों और विशेषज्ञों के संयुक्त प्रयास से काशी की धरती पर दुर्गाकुण्ड के निकट ब्रंाानंद कालोनी में गठित महामना मालवीय इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी फार गंगा मैनेजमेंट का शुभारंभ 12 मार्च को होना था लेकिन समारोह के कई संतों व विशेषज्ञों की व्यस्तता के चलते तिथि अब आगे बढ़ा दी गई है।

स्वामी सानंद ने ठुकराया मान जाने का अनुरोध


वाराणसी, संवाददाता : गंगा की निर्मलता-अविरलता की मांग को लेकर स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद की निर्जल तपस्या शनिवार को दूसरे दिन भी जारी रही। सुबह से ही सरकारी और गैर सरकारी चिकित्सकों की टीम तपस्या स्थल पर डटी रही और स्वामी जी के स्वास्थ्य का परीक्षण करती रही। बताया गया कि स्वामी जी का स्वास्थ्य फिलहाल ठीक है। वैसे उनके निजी सेवक बीच-बीच में गीले तौलिए से उनके सिर को पोछते रहे। स्वामी सानंद भी जरूरत पड़ने पर ही बोलते दिखे अन्यथा पूरा समय भागवत कथा श्रवण में व्यतीत किया। शनिवार की शाम जिलाधिकारी रवींद्र भी तपस्या स्थल पर पहुंचे और स्वामी जी से तपस्या का संकल्प त्यागने का आग्रह करते हुए कहा कि यह मुद्दा केंद्र सरकार से संदर्भित है लिहाजा तत्काल समाधान संभव नहीं हैं। इसके लिए समय की जरूरत है। कलेक्टर की बात ध्यान से सुनने के बाद स्वामी जी ने उनके आग्रह को अस्वीकार कर दिया। अपना पक्ष रखते हुए स्वामी जी ने कहा कि तपस्या के दो पहलू हैं, एक गंगा का विरोधी पक्ष, दूसरा समर्थक पक्ष। कोई हल तभी सामने आ सकता है जब दोनों पक्ष आमने-सामने बैठें। वैसे तपस्या आमरण अनशन के रूप में नहीं है क्योंकि गंगा ऐसी नदी हैं जो तपस्या से ही इस धरा पर अवतरित हुईं और तपस्वियों ने अपने प्राणों की आहुति भी दी। लिहाजा मां गंगा के लिए प्राण त्यागना हमारे लिए सौभाग्य की बात होगी। स्वामी जी की बात सुनने के बाद कलेक्टर वहां से लौट गये। दूसरी तरफ सुबह से ही नगर के लोगों का शंकराचार्य घाट (केदारघाट) पहुंचने और स्वामी जी का दर्शन करने व समर्थन देने का तांता लगा रहा। वहां पहुंचने वालों में प्रमुख रूप से विश्व गंगाधिकार न्यास के अध्यक्ष रमेश उपाध्याय, महंत वीरभद्र मिश्र सहित डॉ. गोरखनाथ तिवारी, महुआ डे, डॉ. सविता भारद्वाज, डॉ. भाष्करानंद द्विवेदी, रमेश चोपड़ा, प्रो. कौशल किशोर मिश्र, वागीश मिश्र, यतीनंद्र नाथ चतुर्वेदी, महादेवी हंस आदि शामिल थे।

स्वामी ज्ञान स्वरूप का जल त्याग


वाराणसी, प्रतिनिधि : गंगा की अविरलता व निर्मलता को गंगा सेवा अभियान के तहत स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद ने शुक्रवार को जल त्याग तप शुरू कर दिया। लोगों की मनुहार दरकिनार कर संत सानंद ने गंगा स्नान किया और शंकराचार्य घाट पर बनी पुआल की कुटिया में धुनी रमा दी। कहा संकल्प के अनुसार पांच सूत्रीय मांगों के पूरा होने तक आंदोलन जारी रहेगा। सांस टूटी तो अन्य चार संकल्पी बारी बारी से कमान संभालेंगे। तपस्या के लिए उन्होंने मकर संक्रांति से एक दिन पहले 14 जनवरी को गंगा सागर में संकल्प लिया था। प्रयाग माघमेला में 15 जनवरी से अन्न त्याग कर पहले चरण की शुरूआत की थी। साथ ही आठ फरवरी को मातृ सदन हरिद्वार में फल का त्याग कर दिया जो आठ मार्च तक चला। इसके बाद भी मांग न पूरे होने पर स्वामी ज्ञान प्रकाश सवेरे काशी पहुंचे। यहां जुटे संतों ने उन्हें जल त्याग फिलहाल स्थगित करने का अनुरोध किया लेकिन बात नहीं बनी। दोपहर में जल त्याग कर तपस्या शुरू कर दी। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने बताया कि गंगा को राष्ट्रीय प्रतीक के अनुरूप महत्व नहीं दिया गया। इस संबंध में कई मंचों पर मांग उठाने के बाद भी सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती है। ऐसे में यह कदम उठाना पड़ा है। शरीर जाने पर अन्य गंगा भक्त तपस्यारंभ करेंगे। उन्होंने बताया कि गंगा प्राधिकरण का गठन दोषपूर्ण किया गया है। पिछले तीन वर्षों में इसकी सक्रियता भी लगभग शून्य ही है। इसमें गैरसरकारी सदस्यों की अनदेखी की जा रही है। गंगा की अविरलता को बाधित करने वाले बांध बैराज व परियोजनाओं पर विरोध के बाद भी कार्य जारी है। न्यूनतम प्रवाह तो दूर इसमें नालों के जरिए नगरीय व औद्योगिक अवजल उड़ेला जा रहा है। यही नहीं स्वामी निगमानंद की आहुति के बाद भी सरकार के रवैये पर असर नहीं दिख रहा है। जन आंदोलनों को लेकर भी सरकार संवेदनहीन है। इस दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समेत अन्य संत महंत मौजूद थे।

Thursday, 10 November 2011

फ्लोराइड से घिरी वरुणा


वरुणा के जल में प्रदूषण की बात तो आम है लेकिन अब इसके दोनों किनारों पर भूजल में फ्लोराइड का भी आक्रमण हो चुका है। यह इस क्षेत्र में रहने वालों के लिए खतरे की घंटी है। काशी हिंदूविश्वविद्यालय के एक शोध में फ्लोराइड की मौजूदगी के सबूत मिले हैं
अब इस क्षेत्र में फ्लोराइड के और विस्तार का अध्ययन किया जाना है।विवि के रसायन अभियांत्रिकी विभाग के डॉ.पीके मिश्रा के अनुसार इस क्षेत्र में भूजल में फ्लोराइड की मौजूदगी ने चिंतित कर दिया है। संभवत: वरुणा के प्रदूषण और मात्रा में कमी ने फ्लोराइड के प्रसार को बल दिया है। उन्होंने बताया कि वरुणा के दोनों किनारों पर फुलवरिया से सलारपुर के बीच 30 स्थानों से सैंपल लिये गए। लैब में इनकी जांच की गई तो दो मिली ग्राम प्रति लीटर से अधिक के हिसाब से यह फ्लोराइड मिला है। उन्होंने बताया कि लगभग तीन सौ फीट नीचे से पानी का सैंपल लिया गया था। उन्होंने बताया कि कोटवा, फुलवरिया,पुरानापुल, सलारपुर, रुस्तमपुर, लेढ़ूपुर आदि से सैंपल लिये गए थे।
अब इसके विस्तार व कारण की जानकारी के लिए पहल की जाएगी।दूसरी ओर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की स्थानीय शाखा के पदाधिकारी डॉ. अरविंद सिंह कहते हैं कि फ्लोराइड स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। इससे दांत तो खराब होते ही है हड्डियां भी कमजोर हो जाती हैं। रक्त संबंधी बीमारियों की भी आशंका बनी रहती है। यह कैंसर का जनक भी हो सकता है।

वाराणसी: गंगा-वरुणा की तटीय आबादी में पानी का अकाल

वाराणसी। गंगा-वरुणा की तटीय आबादी इस साल गरमी में भीषण जल संकट का सामना करेगी। खिसकते जलस्तर और सूरज के बढ़ते ताप से नदी तटों पर पानी के लिए मारामारी मचने लगी है। शुरुआती गरमी में ही नहाने-धोने की परेशानी सिर उठाने लगी है। पक्के महाल की उंचली सतह वाली सघन बस्तियों में जहां बोरिंग सूखने लगी है, वहीं कुओं में पाइपें बढ़ाने को लोग मजबूर होने लगे। जल संस्थान की टोटियों में पानी न आने से जन जीवन मुश्किल की ओर बढ़ने लगा है। उधर वरुणा के तटीय नक्खी घाट बस्ती में भी पानी का जुगाड़ जी का जंजाल साबित होने लगा है।

भूगर्भ अब जल संचय की दृष्टि से तटीय बाशिंदों का साथ नहीं देने वाला है। वजह है नदियों के प्रवाह का लगातार कम होना। इससे भूगर्भीय जल स्रोत कमजोर हो रहे हैं। गंगा के जल स्तर में कमी का असर जल संकट के रूप में साफ नजर आने लगा है। पिछले साल मार्च की तुलना में इस बार पक्के महाल में १५ से २० फुट तक जल स्तर नीचे चला गया है। इससे कुएं, हैंडपंप और बोरिंग तीनों संसाधन प्रभावित हुए हैं। सिद्धेश्वरी गली, संकठा जी, गढ़वासी टोला, मणिकर्णिका, गौमठ समेत आसपास के इलाकों में अभी से जल संकट की काली छाया मंडराने लगी है।

जल विज्ञानी रमेश चोपड़ा की मानें तो इस बार जिस गति से भू-जल सतह में परिवर्तन आया है, वैसा पहले नहीं देखा गया था। अमूमन मई के बाद ही पक्के महाल में दिक्कत जोर पकड़ती थी लेकिन गंगा की वाटर रिचार्जिंग क्षमता नष्ट होने से जल स्रोत या तो बंद हो रहे हैं या फिर उनमें दबाव नहीं रह गया है। वरुणा के किनारे नक्खी घाट बस्ती में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।

बस्ती के बीच लगा एक हैंडपंप उखाड़ लिया गया है। इससे महिलाओं-बच्चों को दूर के कुएं या टोटी से पानी का जुगाड़ करना पड़ता है। दो हैंडपंपों पर सुबह से शाम तक बाल्टी-डिब्बा भरने के लिए लाइन लगी रहती है। बस्ती की नसीमा बानो, सरस्वती, कलावती, मीरा, लक्ष्मी की मानें तो अगर समय रहते पानी का समुचित इंतजाम नहीं किया गया तो गरमी में गला तर कर पाना मुश्किल हो जाएगा।

आज का यक्ष प्रश्न ?

क्या माननिया बहन जी, वाराणसी को पहचान और नाम देने वाली प्रागतिहासिक नदी वरुण पर भी ध्यान देंगी?

Thursday, 16 June 2011

वाराणसी :जलमार्ग पर तने मकान

कम लोगों को पता होगा कि कभी सारनाथ तक मालवाहक नावें भी चला करती थीं। लंदन के टेम्स नदी सरीखे उस जलमार्ग के किनारे लोगों के आशियाने व आश्रम थे। भगवान बुद्ध की तपोभूमि तक श्रद्धालुओं के पहुंचने के लिए कभी यह प्रमुख मार्ग था। लगभग 17 सौ वर्ष पूर्व गुप्तकाल में सारनाथ से अकथा होते हुए वरुणानदी में मिलने वाले नरोखर रजवाहा जिसे आज लोग नरोखर नाले के रूप में जानते हैं, का उपयोग जलमार्ग के रूप में होता था। आज उसका अस्तित्व खतरे में है। भू माफियाओं से लेकर सरकारी मशीनरी तक ने गुप्तकाल की इस धरोहर का विनाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लगभग 26 सौ वर्ष पूर्व महात्मा बुद्ध सारनाथ आए थे। उनके महाप्रयाण के बाद सम्राट अशोक के समय स्तूप, मंदिर आदि के निर्माण के लिए पत्थरों की आवश्यकता हुई। नावों के जरिए चुनार (मीरजापुर) से पत्थर गंगा नदी के रास्ते बनारस तक पहुंचा। सारनाथ तक उन विशालकाय पत्थरों को पहुंचाने को एकमात्र रास्ता जलमार्ग था। नाव सरायमोहना से वरुणा में नक्खीघाट तक तो पहुंची लेकिन वहां से सारनाथ के लिए कोई रास्ता नहीं था। तब कामगारों ने सलारपुर के पास पुराना ओवरब्रिज के समीप से जलमार्ग तैयार करना शुरू किया। 20 से 35 फीट तक चौड़ा लगभग 15 किलोमीटर लंबा यह जलमार्ग टडि़या, अकथा, तिसरिया, परशुरामपुर, गंज, खजुही होते हुए सारनाथ तक पहुंचा। बाढ़ के दौरान सारनाथ इलाका कहीं डूब न जाए, उस समय की दक्ष इंजीनियरिंग का नमूना पेश करते हुए कामगारों ने 84 बीघे में नरोखर ताल का निर्माण किया और उसे चारों ओर भीटा से घेर कर बांध की शक्ल दी ताकि बढ़ा हुआ पानी वहां इकट्ठा हो सके। बौद्ध धर्म के अनुयायी व वहां रहने वालों के लिए विशालकाय ताल स्नान आदि का प्रमुख स्थल बना। समय का पहिया घूमने के साथ ही नरोखर रजवाहा पर भू माफियाओं ने कब्जा करना शुरू कर दिया। जिसे जहां जगह मिली वहीं ईट से घेरकर अपनी नेमप्लेट लगा ली। आलम यह है कि रजवाहा कहीं दस तो कहीं चार फीट रह गया है। गनीमत है कि उसका कुछ नामोनिशान वन विभाग के डीयर पार्क के चलते अभी बचा है। ऐसा ही कुछ हाल नरोखर ताल का भी है। भीटे पर सरकार ने कछुआ प्रजनन केंद्र व जिला शिक्षा प्रशिक्षण खोल दिया। भू माफियाओं ने ताल की जमीन के साथ भीटे को काटकर दर्जनों बीघे जमीन की प्लाटिंग कर डाली। भू माफियाओं की इस करतूत में नगर निगम व तहसील प्रशासन ने उनका खूब साथ दिया। बीते दस वर्षो के भीतर सैकड़ों मकान ताल, भीटा पर खड़े हो गए। अनुमति के बगैर जगह-जगह पुलिया का निर्माण कर दिया गया। नरोखर ताल में ही वर्तमान में पर्यटन विभाग की ओर से लोटस पार्क बनाने की तैयारी चल रही है। दूसरी ओर चौबेपुर से गंगा नदी से एक पाइपलाइन नरोखर ताल तक लाई जा रही है ताकि वहां एकत्र पानी का शोधन कर पेयजल की सप्लाई की जा सके।

Saturday, 11 June 2011

Celebrating’ Ganga when its offsprings are losing life

GANGA DUSSEHRA (JUNE 11) SPECIAL

Varanasi: Local administration has geared up to celebrate the Ganga Utsav on the occasion of Ganga Dussehra on Saturday, but the condition of its two tributaries in Varanasi — Varuna and Asi— is highly deplorable. While Asi, a river of mythological importance, died silently and people just kept on watching the metamorphosis of a stream of fresh water into a nullah of sewage and wastewater, Varuna— another important river— is on the verge of dying. On the eve of Ganga Dussehra on Friday, TOI tried to take stock of the condition of the Ganga and its two tributaries in Varanasi. While as per the direction of the district administration, the riverbank was cleaned to celebrate the occasion, sewage continued to flow into the Ganga through Asi and Varuna at their confluence. “It is good to hold programmes for public awareness, but just formalities like Ganga Utsav will deliver nothing if its tributaries remain polluted. Asi has already lost its existence while Varuna is just a channel of sewage, gradually moving towards its end,” lamented Surya Bhan, a native of Shivpur area and an active member of ‘Hamari Varuna Abhiyan’, a campaign to save the Varuna. Asi Ghat constitutes the southern end of the city. According to district records, many references about this ghat are found in early literature like Matsypurana, Again Purana, Kurma Purana, Padma Purana and Kashi Khanda. Mythology says Goddess Durga after killing demon Shumbha- Nishumbha had thrown her sword on the ground. A stream of water (Asi) appeared at the place, where the sword had fallen. In Kashi Khand, it is referred to as Asi “Saimbeda Tirtha”, where one gets ‘punaya’ (blessing) of all the Tirthas (religious places) by taking a dip. Celebrated poet Tulsidas authored the epic ‘Ramcharitmanas’ at this very ghat. “What are you talking about? Don’t you see that it is just a drain carrying sewage,” wondered Raghunath, a local native. The Varuna originates from Phulpur in Allahabad district and is an important tributary of the Ganga. It meets the Ganga at Sarai Mohana. Varanasi is situated between the Varuna and Asi. “But, today, Varuna has become one of the most polluted rivers,” said Surya Bhan, adding about 51-52 drains fall into the rivers in the city area. He said “the Save Varuna Movement (Hamari Varuna Abhiyan) is an effort by local people to create awareness for the conservation of the river.”

डॉल्फिन बचेगी तब, अगर . . .

5 अक्टूबर को सम्पन्न गंगा प्राधिकरण की पहली बैठक में जो महत्वपूर्ण निर्णय हुआ वह यह कि गंगा में निवास करनेवाली डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलचर घोषित कर दिया गया. बाघ और मोर के बाद डाल्फिन को राष्ट्रीय महत्व का दर्जा दिया जाना डाल्फिन को उसकी गरिमा तो दिलाता है लेकिन हकीकत यह है कि देश के नदियों के पवित्र जल में निवास करनेवाली डाल्फिन का अस्तित्व खतरे में है. वर्ष 1979 में जहां देश की विभिन्न नदियों में डॉल्फिन की संख्या चार से पांच हजार थी, वहीं अब इनकी संख्या सिमट कर महज दो हजार के लगभग रह गई है।मां गंगा का सवारी समझी जाने वाले जलचर डॉल्फिन का अस्तित्व खतरे में है, इसे संरक्षित करने की कवायद बड़े जोरशोर से शुरू की गई है, नदियों के प्रदूषण ने इसके जीवन को सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है, डॉल्फिन को बचाने की पहल कितनी सार्थक होगी इस पर कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता। दरअसल बाघ और मोर की तरह डॉल्फिन भी कागज की शोभा बनने के कगार पर आ खडी हुई हैं।उत्तर भारत की पांच प्रमुख नदियों यमुना, चंबल, सिंध, क्वारी व पहुज के संगम स्थल ‘पंचनदा’ डॉल्फिन के लिये सबसे खास पर्यावास समझा जा रहा है। क्योंकि यहां पर एक साथ 16 से अधिक डॉल्फिनों को एक समय में एक साथ पर्यावरण विशेषज्ञों ने देखा, तभी से देश के प्राणी वैज्ञानिक पंचनदा को डाल्फिनों के लिये संरक्षित स्थल घोषित करने का मांग कर रहे थे। फलस्वरुप बाघ और मोर के बाद डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव का दर्जा प्रदान करके डॉल्फिन को बचाने की दिशा में केन्द्र सरकार ने एक अहम कदम उठाया है। पूरे देश में करीब 2000 डॉल्फिन इस वक्त आंकी जा रही है।गंगा और इसकी सहायक नदियों में डॉल्फिन पाई जाती हैं। वन्य जीवों के संरक्षण की दिशा मे काम कर रही देश की एक बडी पर्यावरणीय संस्था डब्लूडब्लूएफ के 2008 के सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश में चंबल नदी में 78,यमुना नदी में 47,बेतवा नदी में 5,केन नदी में 10,सोन नदी में 9,गंगा में 35 और घाघरा नदी में सबसे अधिक 295 डॉल्फिनों को रिकार्ड किया गया। इसके अलावा पूरे देश में डालफिन गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना के भारत, नेपाल और बंग्लादेश तक पाई जाती हैं।डॉल्फिन स्तनघारी जीव हैं जो मीठे पानी में रहने के कारण मछली होने को भ्रम पैदा करती है, सामान्यत इसे लोग सूंस के नाम से पुकारते है, इसमें देखने की क्षमता नहीं होती हैं लेकिन सोनार यानी घ्वनि प्रक्रिया बेहद तीब्र होती हैं, जिसके बलबूते खतरे को समझती है। मादा डॉल्फिन 2.70 मीटर और वजन 100 से 150 किलो तक होता है, नर छोटा होता है, प्रजनन समय जनवरी से जून तक रहता है। यह एक बार में सिर्फ एक बच्चे को जन्म देती है। डॉल्फिन बचाने की कवायदडॉल्फिन को बचाने की दिशा में सबसे पहला कदम 1979 में चंबल नदी में राष्ट्रीय सेंचुरी बना कर किया गया। डॉल्फिन को वन्य जीव प्राणी संरक्षण अघिनियम 1972 में शामिल किया गया। 1991 में बिहार के विक्रमशिला में गंगा नदी के सुल्तानगंज से लेकर पहलगांव तक ‘गैंगटिक रिवर डॉल्फिन संरक्षित क्षेत्र’ बना कर किया गया है।इनकी सबसे बड़ी खासियत है कि नदियों के संगम स्थलों पर सबसे अधिक डॉल्फिन नजर आती हैं। यही एक कारण है कि उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में पंचनदा पर वर्ष 2000 में एक साथ 16 डॉल्फिन देखी गयीं। 1982 में देश की सभी नदियों में डॉल्फिनों की संख्या 4000 से लेकर 5000 के बीच आंकी गयी थी,जो अब सिमट कर 2000 के करीब रह गई है। हर साल एक अनुमान के मुताबिक 100 डॉल्फिन विभिन्न तरीके से मौत की शिकार हो जाती हैं, इनमें मुख्यतया मछली के शिकार के दौरान जाल में फंसने से होती है, कुछ को तस्कर लोग डॉल्फिन का तेल निकालने के इरादे से मार डालते हैं। दूसरा कारण नदियों का उथला होना यानी प्राकृतिक वास स्थलों का नष्ट होना,नदियों में प्रदूषण होना और नदियों में बन रहे बांध भी इनके आने-जाने को प्रभावित करते हैं।डॉल्फिन ऐसा जलचर जीव है, जिसका अस्तित्व खतरे में है। पिछले डेढ़ दशक से इनकी संख्या में पचास फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। डाल्फिन को बचाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहल करते हुए इसे राष्ट्रीय जलीय जीव तो घोषित कर दिया है, परंतु जिस प्रकार से देश की नदियों में कारखानों का कचरा गिर रहा है, उससे ऐसा लगता है कि जलीय जीव कहीं किताबों का ही हिस्सा न बन जाएं।कहना न होगा कि डॉल्फिन के अस्तित्व को बचाने के लिए जिस प्रकार से प्रधानमंत्री ने पहल की है यदि जलीय जीव प्राणी को बचाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे तो इस मनमोहक जीव को बचाया जा सकता है। आंकड़े बताते हैं कि देश में गंगा, घाघरा, गिरवा, चंबल, बृह्मपुत्र सहित गंगा की सहायक नदियों में डॉल्फिन पाईं जातीं हैं। आंकड़े गवाह है कि प्रतिवर्ष तकरीबन एक सैकड़ा से अधिक डॉल्फिन की मौत विभिन्न कारणों से हो रही है जो पर्यावरणविदों के लिए चिंता का सबब बनी हुई है।अवैध शिकार भी डॉल्फिन की संख्या में लगातार गिरावट ला रहा है। अवैध शिकार की वजह है कि डॉल्फिन के शिकर से इसके जिस्म से निकलने वाले तेल को मर्दानगी बढ़ाने एवं हडि्डयों को मजबूत करने के लिए प्रयोग किया जाता है। यही कारण है कि इसके तेल की बाजार में कीमतें भी अधिक होती हैं। इसलिए शिकारियों की नजरों में डॉल्फिन एक धन कमाने का जरिया बन चुकी है।वर्ष 2008 में डॉल्फिन के किए गए अध्ययन से खुलासा होता है कि सबसे अधिक डॉल्फिन घाघरा में पाईं गईं जिनकी संख्या 295 थी और इसके बाद चंबल में 78 थी। जबकि गंगा में 35, यमुना में 47, बेतवा में 5, केन में 10, सोन नदी में 9 डॉल्फिन पाईं गईं थीं। ये आंकड़े सिर्फ उत्तर प्रदेश से गुजरने वाली नदियों के हैं जबकि डॉल्फिन भारत के अतिरिक्त नेपाल और बांग्लादेश की नदियों में भी पाई जातीं हैं।डाल्फिन को बचाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहल करते हुए इसे राष्ट्रीय जलीय जीव तो घोषित कर दिया है, परंतु जिस प्रकार से देश की नदियों में कारखानों का कचरा गिर रहा है, उससे ऐसा लगता है कि जलीय जीव कहीं किताबों का ही हिस्सा न बन जाएं।डॉल्फिन की संख्या में दिनों दिन आ रही कमी से जलीय जीव विशेषज्ञ चिंतित हो रहे हैं। हालांकि प्रधानमंत्री की पहल के बाद इन विशेषज्ञों में उत्साह आया है परंतु इन्हें बचा पाना कितना आसान होगा, इसका जबाब शायद किसी के पास नहीं है। प्रख्यात जलीय जीव विशेषज्ञ सोसायटी फॉर कन्जरवेशन ऑफ नेचर के डॉ. राजीव चौहान डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किए जाने से बेशक उत्साहित हैं। परंतु वे कहते हैं कि डॉल्फिन को बचाने के लिए सभी को पहल करनी होगी। वे डॉल्फिन के बारे में जानकारी देते हुए बताते हैं कि डॉल्फिन शुड्यूल वन प्रजाति का जलीय जीव है जो पूरी तरह से नेत्रहीन है। यह जीव किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता है बल्कि मानव के साथ मित्रवत संबंध बनाने को आतुर रहता है। उनकी मांग है कि पंचनदा को डालफिन के संरक्षण केन्द्र हो सकता है। डॉल्फिन का शिकार दंडनीय अपराध है। शिकार करते हुए पकड़े जाने पर आरोपी को छ: साल के कारावास तथा पचास हजार रुपये जुर्माना का प्रावधान है। सामाजिक वानिकी प्रभाग के प्रभागीय निदेशक सुदर्शन सिंह बताते हैं कि डॉल्फिन के अस्तित्व पर सबसे बड़ा संकट प्रदूषित पानी ने डाला है। वे बताते हैं कि डॉल्फिन पानी से निकल कर पांच मिनट में खुले में सांस लेती है और फिर आठ घंटे तक यह गहरे पानी में चली जाती है और आसानी से पानी के अंदर सांस लेती रहती है। सांस लेने के लिए जब यह पानी से उछाल लेती है तो इसका उछाल देखने लायक होता है। प्रदूषित, उथली और मर रही नदियों को बचाए बिना डॉल्फिन कैसे बचेगी, पता नहीं।