Tuesday, 12 April 2011

डॉ.नरेन्द्र कोहली
175, वैशाली, पीतमपुरा, दिल्लीक 110034 फोन : 91-11-27312605, 27315197 अणुमेल : narendra@narendrakohli.org

प्रिय व्योेमेश जी,
आपका संदेश मिला। सूर्यभान ने जीवट का काम किया है। यह प्रसन्नदता का विषय है कि हमारी युवा पीढ़ी अपनी संस्कृपति की रक्षा के लिए दत्तनचित्ता है। देश का भूगोल हमारी संस्कृतति का महत्वदपूर्ण अंग है। उसकी रक्षा, उसकी स्वतच्छाता की रक्षा, संस्कृीति की रक्षा है। दार्शनिक और आध्या्त्मिक दृष्टि से भी हमारी यह मान्य ता है कि ब्रह्म ने ही स्वकयं अपने आप को प्रकृति के रूप में प्रकट किया है। स्वायमी विवेकानन्दह ने कहा था, इट इज़ नॉट क्रियेशन, इट इज़ प्रोजेक्श।न। प्रकृति ब्रह्म से भिन्न् नहीं है। इसलिए गंगा और वरुणा उस ब्रह्म का ही प्रकटीकृत रूप हैं। उनकी पूजा कर हम ब्रह्म की ही आराघना करते हैं और प्रकृति की पूजा उसकी स्वीच्छबता की रक्षा कर ही की जातीहै।
मैं आज तक यह समझ नहीं पाया कि वे लोग, जो सारे महानगरों का मल स्व च्छ सरिताओं में मिलाने की योजनाएं बनाते हैं, जो गंदे नालों को पीने के स्वहच्छछ जल में मिला कर उसे विष में परिणत कर देते हैं, वे स्वकयं को अभियन्ताह, वास्तुेश्रिल्पीि और नगरनिर्माता कहने का साहस कैसे करते हैं। कैसे हमारी शैक्षिक संस्थासएं उनको वे उपाधियों देती हैं और कैसे हमारी सरकारें उनको अधिकारी विद्वान् मानती हैं।
मैं उन लोगों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूं, जो गंगा और वरुणा के स्व च्छन अस्तित्वक की रक्षा के लिए प्रयत्नर ही नहीं कर रहे, अपने प्राणों पर संकट झेल कर अनशन पर बैठे हैं। मैं भारत माता से प्रार्थना करता हूं कि वह अपने इन सपूतों के भाल पर स्वैयं अपने हाथ से सफलता का तिलक अंकित कर दें।
आपका
नरेन्द्र कोहली
14.6.2008

Sunday, 10 April 2011

हजार रूपों में दिखे अन्ना हजारे













वाराणसी, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में उतरे गांधीवादी अन्ना हजारे के समर्थन में शुक्रवार को तमाम संगठन आंदोलन में कूद पड़े। मैदान-ए-जंग में कूदकर मातृशक्ति ने जहां अन्ना की अगुवाई में छिड़े संग्राम को और शक्ति प्रदान की, वहीं अधिवक्ताओं, चिकित्सकों, बैंक कर्मियों, शिक्षकों व व्यापारियों के कई और संगठनों ने भी मोर्चा खोला। यूं लग रहा था मानों अन्ना हजारों रूपों में घूम रहे हों। उपवास, कैंडिल मार्च, जुलूस व सभा कर सबने संकल्प लिया कि जन लोकपाल बिल पर अन्ना की सारी मांग तो मान ली गई है लेकिन आम जीवन में आगे भी भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रहेगी। पाणिनी : मातृशक्ति ने रखा उपवास- पाणिनी कन्या महाविद्यालय एवं नारी जागरण की ओर से पाणिनी मंदिर परिसर में छात्राओं व महिलाओं ने उपवास रखा। इस दौरान अन्ना तुम संघर्ष करो-हम तुम्हारे साथ हैं का नारा बुलंद किया गया। इस मौके पर हुई सभा में महिलाओं ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक जंग शुरू हो चुकी है और मातृशक्ति दूसरी लोकतांत्रिक क्रांति के तैयार है। सभा को मीना चौबे, नंदिता शास्त्री, प्रियंका भारती, संजीवनी आनंद, ज्योति आर्या, प्रियंबदा, मधु यादव, डॉ.वीणा सहाय, जाह्नवी आदि ने संबोधित किया। महिला चिकित्सकों का संकल्प : स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों की संस्था फॉग्सी की डॉ.आशा भारद्वाज की अध्यक्षता में सिगरा में हुई बैठक में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन को पूर्ण समर्थन देने का संकल्प लिया गया। डॉ.आशा ने कहा कि अन्ना की जंग से सीख लेते हुए यदि देश का हर व्यक्ति भ्रष्टाचार न करने और उसे प्रोत्साहित न करने का संकल्प ले ले तो राष्ट्र की तस्वीर बदल जाएगी। अधिवक्ताओं का कैंडिल मार्च : सेल्सटैक्स व इनकमटैक्स से जुड़े अधिवक्ताओं ने अन्ना हजारे के समर्थन में वाणिज्य कर भवन से कैंडिल मार्च निकाला और आजाद पार्क (लहुराबीर) पहुंच कर सामूहिक उपवास पर बैठ गए। इस दौरान हुई सभा में सेल्स टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सज्जन कुमार जालान ने कहा कि गांधीवादी अन्ना हजारे की लड़ाई एक ऐसी गंभीर समस्या को लेकर है जिससे पूरा देश प्रभावित है। कहा कि लोकपाल संस्था को स्वायत्तशासी व संवैधानिक दर्जा दिया जाए। सभा में नवरतन सिंह, केदारनाथ टण्डन, शरद त्रिपाठी, काली शंकर श्रीवास्तव, सुधीर सक्सेना, प्रियनंद मिश्र, रामजी अग्रवाल, सदानंद सिंह, लल्लन सिंह, अशोक सेठ, अशोक श्रीवास्तव के अलावा इनकम टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद शुक्ल, मंत्री गोपेश जैन, अजय सिंह, श्रीहर्ष सिंह ने भाग लिया। मोमबत्ती लेकर उतरे सड़क पर : इंडिया एगेंस्ट करप्शन की ओर से लंका से कैंडिल मार्च निकाला और लोगों में हैंडबिल बांटे। इस कार्यक्रम में अवधेश मिश्रा, मो. आरिफ अंसारी, रविशंकर भारत, नकुल अरोड़ा, संतोष बिहारी, मनींद्र, संजय शुक्ल सहित काफी संख्या में आईटी के छात्रों ने हिस्सा लिया। अखिल भारतीय लोकाधिकार संगठन की ओर से टाउनहाल स्थित गांधी प्रतिमा के निकट दीप प्रज्जवलित किया गया। इस कार्यक्रम में गंगा सहाय पाण्डेय, राजेंद्र त्रिवेदी, शिवकरण अवस्थी, चंद्रेश्वर प्रसाद, सिद्धनाथ शर्मा, उमाशंकर पाण्डेय आदि शामिल थे। डीएलडब्ल्यू मजदूर संघ ने कंदवा गेट से डीरेका तक कैंडिल मार्च निकाला। इस मार्च में नरेंद्र मिश्र, आलोक मिश्र, राकेश कुमार पाण्डेय, सुरेश प्रसाद, सुरेश विश्वकर्मा आदि शामिल थे। बैंक कर्मियों का समर्थन : इलाहाबाद बैंक की चौक शाखा में वरिष्ठ प्रबंधक वासुदेव ओबेराय की अध्यक्षता में हुई बैठक में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की जंग को समर्थन देने का संकल्प लिया गया। श्री ओबेराय ने कहा कि गांधीवादी अन्ना ने एक ऐसी समस्या यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा है, जो राष्ट्र को दीमक समान चाट रहा है। बैठक में गिरीश पाण्डेय, संजय प्रसाद, रमित मिश्र आदि ने भाग लिया। आईएमए की रैली : अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में आईएमए के बैनर तले चिकित्सकों ने शहीद उद्यान से भारत माता मंदिर तक रैली निकाली। इस दौरान जन लोकपाल विधेयक को लागू करने की सरकार से मांग की गई। रैली में डॉ. कुसुम चंद्रा, डॉ. विवेक कुमार, डॉ. आलोक भारद्वाज, डॉ. आशा भारद्वाज, डॉ.संजय राय, डॉ. अजित सैगल, डॉ. ज्योति सिंह, डॉ. वीपी सिंह, डॉ. अश्विनी टंडन, डॉ. अनुराग टंडन, डॉ. राजेश अग्रवाल, डॉ. शैलेष ने भाग लिया। मुख्यालय पर जुटे सामाजिक संगठन : जिला मुख्यालय पर चौथे दिन भी अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं भ्रष्टाचार को मिटाना है, अन्ना का साथ निभाना है आदि नारे बुलंद होते रहे। साझा संस्कृति मंच, भाकपा माले, आइसा, गौरी केदार सेवा समिति, भ्रष्टाचार निर्मूलन समिति, नरेगा मजदूर यूनियन के कार्यकर्ताओं ने धरना देकर सभा की। लोगों ने हस्ताक्षर अभियान में सहभागिता की। सभा व धरने में मनीष शर्मा, कुसुम वर्मा, राजेश, गणेश शर्मा, सहेंद्र पाल, राजेंद्र पांडेय, आनंद तिवारी, ओपी केजरीवाल, पूनम, आशा शामिल थे। विभिन्न संगठन भी मैदान में : भारत विकास परिषद व माहेश्वरी समाज के पुरूषों व महिलाओं ने सिगरा के शहीद उद्यान में दीपक माहेश्वरी के नेतृत्व में मोमबत्ती जलाकर अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने का संकल्प लिया। मारवाड़ी समाज के लोगों ने अनिल जाजोदिया व जेसीआई वाराणसी के सदस्यों ने जेसी संजय अरोड़ा की अगुवाई में मलदहिया स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिभा के समक्ष मोमबत्ती जलाकर अन्ना को समर्थन का संकल्प लिया। इस मौके पर अजय साहनी, प्रवीण कपूर, संजय अग्रवाल, रूपेश माहेश्वरी आदि मौजूद थे।मीरापुर बसहीं के क्षेत्रीय लोगों ने बबलू श्रीवास्तव के नेतृत्व में कैंडिल मार्च निकाला, जो भोजूबीर तिराहे तक गया। अर्दली बाजार व भोजूबीर व्यापार मंडल की ओर से व्यापारियों ने अनशन किया। अनशन में विपुल पाठक, आनंद सोनकर, विनोद पाण्डेय, अजय गुप्ता, ओमप्रकाश गुप्ता, विनोद सिंह शामिल थे। आजाद पार्क में जुटे व्यापारी : वाराणसी नगर उद्योग व्यापार मंडल के तत्वावधान में व्यापारियों ने अन्ना हजारे के समर्थन में लहुराबीर स्थित आजाद पार्क में सामूहिक उपवास रखा। उपवास में मोहनलाल सरावगी, जेठमल चाण्डक, अजीत बग्गा, प्रभाकर सिंह आदि शामिल थे। बांसफाटक व्यावसायिक संघ जनता दल यूनाईटेड, राष्ट्र बचाओ संघर्ष समिति, जागृति फाउंडेशन के सदस्यों ने भी अन्ना हजारे के समर्थन में सभा की और कैंडिल मार्च निकाला। कचहरी में पैदल मार्च : अधिवक्ताओं ने दीवानी कचहरी परिसर से जिला मुख्यालय तक पैदल मार्च किया। मार्च में राजेंद्र प्रताप पाण्डेय, वीरेंद्र प्रताप सिंह, राजेश मिश्र, विवेक शंकर तिवारी (माइकल), संजय कुमार चौरसिया, लवकुश सिंह, कामेश्वर ओझा शामिल थे। महामना प्रतिमा के पास अनशन : लंका पर महामना प्रतिमा के निकट बीएचयू के प्रोफेसर, चिकित्सक भी अनशन पर बैठे। इनमें पवन सिंह, डॉ. श्रविण कुमार सिंह, रामबचन पाण्डेय, शिवकुमार सिंह, ओमप्रकाश सिंह, डॉ. जेपी सिंह, डॉ. वीपी सिंह, प्रो. दीनानाथ सिंह, प्रो. राजेंद्र राय, प्रो. आद्या पाण्डेय आदि शामिल थे। किया यज्ञ व पूजन : विकास एवं शिक्षण समिति ने शिवपुरवा स्थित कार्यालय पर बुद्धि-शुद्धि यज्ञ आयोजित किया। यज्ञ में राजेश श्रीवास्तव, संतोष द्विवेदी, रेनू श्रीवास्तव, प्रवीण मौजूद थे। समाजवादी पार्टी का जुलूस : सपा कार्यकर्ताओं ने नरिया से लंका तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जुलूस निकाला। जुलूस में कमल पटेल, अखिलेश सोनकर, अनिल राजभर, पप्पू यादव आदि शामिल थे। पूर्वाचल मुक्ति मोर्चा के भरत तिवारी, रमेश चौधरी, डॉ. हरिकेश सिंह, ऊषा सिंह चौहान ने धरना दिया। द टूरिस्ट ड्राइवर वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से मोमबत्ती जुलूस निकाला गया। आदर्श भारतीय संघ की ओर से भारत माता मंदिर में मोमबत्ती जलाई गई। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा परिषद की ओर से पहडि़या में, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से यूपी कालेज से जिला मुख्यालय तक कैंडिल मार्च निकाला गया। हरहुआ में भाजपा कार्यकर्ताओं ने कैंडिल मार्च निकाला। पिण्डरा में नंदराम शास्त्री के नेतृत्व में धरना दिया गया।

Friday, 8 April 2011

उफ! किसने कर दी हरियाली की हत्या

वाराणसी, दुस्साहस तो देखिए। जिस रास्ते से प्रतिदिन जिले के तमाम आला अफसरों की गाडि़यां गुजरती है। कमिश्नर का आवास व विकास प्राधिकरण का दफ्तर जहां से चंद कदम की दूरी पर है। फिर भी निर्मम तरीके से कचहरी के समीप उद्यान विभाग के पिछले हिस्से पर सड़क के किनारे लगे आधा दर्जन से अधिक पेड़ों को काट डाला गया। नए वरुणापुल से जेपी मेहता इंटर कॉलेज से लेकर कमिश्नर आवास तक जिस मार्ग पर धूप अपने तेवर नहीं दिखा पाती थी आज उस इलाके के एक दर्जन से अधिक पेड़ काट दिए गए हैं। एक तो बनारस वैसे ही कंक्रीट का शहर बनता जा रहा है। विभागीय अफसरों की आंकड़ेबाजी के चलते हरियाली नाममात्र की रह गई है। ऐसे में अगर बड़े-बड़े पेड़ों को लोग यूं ही काटते रहेंगे तो शहर में सांस लेना भी मुश्किल हो जाएगा। जेपी मेहता इंटर कॉलेज के सामने बनारस क्लब के पिछले हिस्से में सड़क के किनारे दर्जनों पेड़ मौजूद थे। इधर कुछ महीनों से एक-एक कर पेड़ गायब होते गए। आज सिर्फ ठूंठ बचा है जो अपनी कुर्बानी की गवाही दे रहा है। सवाल यह उठता है कि आखिर वह कौन लोग हैं जो दिनदहाड़े या रात में पेड़ों पर कुल्हाड़ी चला कर मौज में हैं। पुलिस व वन विभाग के लोग आखिर कहां गए। सूत्रों की माने तो क्षेत्र में खानाबदोश लोग अपना डेरा-डंडा कई महीनों से जमाए हैं। उनमें से कुछ परिवार लकड़ी के खिलौने बनाने का भी काम करता है। आशंका है कि खिलौने के लिए उन्हीं लोगों ने पेड़ों की बलि चढ़ा दी होगी

Wednesday, 23 March 2011

प्रति व्यक्ति पानी खपत कम करने पर जोर

वाराणसी : वर्ष 2010 से 2030 के बीच पीने योग्य पानी की विकट समस्या खड़ी होने वाली है, क्योंकि इस दौरान एशिया एवं अफ्रीका की जनसंख्या दोगुनी हो जाएगी। इसका सर्वाधिक प्रभाव शहरी क्षेत्रों में पड़ेगा। कारण यह है कि आधी से अधिक जनसंख्या शहर में ही प्रवास करेगी। इस जनसंख्या के 38 फीसदी लोगों का प्रवास झुग्गी झोपडि़यों में होगा। बीएचयू स्थित प्रौद्योगिकी संस्थान के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में विश्व जल दिवस पर मंगलवार को शहरों में जल समस्या पर आयोजित संगोष्ठी में उक्त विचार उभरकर आए। वक्ताओं का कहना रहा कि यदि समय रहते चेता नहीं गया तो आने वाले दिनों में जल की झलक पाने को लोग तरस जाएंगे। इस समस्या का हल बिना जन सहयोग के संभव नहीं होगा। इसके लिए प्रति व्यक्ति पानी की खपत की दर में कम करने की कोशिश की जाए। वर्तमान में 140 लीटर प्रति व्यक्ति पानी की खपत है। विकसित देशों में इस ओर प्रयास अभी से शुरू हो चुके हैं। पीने योग्य जल के अलावा अन्य आवश्यकताओं के लिए विकसित देशों में व्यर्थ पानी को रिसाइकिल कर प्रयोग में लाया जा रहा है। हमें भी इस पर विचार करना होगा।

.................तो क्या सूख जाएंगी गंगा ?

देवि सुरेश्वरी भगवती गंगे, त्रिभुवन तारिणी तरल तरंगे। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह पंक्तियां यह बताने के लिए पर्याप्त हैं गंगा का पृथ्वी पर अवतरण विश्व को तारने व जन्म जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था। इसी वजह से वह देव नदी कहलाई। यह देव नदी अब सूखने के कगार पर है। कम से कम पूर्वाचल के हालात तो यही हैं। पूर्वाचल की शुरुआत से लेकर अंत तक गंगा का जलस्तर हर स्थान पर लगातार तेजी से घट रहा है। अकेले वाराणसी में गंगा के स्तर में एक साल में ढाई फीट से अधिक की कमी आ चुकी है। जल स्तर घटने की यह रफ्तार हर साल बढ़ती जा रही है। गंगा का पृथ्वी पर अवतरण दैवीय उद्देश्यों के लिए हुआ था। इसके जल को अमृत मान कर काफी विवेक से इस्तेमाल की परंपरा रही है। अब स्थिति बदल गई है। इस समय इसका उपयोग किसी आम जल की तरह बिजली बनाने व सिंचाई करने में ही हो रहा है। टिहरी समेत दर्जनों बड़े छोटे बांध हर स्तर पर इसके प्रवाह को रोके पड़े हैं। बांधों से बने सरोवरों में इसकी समस्त जलराशि रुक जाने के चलते मैदानी ही नहीं अधिकांश पहाड़ी इलाकों में इसमें पानी की खासी किल्लत हो गई है। कभी साल भर पूरे पाट बहने वाली यह नदी अब बारिश में भी अपने पाट के दोनों किनारे नहीं छू पा रही है। खुद केन्द्रीय जल आयोग के आंकड़ों की मानें तो गंगा के जल स्तर में हर साल गिरावट आ रही है। इतना ही नहीं, जलस्तर घटने की रफ्तार हर साल बढ़ती जा रही है। वर्ष 2009-10 में एक फीट तो 10-11 में दो से ढाई फीट तक जलस्तर गिर गया। पूर्वाचल के मुहाने पर स्थित इलाहाबाद का उदाहरण लें तो यहां फाफामऊ में गंगा का जलस्तर 15 मार्च 2009 में 76.290 मीटर था। 2010 में 15 मार्च को यह जलस्तर 76.180 मीटर रह गया। इलाहाबाद में यमुना से मिलने के बाद भी गंगा की स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आ रहा है। इलाहाबाद स्थित छतनाग में 15 मार्च वर्ष 2009 में 71.400 मीटर जल था। 15 मार्च 2010 को यह घट कर 71.065 रह गया। वाराणसी के राजघाट से लेकर गाजीपुर तक घटने की यह रफ्तार इसी गति से जारी है। केन्द्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार गाजीपुर में 15 मार्च 2009 को 52.425 मीटर जल था। 15 मार्च 2010 को यह घट कर 51.840 रह गया। विशेषज्ञों की माने तो यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब गंगा नदारद हो जाएंगी। गंगा का जलस्तर गोपनीय! करोड़ों की श्रद्धा का केन्द्र मां गंगा के साथ खासा खिलवाड़ किया जा रहा है। इसमें कोई व्यवधान न खड़ा हो, इसके लिए सभी संभव सावधानियां बरती जा रही हैं। मां गंगा में कितना जल है, यह भी सीधे नहीं जाना जा सकता। केन्द्रीय जल आयोग के अधिकारियों की माने तो यह अति गोपनीय है। बाढ़ के समय केन्द्र सरकार के आदेश पर ही जलस्तर सार्वजनिक किया जाता है। अन्य मौसम में यह नहीं बताया जा सकता। वैसे इस गोपनीयता के बीच आंकड़ों के साथ कितना खिलवाड़ हो रहा होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। केन्द्रीय जल मंत्री के आने की सूचना मिलने के बाद लिए गए जल स्तर के आंकड़े इस बात की खुद गवाही दे रहे हैं। अचानक इलाहाबाद तक के सभी स्थानों पर जलस्तर पिछले साल की तुलना में बढ़ गया जबकि वाराणसी में मंत्री के आने की तिथि निर्धारित न होने के चलते ऐसा नहीं हुआ।

Tuesday, 22 March 2011

यह सच है कि जल ही जीवन

मंगलवार को विश्व जल दिवस है। हर साल यह दिन स्वच्छ पानी के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। पानी के महत्व का अहसास प्यास लगने पर ही होता है। पानी का कोई विकल्प नहीं है। इसकी एक-एक बूंद अमृत है। दूसरी ओर शहरों की बढ़ती जनसंख्या ने पानी की समस्या को और भी विकराल कर दिया है। न्यूनतम 140 लीटर प्रति व्यक्ति पानी की जरूरत पड़ती है लेकिन एशिया में 25 फीसदी लोगों की न्यूनतम पानी की आवश्यकता की भी पूर्ति नहीं हो पाती है। कंक्रीट के जंगल (शहरीकरण) में पानी जमीन के अंदर न जाकर बह जाता है। रास्ते में यह अपने साथ हमारे द्वारा बिखेरे खतरनाक रसायनों, तेल, ग्रीस, कीटनाशकों एवं उर्वरकों जैसे कई प्रदूषक तत्वों को ले जाकर पूरे जलFोत को प्रदूषित कर देता है। इसलिए संभव हो तो छिद्रित फर्श बनाए जा सकते हैं।

विश्व जल दिवस 22 मार्च 2011 पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून का संदेश

संसार इस समय जहां अधिक टिकाऊ भविष्य के निर्माण में व्यस्त हैं वहीं पानी, खाद्य तथा ऊर्जा की पारस्परिक निर्भरता की चुनौतियों का सामना हमें करना पड़ रहा है। जल के बिना न तो हमारी प्रतिष्ठा बनती है और न गरीबी से हम छुटकारा पा सकते हैं। फिर भी शुद्ध पानी तक पहुंच और सैनिटेशन यानी साफ-सफाई, संबंधी सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य तक पहुंचने में बहुतेरे देश अभी पीछे हैं।

एक पीढ़ी से कुछ अधिक समय में दुनिया की आबादी के 60 प्रतिशत लोग कस्बों और शहरों में रहने लगेंगे और इसमें सबसे अधिक बढ़ोतरी विकासशील संसार में शहरों के अंदर उभरी मलिन बस्तियों तथा झोपड़-पट्टियों के रूप में होगी। इस वर्ष के विश्व जल दिवस का विषय “शहरों के लिए पानी” –शहरीकरण की प्रमुख भावी चुनौतियों को उजागर करता है।

शहरीकरण के कारण अधिक सक्षम जल प्रबंधन तथा समुन्नत पेय जल और सैनिटेशन की जरूरत पड़ेगी। इसके साथ ही शहरों में अक्सर समस्याएं विकराल रूप धारण कर लेती हैं, और इस समय तो समस्याओं का हल निकालने में हमारी क्षमताएं बहुत कमजोर पड़ रही हैं।

जिन लोगों के घरों या नजदीक के किसी स्थान में पानी का नल उपलब्ध नहीं है ऐसे शहरी बाशिंदों की संख्या पिछले दस वर्षों के दौरान लगभग ग्यारह करोड़ चालीस लाख तक पहुंच गई है, और साफ-सफाई की सुविधाओं से वंचित लोगों की तादाद तेरह करोड़ 40 लाख बतायी जाती है। बीस प्रतिशत की इस बढ़ोतरी का हानिकारक असर लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक उत्पादकता पर पड़ा हैः लोग बीमार होने के कारण काम नहीं कर सकते।

पानी संबंधी चुनौतियां पहुंच से भी आगे बढ़ चुकी हैं। अनेक देशों में साफ-सफाई की सुविधाओं में कमी के कारण लड़कियों को स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है, और पनघट से पानी लाते समय या सार्वजनिक शौचालयों को जाते या आते हुए औरतों को परेशान किया जाता है। इसके अलावा, समाज के अत्यधिक गरीब और कमजोर वर्ग के सदस्यों को अनौपचारिक विक्रेताओं से अपने घरों में पाइप की सुविधा प्राप्त अमीर लोगों के मुकाबले 20 से 100 प्रतिशत अधिक मूल्य पर पानी खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। यह तो बड़ा अन्याय है। रियो डि जेनेरियोन में सन 2012 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास सम्मेलन में पानी का मसला उठाया जायेगा। गरीबी तथा असमानता घटाने, रोजगारों की रचना करने, तथा जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से उत्पन्न दबावों से होने वाले खतरों को कम करने के उद्देश्य से मेरा वैश्विक टिकाऊपन और यूएन-वॉटर पैनेल यह जांच कर रहा है कि पानी, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा की समस्याओं को आपस में जोड़ने के लिए क्या रास्ते निकाले जाएं।

इस विश्व दिवस पर मैं सरकारों से अनुरोध करता हूं कि शहरी जल संकट के बारे में वे यह मानकर चलें कि पानी की किल्लत जैसी कोई समस्या नहीं है, समस्या केवल चुस्त प्रशासन, लचर नीतियों और ढीले प्रबंधन की है। आइये, हम प्रतिज्ञा करें कि निवेश की भारी कमी को दूर करेंगे, और यह संकल्प भी ले कि प्रचुरता से सम्पन्न इस संसार में 80 करोड़ से भी अधिक लोग स्वस्थ और सम्मानपूर्वक रूप से जीने के लिए अब भी शुद्ध और सुरक्षित जल एवं साफ-सफाई के लिए तरस रहे हैं।

क्यों फेंके जाते हैं नदियों में सिक्के

अक्सर आपने देखा होगा कि जब बड़े-बुजुर्गो के साथ यात्रा कर रहे होते हैं तो रास्ते में किसी पौराणिक नदी के पड़ने पर वे उसे नमन करने के साथ ही परंपरा अनुसार नदी में सिक्के फेंकते हैं। अक्सर यह सवाल उठता है कि लोग नदी में सिक्के क्यों फेंकते हैं, यह परंपरा क्यों है और उसका क्या प्रभाव होता है। इसके पीछे कई कारण हैं। सभी धर्मो में दान-पुण्य मुख्य कर्म माना गया है। शास्त्रों के अनुसार दान करना पुनीत कार्य है। दान के महत्व को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वजों ने कई नियम बनाए थे। भारत में भी अनेकों परंपराएं ऐसी हैं जिन्हें लोग अंधविश्वास मानते है तो कुछ उनको निभाने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। ऐसी ही एक परंपरा है नदी में सिक्के डालना। दरअसल हमारे पूर्वज प्रकृति व उसके द्वारा उपहार में दी गई चीजों की पूजा करते थे। मसलन आग, हवा, पानी, पेड़-पौधे, सूर्य व चांद। पौराणिक नदियों को हमारे यहां देवी का मान दिया गया है। प्राचीन काल में चांदी व तांबे के सिक्कों का प्रचलन हुआ करता था। नदियों में स्नान-पूजन के बाद श्रद्धालु उसमें दान स्वरूप चांदी-तांबे के सिक्के डालते थे। नदियों के किनारे रहने वाले गरीब बच्चे उन्हें एकत्र करते थे। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार बहते पानी में चांदी का सिक्का डालने से चंद्रदोष का प्रभाव समाप्त होता है। यानि दान पुण्य के साथ ही दोष का भी अंत। अब जरा इसके दूसरे पहलू पर भी नजर डालिए। सभी जानते हैं कि तांबा व चांदी में जल को शुद्ध करने के तमाम गुण मौजूद हैं। नदियों की तलहटी में जमा रहने वाले चांदी-तांबा के सिक्के पानी के शुद्धीकरण का कार्य करते थे। समय बदला तो प्राचीन काल में चलने वाले सिक्के भी बदल गए। वर्तमान में भारत में गिलट के सिक्कों का प्रचलन है जो मिश्रित धातुओं का आकार है। उनमें ऐसा कोई खास गुण नहीं है जो जल के शुद्धीकरण में महती भूमिका निभा सके। अधिकतर बड़े बुजुर्ग अभी भी परंपरा को निभाते हुए मजबूरीवश प्रचलित सिक्के फेंकते हैं। कुछ दिनों पूर्व ही एक रिपोर्ट आई थी कि गंगा के पानी में आक्सीजन की मात्रा मानक से बहुत कम रह गई है। कुछ तटवर्ती इलाकों में अब गंगा का जल आचमन योग्य भी नहीं रह गया है। ऐसे में हम अगर एकजुट होकर अपनी परंपराओं का सहारा लें तो गंगाजल के शुद्धीकरण में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। सिक्का न सही, धातु ही सही।

Wednesday, 2 March 2011

हर बरस एक मीटर नीचे

वाराणसी, जल ही जीवन है। इसके बिना आम आदमी ही नहीं पशु-पक्षी की जिंदगी के साथ हरे-भरे पेड़-पौधे की कल्पना करना भी बेमानी है। ऐसे में खासकर शहरी इलाके में पानी का स्तर हर साल एक मीटर नीचे भाग रहा है। आलम यह है कि नगर क्षेत्र में हैंडपंप जवाब देने लगे हैं। वहीं कूपों का पानी भी सतह पकड़ने लगा है जबकि गर्मी अभी आने को बाकी है। नगर क्षेत्र में भूजल की मापी के लिए 46 जगहों पर लगाए गए यंत्रों के जरिए बरसात के पहले और बाद की स्थिति में तेजी से बदलाव आने के संकेत मिले हैं। पिछले तीन साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि शहरी इलाके में बरसात के पहले पानी के लेबल का अधिकतम औसत क्रमश: 17, 18 व 19 मीटर तक पहुंच चुका है। इस तरह से एक मीटर तक नीचे गिरता जल स्तर खतरे की घंटी है। भूगर्भ जल विभाग के आंकड़े खुद ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि शहरी सीमा से सटे जगतपुर व भिटारी की स्थिति कुछ ज्यादा ही भयावह है। वर्ष 2010 की रिपोर्ट में जगतपुर में बरसात के पहले पानी की अधिकतम गहराई 27 मीटर जबकि भिटारी में 25 मीटर तक दर्ज की गई है। शहर में पानी का अधिकतम औसत 19 मीटर तक रिकार्ड किया गया है। वहीं बरसात के बाद पानी का औसत 16 मीटर तक पहुंच गया। उधर, डॉक्टर कालोनी (पाण्डेयपुर) में पानी का न्यूनतम औसत छह मीटर तथा सराय में 2.5 मीटर तक होना पाया गया है

तालाबों व कुंडों की बदहाली गंभीर मामला

वाराणसी, नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन ने यहां के तालाबों व कुंडों की बदहाली को गंभीर बताया है। विभागीय मंत्री के साथ सोमवार को मंडलीय समीक्षा बैठक में हिस्सा लेने के बाद वह सर्किट हाउस में मीडिया से बातचीत कर रहे थे। यह बताने पर कि वाराणसी शहर में 65 तालाब व कुंड सरकारी अभिलेख में दर्ज हैं। इन जलाशयों की स्थिति बेहद खराब है। कहीं अवैध कब्जा तो बेइंतहा गंदगी है। इस बारे में न्यायालय के स्पष्ट निर्देश हैं लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है। इस पर प्रमुख सचिव ने कहा, ऐसा है तो बेहद गंभीर बात है। वह इसे खुद देखेंगे। गंगा में 18 नालों से गिर रहे कचरे के बारे में सवाल उठा तो रंजन ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि नालों के ऊपर जाली लगाई जाए ताकि गंदगी सीधे गंगा में न गिरे। यहां इसका पालन नहीं होने की आज जानकारी मिल रही है। इस बारे में नगर निगम प्रशासन से पूछताछ की जाएगी। फिर जो भी जिम्मेदार होगा उसे दंड मिलेगा। नगर निगम में तैनात कर्मचारियों से उनके मूल पद के विपरीत काम लेने संबंधी सवाल से किनारा काट लिया। प्रमुख सचिव ने बताया कि मलिन बस्तियों समेत शहर की सड़कों व गलियों की मुकम्मल सफाई मंडलीय समीक्षा का मुख्य एजेंडा है। समीक्षा का शुरू यह दौर थमेगा नहीं वरन आगे जारी रहेगा। मलिन बस्तियों का निरीक्षण : प्रमुख सचिव ने शाम को तीन मलिन बस्तियों का निरीक्षण भी किया। इसमें बड़ी मलदहिया, दयानगर व सेनपुरा मलिन बस्ती शामिल है। मलिन बस्तियों में सफाई व्यवस्था ठीक रखने में निगम का अमला जुटा रहा। सचिव ने इन बस्तियों में विकास कार्य पूरे करने, सफाई व पेयजल आपूर्ति की कमी दूर करने के निर्देश दिए। बड़ी मलदहिया बस्ती में छतिग्रस्त सुलभ शौचालय को तत्काल दुरुस्त कराया जाए। इस दौरान अपर नगर आयुक्त सच्चिदानंद सिंह व अधिशासी अभियंता उपेंद्रनाथ त्रिपाठी समेत अन्य अधिकारी भी मौजूद थे

Saturday, 26 February 2011

काशी का दर्द : गंगा है, गंगाजल नहीं

वाराणसी, अविरल प्रवाह का गला घोंटने से विकलांग हो चुकी गंगा का भविष्य सवालों के घेरे में है। जिस गंगा की एक बूंद मात्र से मन निर्मल और तन पावन हो जाता हो, पवित्रता जिसकी पहचान हो और जिसपर करोड़ों-करोड़ लोगों की अटूट आस्था टिकी हो उसे अपने जल से विहीन कर नालों के हवाले किये जाने का ही परिणाम है कि काशी में गंगा सूखती जा रही है। इसके जल-गुण नष्ट हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा में गंगाजल के घटते अनुपात से यह नदी धीरे-धीरे एक बड़े नाले का रूप अख्तियार करती जा रही है। गंगा में घाटों के निकट डीओ (घुलित आक्सीजन) की मात्रा सात पीपीएम से किन्हीं भी परिस्थितियों में कम नहीं होनी चाहिए। यह आज घट कर 4 पीपीएम के आसपास हो गई है। बीओडी लोड दो पीपीएम से ऊपर नहीं होना चाहिए, यहां बढ़कर औसतन 16 पीपीएम हो गयी है। ऊपर से औद्योगिक इकाइयों के बढ़ते अवजल से गंगा के पानी में जहरीले विषाणुओं की भरमार होने लगी है। वह भी ऐसे में जब तमाम योजनाएं संचालित हैं और इसकी मॉनीटरिंग प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण कर रही हो। बीएचयू में गंगा रिसर्च सेंटर के कोआर्डिनेटर प्रो. यूके चौधरी कहते हैं कि हाल में कराई गई जांच में देखा गया कि काशी में गंगा तीन तरफ से प्रदूषण की गिरफ्त में है। अपने अप स्ट्रीम (अस्सी से पहले) में पहले से मिले अवजल की शिकार है। डाउन स्ट्रीम (सरायमोहाना) के निकट वरुणा के दूषित जल इसे और प्रदूषित कर रहे हैं तो सेंट्रल जोन (बीच) में 38 नालों के जरिए इसमें शहर के अवजल गिराए जा रहे हैं। इसकी मात्रा साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। अब सारी कवायद इसी नालों व कल-कारखानों के पानी को साफ करने की हो रही है। लिहाजा गंगा में उसके मौलिक जल का अनुपात घटता जा रहा है। ऐसे में कल की गंगा कैसी होंगी अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है। किसी भी नदी का सीधा सा फंडा है कि इसका न्यूनतम और अधिकतम प्रवाह निर्धारित किया जाना चाहिए जबकि गंगा के साथ ठीक इसके विपरीत आचरण किया जा रहा है। हम गंगा का 85 फीसदी जल अप स्ट्रीम (हरिद्वार) में ही निकाल ले रहे हैं और इसमें जगह-जगह से अवजल छोड़ रहे हैं। इस क्रिया की नदी में क्या प्रतिक्रिया हो रही है इसके आकलन पर ध्यान नहीं है। नतीजा यह हो रहा है कि अवजल और मौलिक जल का अनुपात जहां कम से कम हजार गुना होना चाहिए वहीं यहां देखा जा रहा है कि पांच फीसदी गंगा जल है तो 70 फीसदी अवजल और 25 फीसदी दूषित नदियों का पानी। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यहां हम जो पानी देख रहे हैं वह विभिन्न दूषित नदियों, नालों और कल-कारखानों का जहरीला पानी है। सारी कवायद इसी पानी को शोधित कर वापस गंगा में गिराने की हो रही है। दरअसल गंगा में गंगाजल तो है ही नहीं।

आयुक्त के अरमान पर माफियाओं की मिट्टी

वाराणसी, शिवनगरी काशी का दो नदियों वरुणा और अस्सी के नाम पर वाराणसी नामकरण हुआ। भू माफिया शहर की पहचान बताने वाली अस्सी नदी को तो पाटकर नाला बना चुके हैं, अब वरुणा नदी को भी नाला बनाने के लिए उसे जोरशोर से पाटा जा रहा है। आलम यह है कि कब्जा करने के लिए पानी में भवन का पिलर तक खड़ा कर दिया है। यहीं नहीं शहर के एक से बढ़कर एक मानिंद उस क्षेत्र में जमीन खरीदकर प्लाटिंग व बहुमंजिली इमारत तानने के लिए दाम लगा चुके है। नदी किनारे की जमीन का दाम वर्तमान में 20 से 25 लाख रुपये प्रति बिस्वा चल रहा है। हैरत की बात यह है कि भू माफिया नदी की जमीन का अपने नाम से कागजात भी खरीदार को उपलब्ध कराने का दावा कर रहे है। वरुणा नदी के सुंदरीकरण को लेकर मंडलायुक्त अजय कुमार उपाध्याय ने ड्रीम प्रोजेक्ट तैयार कराया था। उस दिशा में विभागीय स्तर पर तहसील प्रशासन की ओर से सिर्फ नपाई का कार्य शुरू हुआ। आदेश जारी हुआ कि नदी के मध्य से दोनों ओर डेढ़-डेढ़ सौ मीटर दूर तक कोई निर्माण नहीं होगा। यदि कोई ऐसा करता है तो उसे अवैध माना जाएगा। उसके बाद अफसर मौन धारण कर बैठ गए और भू माफियाओं की जेसीबी नदी के मुहाने तक पहुंच गई। दिन-रात काम लगाकर नदी को पाटने के लिए उसमें मिट्टी, ईटा-पत्थर व कूड़ा फेंका जा रहा है। छावनी क्षेत्र स्थित बुद्ध विहार कॉलोनी के पिछले हिस्से में नदी के किनारे दस बिस्वा से अधिक नदी की जमीन बीस फीट ऊपर तक पाट दी गई है। वहां से यदि आप छलांग लगाएंगे तो सीधे नदी में गिरेंगे। इसी स्थान से चंद कदम दूरी पर कभी संयुक्त शिक्षा निदेशक व जिला विद्यालय निरीक्षक का दफ्तर हुआ करता था। वहां से थोड़ी ही दूरी पर नदी के तट पर पेड़-पौधों व प्लास्टिक की चादर की आड़ में चार मंजिला इमारत तन रही है। दरअसल नदी के किनारों की जमीन में हाल के वर्षो में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसे देखते हुए भू माफियाओं ने पहले किनारों की जमीन खरीदी। उसे बेचने के बाद देखा कि डिमांड बढ़ती जा रही है तो नदी को ही पाटना शुरू कर दिया। चौकाघाट से लेकर डीएम आवास के पिछले हिस्से यानि इमिलिया घाट तक नदी के किनारे भू माफिया धड़ल्ले से मिट्टी डाल उसे पाट रहे हैं। इस काम में सीवर खोदाई में लगी कार्यदाई एजेंसी भी खूब साथ दे रही है। ठेकेदार सड़क खोदाई के दौरान निकली मिट्टी नदी के किनारे डाल रहे हैं। पिछले दिनों मानसिक अस्पताल के समीप स्थित तालाब को सड़क खोदाई से निकली मिट्टी से पाटने का मामला भी आयुक्त ने निरीक्षण के दौरान पकड़ा था। वीडीए, नगर निगम या फिर तहसील के अधिकारियों से लगायत कर्मचारियों तक को वरुणा को पाटे जाने की जानकारी है फिर भी वे मौन हैं। ऐसे में वरुणा की दशा कैसे सुधरेगी, मंडलायुक्त का वरुणा को लेकर ड्रीम प्रोजेक्ट कैसे आकार लेगा, यह समझा जा सकता है

Saturday, 12 February 2011

गंगा-गोमती में आर्सेनिक!

गंगा की सफाई नहीं हो पा रही, यह विषय पुराना हुआ। नई बात यह है कि पहली बार गंगा में आर्सेनिक मिला है। आर्सेनिक यानी संखिया जो सेहत के लिए धीमा जहर है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड को आर्सेनिक मिला है कानपुर और इलाहाबाद में। यह खबर सरकारों और पर्यावरणविदों के माथे पर इसलिए बल डाल रही है क्योंकि घोर प्रदूषण के बावजूद पावन गंगा अभी तक आर्सेनिक से बची हुई थी। चिंताजनक खबर यह भी है कि गंगा की एक सहायक नदी गोमती में भी आर्सेनिक पाया गया है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ. राम प्रकाश ने इस बारे में शोध किया। इसकी रिपोर्ट के अनुसार कानपुर व इलाहाबाद में गंगा के पानी में आर्सेनिक मानक 10 माइक्रो ग्राम के मुकाबले 9 से 27 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के स्तर में पाया गया है। वहीं, लखनऊ में भी गोमती में आर्सेनिक 20 माइक्रोग्राम तक मिला है। यमुना नदी खासकर मथुरा, वृंदावन क्षेत्र में भी कैडमियम, लेड, निकिल, मैगनीज, जिंक, आयरन जैसे विषाक्त धातुओं से प्रदूषित पाई गई है। यही वजह है कि रिपोर्ट आते ही विश्व बैंक ने समूचे गंगा बेसिन में नदियों की जल गुणवत्ता की गहन जांच की सिफारिश की है। सवाल यह है कि गंगा व अन्य नदियों को सीवेज प्रदूषण से मुक्त करने के लिए लगाये जाने वाले सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी) क्या नदी जल को इन घातक रसायनों से निजात दिला पाएंगे? जल निगम के प्रबंध निदेशक एके श्रीवास्तव कहते हैं कि एसटीपी में इस प्रकार के घुलित रसायनों को दूर करने की क्षमता नहीं होती है। नदी जल में रासायनिक विषाक्तता के यह मामले इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि कई शहरों में पेयजल आपूर्ति नदियों पर टिकी है। पेयजल शोधन में इन विषाक्त धातुओं व कीटनाशकों आदि के उपचार की कोई व्यवस्था नहीं है। साफ है कि शहरवासियों की सेहत इन घातक खतरों से घिरी है। जो आर्सेनिक बालू व मिट्टी के कणों में मौजूद होता है वही घुलित रूप में पानी में आ जाता है।-डॉ.राम प्रकाश, केंद्रीय भूमिजल बोर्ड गंगा में आर्सेनिक पहली बार मिला है। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कहा जाएगा कि वह भी जांच करा लें जिससे यह पता चल सके कि गंगा में इसका कहां से कहां तक प्रभाव है।-डॉ.सीएस भट्ट, सदस्य सचिव, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कहां दबी है रिपोर्ट आइआइटीआर ने 15 वर्ष पूर्व गंगा व गोमती में बड़ी मात्रा में कीटनाशक पाये जाने की पुष्टि की थी। रिपोर्ट राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय को भेजी गई थी। लेकिन इस पर क्या कदम उठाये गए किसी को पता नहीं।

Thursday, 3 February 2011

पानी के लिए बहेगा खून


उपलब्धता और मांग के बीच बढ़ते फासले को देख यह प्रतीत हो रहा है कि यदि समय से पहले खुद को संयमित नहीं किया गया तो जल के लिए जंग की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

दुनिया में हर साल 8 करोड़ लोग जुड़ जाते हैं. इससे पानी की मांग में 64 हज़ार अरब लीटर की वृद्धि हो जाती है. दुनिया में 1.20 अरब लोगों को रोज़ाना पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है. वर्ष 1900 से अब तक दुनिया में आधे वेटलैंड खत्म हो गए हैं. बताते हैं कि अभी कुल पानी का लगभग 2.5 फीसदी वाष्पीकरण की भेंट चढ़ जाता है. इंटरनेशनल हाइड्रोलॉजिकल प्रोग्राम का अनुमान है कि ग्लोबल वामिर्ंग की वजह से अगले 15 सालों में वाष्पीकरण की गति आज की तुलना में दुगुनी हो जाएगी. वाष्पीकरण की प्रक्रिया में तेज़ी आने से भी नदियों और अन्य जल स्रोतों में पानी की मात्रा कम होगी.

वैश्विक जलसंकट विशेषज्ञ और काउंसिल ऑफ कनाडा की सदस्य माउथी बालरे ने अपनी किताब ब्ल्यू कविनेंट में लिखा है- वर्ष 2050 तक मनुष्य के लिए पानी की आपूर्ति में 80 फीसदी की बढ़ोतरी करनी होगी. सवाल यह है कि यह पानी आएगा कहां से? अभी यह कोई नहीं जानता. पानी की आपूर्ति बढ़ाने के लिए पानी का दोहन करना ही होगा. यानी इससे जल संकट और बढ़ेगा. भारत में 15 फीसदी भूजल स्रोत सूखने की स्थिति में हैं. दुनिया में सबसे ज़्यादा क़रीब 20 लाख ट्यूबवेल भारत में ही है, जो लगातार ज़मीन से पानी खींच रहे है. ऐसे में वर्ल्ड बैंक के इस आकलन पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अगले 25 वर्षों में भूजल के 60 फीसदी स्रोत ख़तरनाक स्थिति में पहुंच जाएंगे. यह स्थिति भारत के लिए इसलिए भी दयनीय होगी, क्योंकि हमारी 70 फीसदी मांग भूजल के स्रोतों से ही पूरी होती है. यानी एक बड़ी आबादी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेगी. यह सवाल उठना लाज़िमी है कि आख़िर यह संकट क्यों आया? कहा जा रहा है कि लगातार जिस तरह हालात बिगड़ रहे हैं उसे देख यही लगता है कि हम नहीं चेते तो जल के लिए तीसरे विश्व युद्ध की आशंका को ख़ारिज़ नहीं किया जा सकता. जल विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह की माने तो पहले किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि हमारे भूमिगत जल भंडार कभी खाली भी होंगे. महज़ कुछ फीट की खुदाई करो, जल हाज़िर. लेकिन कुछ ही वर्षो में हमने इतनी बेरहमी से इनका दोहन किया कि आज भूजलस्तर खतरनाक स्थिति में पहुंच गया. इसलिए आने वाले कुछ वर्षों में ये पूरी तरह से खत्म हो जाएं तो इसमें कोई अचरज नहीं होना चाहिए. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की रिपोर्ट कहती है कि 2002 से 2008 के दौरान ही देश के भूमिगत जल भंडारों से 109 अरब क्यूबिक मीटर एक क्यूबिक मीटर यानी एक हज़ार लीटर पानी समाप्त हो चुका है. बीते तीन वर्षों में स्थिति और भी बदतर हुई है.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी एक दिलचस्प अध्ययन में पता चला है कि भारत की आर्थिक विकास की रफ़्तार बढ़ने के साथ ही देश में जल संकट और भी गहराएगा. भारत में जीडीपी बढ़ रही है और इससे लोगों की आय में भी इज़ा़फा हो रहा है. आय बढ़ने से लाइफस्टाइल तेज़ी से बदल रही है. आधुनिक लाइफस्टाइल की वजह से पानी की खपत में बढ़ोतरी होती है. अभी भारत में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी की मांग 85 लीटर है, जो 2025 तक 125 लीटर हो जाएगी. उस समय तक भारत की आबादी भी बढ़कर एक अरब 38 करोड़ हो जाएगी. इससे प्रतिदिन पानी की मांग में कुल 7900 करोड़ लीटर की बढ़ोतरी हो जाएगी. इसका सीधा असर जल संसाधनों पर पड़ेगा. इस बढ़ी हुई मांग को पूरा करने के लिए हमें भूजल के स्रोतों की ओर झांकना पड़ेगा जो इन पंद्रह वर्षों में का़फी खत्म हो चुके होंगे. यानी लोगों की पानी की मांग तो बढ़ेगी, लेकिन उतना पानी मिलेगा, इस पर संदेह है. आज प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 3076 लीटर है, जो तब घटकर आधे से भी कम रह जाएगी. वर्ल्ड वाइल्ड फंड डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की 2007 की रिपोर्ट नदियों के मरने की वजह जलवायु परिवर्तन और पानी के अत्यधिक दोहन को मानती है. बारिश का सालाना औसत 105 सेंटीमीटर है. इसके कम होने से नदियों के जल प्रवाह में 20 फीसदी तक की कमी आई है. वहीं सिंचाई और घरेलू इस्तेमाल के लिए नदियों से पानी का दोहन भी चार गुना बढ़ा है. बीते 3 वर्षों स्थिति और बिगड़ी है. दुनिया में हर साल 35 लाख और भारत में एक लाख लोग पानी से जुड़ी बीमारियों की वजह से मरते हैं. यूं कहें कि आने वाले समय में लोगों की पानी तक पहुंच कम होती चली जाएगी. पिछले साठ वर्षों में भारत में पानी की उपलब्धता एक तिहाई रह गई है. यानी 1952 के मुक़ाबले अब 33 फीसदी पानी खत्म हो चुका है, जबकि आबादी 36 करोड़ से बढ़कर 115 करोड़ हो गई है, यानी तीन गुना से भी ज़्यादा. हालात यह है कि हम लगातार भूमिगत जल पर निर्भर होते जा रहे हैं. नतीजतन भूजल स्तर हर साल एक फीट की रफ़्तार से नीचे जा रहा है. इससे उत्तर भारत के ही 11 करोड़ से अधिक लोग भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं. यह आकलन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने किया है. ज़मीन से लगातार पानी खींचने का ही परिणाम है कि आज देश के 5723 में से 839 ब्लॉक डॉर्क जोन में आ चुके है. यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक हर जगह पानी को लेकर मारामारी है. देश के दस लाख से अधिक जनसंख्या वाले 35 शहरों में किसी में भी औसतन एक घंटे से अधिक पानी की आपूर्ति नहीं होती. दरअसल, धरती पर जो पानी है, उसका महज़ 0.007 फीसदी हिस्सा ही मानव के लिए उपयोगी है. यानी एक लाख लीटर पानी में महज़ 7 लीटर. शेष पानी या तो समुद्री जल है या ग्लेशियर के रूप में जमा है. अपने देश की स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि यहां दुनिया की आबादी के 16 फीसदी लोग रहते हैं, जबकि पानी केवल चार फीसदी ही है. सबसे खराब स्थिति राजस्थान की है. वर्षा कम होने से नदियों के जल प्रवाह में 20 फीसदी तक कमी आई है.

दुनिया में हर साल 8 करोड़ लोग जुड़ जाते हैं. इससे पानी की मांग में 64 हज़ार अरब लीटर की वृद्धि हो जाती है. दुनिया में 1.20 अरब लोगों को रोज़ाना पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है. वर्ष 1900 से अब तक दुनिया में आधे वेटलैंड खत्म हो गए हैं. बताते हैं कि अभी कुल पानी का लगभग 2.5 फीसदी वाष्पीकरण की भेंट चढ़ जाता है. इंटरनेशनल हाइड्रोलॉजिकल प्रोग्राम का अनुमान है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अगले 15 सालों में वाष्पीकरण की गति आज की तुलना में दुगुनी हो जाएगी. वाष्पीकरण की प्रक्रिया में तेज़ी आने से भी नदियों और अन्य जल स्रोतों में पानी की मात्रा कम होगी. गर्मी बढ़ने से ध्रुवों की बर्फ तेज़ी से पिघलेगी. ऩुकसान यह होगा कि यह मीठा पानी समुद्र के खारे पानी में मिल जाएगा. इस तरह मीठे पानी के पहले से ही सीमित स्रोत और भी संकुचित हो जाएंगे. कहा जा सकता है कि आने वाला व़क्त भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों के लिए बेहद कठिन है. बढ़ती आबादी, भूजल का अत्यधिक दोहन, ग्लोबल वामिर्ंग इत्यादि वजहों से पानी ऐसी लक्ज़रियस चीज़ बन जाएगी, जिसका इस्तेमाल उसी तरह करना होगा, जैसे आज हम घी का करते हैं.

संयुक्तराष्ट्र के जल उपलब्धता मानकों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन न्यूनतम 50 लीटर पानी मिलना चाहिए, लेकिन स्थिति इससे बदतर है. दुनिया के छह में से एक व्यक्ति को इतना पानी नहीं मिल पाता है. यानी 89.4 करोड़ लोगों को बेहद कम पानी में अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ती है. भारतीय पैमानों पर देखें तो एक व्यक्ति को रोज़ाना कम से कम 85 लीटर पानी मुहैया होना चाहिए, लेकिन हमारे देश में भी तीस फीसदी लोगों की यह ज़रूरत पूरी नहीं होती. इनमें से अधिकांश लोग ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, लेकिन शहरों में भी हालात बिगड़ने वाली है. अफ्रीकी देशों जैसे कांगो, नाम्बिया, मोजांबिक, घाना आदि देशों में पानी पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी के पांच फीसदी से भी ज़्यादा है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले सालों में इस खर्च में भारी बढ़ोतरी होगी. इससे सा़फ है कि पानी का संकट किस तरह महासंकट में बदलता जा रहा है. जल संकट बढ़ने से एक समस्या लोगों के विस्थापन के रूप में भी सामने आएगी. चूंकि कई क्षेत्रों में पानी लगभग पूरी तरह से खत्म हो जाएगा, ऐसे में लोग उन क्षेत्रों में जाएंगे, जहां पानी उपलब्ध होगा. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अगले तीन-चार वर्षों में 70 करोड़ लोगों को अपने क्षेत्रों से विस्थापित होना होगा. विस्थापन का एक दुष्प्रभाव यह भी होगा कि विस्थापित लोग जिन क्षेत्रों में जाएंगे, वहां आर्थिक एवं सामाजिक समस्याएं पैदा होंगी. यहां तक कि स्थाई निवासियों और विस्थापितों के बीच पानी को लेकर संघर्ष भी होगा. जिन देशों में विस्थापित जाएंगे, वहां की अर्थव्यवस्था पर भी अतिरिक्त भार बढ़ जाएगा. आने वाले वर्षों में पानी को लेकर संघर्ष बढ़ना तय माना जा रहा है. स्तंभकार स्टीवन सोलोमन ने अपनी किताब वाटर में नील नदी के जल संसाधन को लेकर मिस्र एवं इथियोपिया के बीच विवाद का खासतौर पर उल्लेख करते हुए लिखा है कि दुनिया के सबसे विस्फोटक क्षेत्र पश्चिम एशिया में अगली लड़ाई पानी को लेकर ही होगी. इस क्षेत्र में इजरायल, फलस्तीन, जॉर्डन एवं सीरिया में दुर्लभ जल संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर गहरी बेचैनी है जो युद्ध के रूप में सामने आ सकती है. इस तरह पानी को लेकर तीसरे विश्व युद्ध की बात हक़ीक़त बन सकती है. आने वाले सालों में पानी की मांग और आपूर्ति में अंतर लगातार बढ़ता जाएगा. अगर भारत का ही उदाहरण लें तो अभी पानी की कुल मांग 700 क्यूबिक किलोमीटर है, जबकि उपलब्ध पानी 550 क्यूबिक किलोमीटर है. 2050 में मांग क़रीब दुगुनी हो जाएगी, जबकि उपलब्धता 10 गुना से भी कम रह जाएगी. पानी की मांग में इज़ा़फा जनसंख्या में बढ़ोतरी की तुलना में कहीं तेज़ी से होगा. वर्ष 1900 और 1995 के बीच यही हुआ. इस दौरान दुनिया की आबादी तीन गुना बढ़ी, लेकिन पानी की खपत छह गुना से भी अधिक हो गई. यूएन वाटर के 2025 तक के अनुमान कहते हैं कि विकासशील देशों में पानी का दोहन 50 फीसदी और विकसित देशों में 18 फीसदी बढ़ेगा. अफगानिस्तान में स्थिति और भी बदतर है. संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि पानी की कमी की वजह से 25 लाख से भी अधिक अफगानियों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. देश में 36 लाख से ज़्यादा कुएं सूख चुके हैं और इस वजह से पानी आपूर्ति में 83 फीसदी तक की कमी आई है.

ओ गंगा बहती हो क्‍यों


गंगा प्रतीक है एक सभ्यता की, हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी तक. इसी से मिलकर बनती है गंगा-जमुनी संस्कृति. करोड़ों लोगों के जीवन की आशा है गंगा. उनकी रोजी और रोटी का सहारा भी है गंगा. लाखों वर्ग किलोमीटर खेतों की प्यास भी बुझाती है गंगा. लेकिन अब गंगा का पानी पीने तो दूर, नहाने लायक़ भी नहीं रहा. हज़ारों साल से जीवनदायिनी साबित होती आ रही गंगा का पानी अब सिंचाई के योग्य भी नहीं बचा. कन्नौज से लेकर कानपुर, इलाहाबाद और बनारस तक गंगा के पानी में जहां ऑक्सीजन की मात्रा घटती जा रही है, वहीं खतरनाक रसायनों की मात्रा बढ़ती जा रही है. बड़े-बड़े बांध और गंगा के किनारे बसे चमड़ा एवं रासायनिक कल-कारखानों से निकलने वाला कचरा गंगा के अमृत जैसे पानी को ज़हर बना चुका है. स़फाई के नाम पर चल रही योजनाओं ने भी गंगा को मैली बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. 1985 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए गंगा एक्शन प्लान शुरू किया गया था. हज़ारों करोड़ रुपये की योजनाएं बनाई गईं.

हम जिस तेज़ गति से स्खलित और प्रदूषित होते गए, मां गंगा को भी उसी रफ़्तार से अपवित्र करते चले गए. गंगा का जो पानी शुद्धता का मानक हुआ करता था, आज सड़ चुका है. पीने की बात तो दूर रही, वह नहाने लायक़ भी नहीं रहा. गंगा के पानी में ऑक्सीजन की मात्रा लगातार कम हो रही है. गंगा एक्शन प्लान नाकाम है और सरकार खामोश…

पिछले 25 सालों के दौरान गंगा एक्शन प्लान का क्या असर रहा, यही जानने के लिए चौथी दुनिया ने गंगा एक्शन प्लान और गंगाजल में ऑक्सीजन की घटती मात्रा के संबंध में जांच-पड़ताल की. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेज़ों से मालूम हुआ कि स़िर्फ 2005-2007 के दौरान गंगा की स़फाई के नाम पर 1600 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च किए गए. गंगा एक्शन प्लान का पहला चरण 31 मार्च 2000 को समाप्त हो गया था, जिसमें 452 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. चौथी दुनिया के पास उपलब्ध दस्तावेज़ में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने यह माना है कि गंगा एक्शन प्लान-1 अपने मक़सद में सफल नहीं हो सका, इसलिए 1993 में ही गंगा एक्शन प्लान-2 शुरू किया गया. बावजूद इसके गंगा अब पहले से भी ज़्यादा प्रदूषित हो गई. ऐसे में इस आशंका को बल मिलता है कि गंगा एक्शन प्लान के नाम पर कहीं आम आदमी की गाढ़ी कमाई की बंदरबांट तो नहीं हो रही है. हरिद्वार से जैसे ही गंगा आगे बढ़ती है, इसके पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घटनी शुरू हो जाती है. कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद और बनारस तक पहुंचते-पहुंचते गंगा की हालत यह हो जाती है कि इसका पानी पीने तो दूर, नहाने लायक़ भी नहीं रह जाता. बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) एक जांच प्रक्रिया है, जिससे पानी की गुणवत्ता और उसमें ऑक्सीजन की मात्रा का पता चलता है. गंगाजल के बीओडी जांच के मुताबिक़, कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद और बनारस में बीओडी की मात्रा 3.20 मिलीग्राम/लीटर से लेकर 16.5 मिलीग्राम/लीटर तक है, जबकि यह मात्रा 3.0 मिलीग्राम/लीटर से थोड़ी भी ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. इसी तरह इन जगहों पर गंगाजल में ऑक्सीजन भी तय मात्रा से कम है. इसका अर्थ है कि उपरोक्त जगहों पर गंगास्नान आपके जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. गंगा की शुद्धि के नाम पर हज़ारों करोड़ रुपये बहा दिए गए, लेकिन गंगा की हालत जैसी 1985 में थी, वैसी अब भी है. ज़ाहिर है, उक्त हज़ारों करोड़ रुपये ठेकेदारों, अफसरों और नेताओं की जेब में चले गए.

कन्नौज एवं कानपुर में काली नदी और रामगंगा सीवेज के माध्यम से आने वाला कचरा गंगाजल को ज़हरीला बना रहा है. अकेले कानपुर में 78 से ज़्यादा ऐसे चमड़ा उद्योग हैं, जो प्रदूषण नियंत्रण निर्देशों का पालन नहीं करते और रोज़ाना हज़ारों लीटर कचरा गंगा में बहा देते हैं. बनारस में सीवेज, अधजली लाशें या मृत शरीर बहाए जाने से भी गंगाजल अपनी स्वच्छता और निर्मलता खोता जा रहा है. आंकड़ों के मुताबिक़, स़िर्फ बनारस में ही 40 करोड़ लीटर सीवर का गंदा (मल-जल) पानी गंगा में प्रतिदिन डाला जाता है. पूरे देश की अगर बात करें तो गंगा में प्रतिदिन 2 करोड़ 90 लाख लीटर प्रदूषित कचरा गिर रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, उत्तर प्रदेश में 12 फीसदी बीमारियों की वजह स़िर्फ गंगा का पानी है. वाराणसी में अभी गंगा नदी के अलग-अलग घाटों में फीकल कोलिफार्म की संख्या 4 लाख 90 हज़ार से लेकर 21 लाख तक है. फीकल कोलिफार्म की संख्या से पता चलता है कि पानी में हानिकारक सूक्ष्म जीवाणुओं की बड़ी संख्या मौजूद है. नतीजतन, अब गंगा का स्वरूप जीवनदायिनी नहीं रहा, बल्कि यह रोगों को जन्म देने वाली हो गई है.

गंगा करोड़ों भारतीयों की आस्था की प्रतीक भी है, सो इस पर राजनीति न हो, यह संभव नहीं. 2009 में होने वाले आम चुनाव से कुछ महीने पहले यूपीए सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया. साथ ही गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गंगा बेसिन प्राधिकरण की स्थापना की घोषणा की गई. ज़ाहिर है, यूपीए सरकार का यह भागीरथी प्रयास आम चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया था. गंगा सदियों से भारत के करोड़ों हिंदुओं के लिए एक पवित्र नदी रही है. सो इस घोषणा के पीछे का मक़सद भी हिंदू वोटरों को लुभाना ही था. गंगा नदी को बचाने के लिए सालों से आंदोलन चल रहे हैं. गंगा पर बांध बनाए जाने का भी लोग विरोध कर रहे थे, तब यूपीए सरकार ने कोई क़दम नहीं उठाया. 1985 में राजीव गांधी द्वारा शुरू की गई गंगा कार्य योजना को सोनिया गांधी और उनकी सरकार शायद भूल चुकी हैं. लेकिन सवाल यह है कि क्या स़िर्फ योजना या प्राधिकरण बनाकर गंगा को बचाया जा सकता है? पिछले 25 सालों में तो ऐसा संभव नहीं हो सका. ज़ाहिर है, इसके लिए एक ईमानदार प्रयास की ज़रूरत है, जिसका अभाव अब तक दिख रहा है. फिर भी गंगा को किसी भी हालत में बचाना ही होगा, क्योंकि अगर गंगा खत्म होगी तो हम कहां बचेंगे!

  • गंगाजल न पीने, न नहाने लायक़
  • पानी में कम हो रही है ऑक्सीजन की मात्रा
  • बीओडी 3.20 से16.5 मि/ली तक
  • बीओडी 3.0 मि/ली अधिकतम हो
  • महज़ दो साल में 1600 करो़ड खर्च
  • पूरे देश में रोज़ 3 करो़ड लीटर कचरा गंगा में
  • कानपुर में 78 से ज़्यादा चम़डा उद्योग
  • इनसे रोज़ाना हज़ारों लीटर कचरा गंगा में
  • बनारस में 40 करोड़ ली. सीवर का पानी गंगा में
  • 12 फीसदी बीमारियों की वजह गंगाजल

Wednesday, 2 February 2011

गंगा.. कचरा से मइल भइल अंचरा



गंगा का यह कातर विलाप आखिर कब तक अरण्यरोदन बना रहेगा। एक तरफ जाह्नवी को निर्मल-निर्झर बनाने की कोशिशों के ढपोरशंखी दावे और दूसरी तरफ दिलों को झकझोर देने वाली गंगा की दुर्दशा की यह तस्वीर। सच को झुठलाने और फर्ज से मुंह चुराने के इस अपराध की सजा किसको मिले यह वक्त तय करेगा जरूर। फोटो : उत्तमराय चौधरी

Wednesday, 26 January 2011

तालाब आजादी की ओर


काशी विद्यापीठ ब्लाक, वाराणसी : इसे स्वत: स्र्फूत सकारात्मक जंग का नाम दे सकते हैं। कारण कि इधर से गुजरने वाले की नजर पड़ती और लोग कुछ देर ठहरकर स्थिति को समझते और जूझ पड़ते। यह सर्जनात्मक कार्य रोहनिया-बाईपास संपर्क मार्ग के नजदीक गांव हरिहरपुर में रविवार को शुरू हुआ। यहां के लोगों ने जलकुंभी में कैद तालाब को मुक्त कराने का बीड़ा उठाया। बड़ी खासियत यह थी कि इसकी अगुवाई ग्राम प्रधान लल्ली देवी कर रहीं थी, साथ में थे पति और गांव के लोग। सफाई शुरू होते ही लोगों की संख्या बढ़ने लगी और तालाब से बाहर होने लगी जलकुंभी। यूं तो देखने में यह काम बड़ा मुश्किल लग रहा था पर इसने नजीर का रूप लिया। यह नजीर इसलिए कि इस ओर से गुजरने वाले भी कुछ देर के लिए ठहरते, देखते और सराहना करते नहीं थकते। युवाओं का जोश भी उफान पर था और वे बगैर थके अपने लक्ष्य को पाने में जुटे थे। ग्रामप्रधान लल्ली देवी व उनके पति निखिद्दी राजभर कहते हैं कि गांव वालों से तालाब की सफाई का प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव ने मंत्र सा काम किया और लोग जूझ पड़े जलकुंभी के खिलाफ। आदर्श जलाशय योजना के तहत वर्ष 2006-07 में एक लाख रुपये की अधिक की लागत से तालाब की खोदाई, जीर्णोद्धार, घाट, सीढ़ी, आदि का निर्माण कराया गया मगर कुछ दिनों के बाद इस तालाब की पहचान को जलकुंभी व कीचड़ ने ढक लिया। ग्रामीणों ने श्रमदान से अपने गांव के तालाब को नया कलेवर देने का जज्बा बना लिया है। अब इस जज्बे में शामिल है तालाब को मॉडल के पैमाने पर खड़ा करना। ग्राम प्रधान कहती हैं कि बढ़े कदम पीछे नहीं हटेंगे। श्रमदान की यह मुहिम तब तक चलती रहेगी जब तक अपने गांव के इस तालाब के नीर को स्वच्छ लबालब नहीं कर लेंगे।

वाह ! यह तो कमाल हो गया


वाराणसी, मंगलवार को उजाला होने के बाद जो भी पांडेयपुर-भोजूबीर मार्ग से गुजर रहा था उसकी निगाहें मानसिक अस्पताल से सटे उस तालाब पर टिक जा रही थी जिसे पाटने की कुछ लोगों ने कोशिश की थी। इस जगह को तालाब के मूल स्वरूप में लाने के लिए मजदूर मिट्टी निकालकर ट्रैक्टर ट्राली पर लाद रहे थे। देखने वालों के जुबां से बरबस निकल रहा था वाह! यह तो कमाल हो गया। इसे कहते हैं प्रशासन की हनक का असर। पांडेयपुर तालाब से दिनभर में ट्रैक्टर ट्रालियों ने मिट्टी लादकर अन्यत्र ले जाया जा रहा था। इस काम में लगे लोगों ने बताया कि मिट्टी पूरी तरह निकाली जा चुकी है। अब नीचे दबा कचरा निकाला जाएगा। नगर निगम के अधिशासी अभियंता केपी सिंह के मुताबिक तहसील व निगम के राजस्व कर्मियों के साथ तीस जनवरी को तालाब की पैमाइश की जाएगी। तालाब की जमीन पर बनी दुकान व गैराज ध्वस्त करने के लिए विकास प्राधिकरण से पत्राचार किया गया है। ध्वस्तीकरण के लिए मंडलायुक्त ने सोमवार को निर्देश दिया है। पैमाइश व अवैध निर्माण ध्वस्त करने के बाद तालाब की हदबंदी के लिए पिलर व कंटीला तार लगवाया जाएगा

जगा प्रशासन, मौके पर पहुंचा अमला


वाराणसी, आखिर अमले की नींद खुल ही गई और जब खुली तभी मान लिया गया कि सबेरा हो गया। बात पांडेयपुर मानसिक अस्पताल से सटे प्राचीन धोबी तालाब से जुड़ी है। यहां महीने भर से फेंकी जा रही मिट्टी को निकाल फेंकने में नगर निगम का अमला मजबूती के साथ जुट गया। तालाब में मिट्टी फेंकने के लिए मंडलायुक्त अजय कुमार उपाध्याय ने नगर निगम को जिम्मेदार मानते हुए कड़ी फटकार लगाई। कहा निगम ने अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई जिस वजह से तालाब को फिर पाटने की जुर्रत भूमाफियाओं ने की है। उल्लेखनीय है कि पांडेयपुर धोबी तालाब में बीते एक महीने से मिट्टी डाली जा रही थी। इस ओर प्रशासन की नजर नहीं पड़ सकी थी। तालाब को फिर पाटे जाने की नापाक कोशिशों की खबर दैनिक जागरण ने 24 जनवरी के अंक में पृष्ठ 4 पर अमला सो रहा, तालाब पट रहा शीर्षक से प्रकाशित किया। इस समाचार का असर पड़ा और सुबह मंडलायुक्त मौके पर धमके। साथ में नगर आयुक्त विजयकांत दुबे व उप नगर स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. बीके सिंह, अधिशासी अभियंता केपी सिंह आदि भी थे। तालाब की दशा देख कमिश्नर का पारा चढ़ गया। उन्होंने क्षेत्रीय सफाई निरीक्षक व अन्य दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए। बोले, निगम मिट्टी निकलवा कर तालाब का जल्द जीर्णोद्धार शुरू कराए। इसमें अवस्थापना निधि से आवश्यक धन मुहैया कराया जाएगा। अधिशासी अभियंता केपी सिंह ने बताया कि मिट्टी निकालने के साथ तालाब के चारों ओर पिलर व कंटीले तार लगेंगे व अतिक्रमण हटाए जाएंगे। उम्मीद जगी, बहुरेंगे दिन धोबी तालाब का अस्तित्व बचाने के लिए प्रशासन के दोबारा बढ़े कदम को लेकर स्थानीय वाशिंदों में नई उम्मीद जगी है। रामनरेश, बच्चेलाल आदि ने कहा कि अगर, तालाब की सफाईकर पानी भर दिया जाए तो यह उपलब्धि ही होगी। तालाब में मानसिक अस्पताल व आसपास की बस्तियों का अवजल गिर रहा है

अमला सो रहा, तालाब पट रहा


वाराणसी, सरकारी अमला महानगर के तालाबों से बेफिक्र क्या हुआ भू-माफिया सक्रिय हो गए। धन की लिप्सा में ये तत्व पांडेयपुर इलाके में मानसिक अस्पताल से सटे धोबी तालाब का अस्तित्व खत्म करने में जुट गए हैं। बीते एक महीने के दौरान इस तालाब में लगभग डेढ़ सौ ट्रैक्टर ट्राली मिट्टी डाली जा चुकी है। यह काम किया जाता है उस समय जब पूरा शहर गहरी नींद में होता है। दिन के उजाले में आते-जाते किसी राहगीर की नजर भी पटते तालाब पर पड़ती है तो वह आगे बढ़ जाता है, यह सोचकर कि जिसे रोकना है वही सो रहा है तो कौन मुसीबत मोल ले। उल्लेखनीय है कि पांडेयपुर के इस तालाब से नगर निगम ने बीते वर्ष में कूड़ा निकालकर साफ करने का अभियान चलाया था। इसका कुछ असर भी हुआ और कई सौ ट्रक कचरा तालाब से निकला। तालाब में जब दलदल की स्थिति आई तो अभियान ठहर गया। इसके बाद निगम ने तालाब को समतल कराकर उसके कायाकल्प की योजना बनाई लेकिन धनाभाव के कारण काम शुरू नहीं हो सका। इसकी जानकारी रविवार को मंडलायुक्त अजय कुमार उपाध्याय को दी गई। कहा मानसिक अस्पताल के पास वाले तालाब को साफ इसलिए कराया गया था कि उसे मूल स्वरूप में लाया जाए। तालाब पाटने वालों का पता लगाकर उनकी सख्ती से खबर ली जाएगी। नगर आयुक्त विजय कांत दुबे ने बताया कि मौके पर पिलर गिराया जा चुका है ताकि इसकी फिनिशिंग हो