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Thursday, 11 November 2010

भू-माफियाओं के आगे प्रशासन नतमस्तक


भू-माफियाओं के आगे प्रशासन नतमस्तक
वाराणसी : तालाबों को पाट अट्टालिका खड़ी कर अपनी जेब भरने वाले भू माफियाओं के आगे जिला प्रशासन कितना बेबस है इसका अंदाजा उसकी रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। शासन को भेजी जाने वाली प्रशासनिक रिपोर्ट में अधिकारियों ने स्पष्ट उल्लेख किया है कि तहसील सदर की सीमा में आने वाले 32 तालाब ऐसे हैं जहां से अवैध कब्जा हटाना अब संभव नहीं है। कहीं भूमिहीनों की आड़ में माफियाओं ने कब्जा जमा रखा है तो कहीं सरकार के नुमाइंदों ने स्वयं कब्जा कर उसपर इंदिरा आवास से लेकर स्कूल तक तनवा दिया है। इतना ही नहीं भदैनी (मड़ौली) के तालाब की 0.510 हेक्टेयर भूमि पर एक जनाब ने तो फैक्टरी बना ली है। मामला अपर आयुक्त प्रशासन के यहां विचाराधीन है। एसडीएम सदर की रिपोर्ट के मुताबिक शिवपुर, कैथी, नदेसर स्थित तालाब पर धार्मिक स्थल का निर्माण हो चुका है। मरूई स्थित तालाब की 0.534 हेक्टेयर भूमि पर जूनियर हाई स्कूल व प्राइमरी पाठशाला बन गयी है। बूढ़ापुर की 0.162, जमीन व बैरवन की 0.105 भूमि पर प्राथमिक पाठशाला बन चुका है। हरिहरपुर तालाब में अनुसूचित जाति के लोगों का कब्जा पहले से ही था। सरकारी अमले ने उन्हें हटाने के बजाय वहां इंदिरा आवास बनवा दिया। जाहिर है कि और लोगों को मौका मिल गया। किसी ने एक तो किसी ने तीन मंजिला मकान तान दिया। हाथी, अमरीपुर, नेवादा, जंसा, मेहदीगंज, छितौनी, माधोपुर, लेढ़ूपुर स्थित तालाबों पर मकान, इमारत, शौचालय बन चुके हैं। प्रतापट्टी, कादीपुर, दांदूपुर, परानापट्टी समेत अन्य तालाबों पर अब आबादी है। बन गयी मनमाफिक रिपोर्ट : जिला प्रशासन ने तालाबों की सूची और उसका विवरण कुछ इस तरह से तैयार किया है कि वर्तमान सरकार तो वहां से कब्जा हटाने का आदेश दे नहीं सकती। और सरकारें भी आ जाएं तो वो भी हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं कर सकतीं। कब्जेदारों की सूची में कुछ ऐसे वर्ग के लोगों को आगे कर दिया गया है कि भू माफिया उनकी आड़ में आसानी से तालाब की बची भूमि पर कब्जा जमा सकें। भूल गए कुछ तालाब- रिपोर्ट में शहर के लंका, भगवानपुर, शिवपुर, शिवपुरवा, लहरतारा के कुछ ऐसे भी तालाब हंै जिन्हें पाटकर स्कूल, पुलिस चौकी से लेकर सरकारी इमारत बन गई है। यहां से भी कब्जा हटाना बहरहाल जिला प्रशासन के बस में नहीं है फिर भी उसका जिक्र रिपोर्ट में नहीं किया गया वरना सूची में संख्या और बढ़ती।

गंगा को निर्मल बनाने फिर चल दिए भगीरथ

गंगा को निर्मल बनाने फिर चल दिए भगीरथ

इलाहाबाद : बुधवार को बोट क्लब से गंगा अभियान की निर्मल गंगा अविरल प्रवाह-2010 यात्रा पूरे उत्साह के साथ पटना के लिए रवाना हो चली। शान्त, धीर और गंभीर यमुना तट पर मंगलध्वनि के बीच भूमा निकेतन हरिद्वार के पीठाधिपति अच्च्युतानंद तीर्थ जी महाराज ने विधिवत् आरती पूजन किया। निर्मल गंगा अविरल प्रवाह अभियान में शामिल पीएसी और पुलिस के जवान गंगा को निर्मल बनाने का संकल्प लेकर आगे की यात्रा के लिए रवाना हुए। प्रयाग में रात्रि विश्राम के बाद उनके चेहरे फिर खिले हुए थे। विधायक उदयभान करवरिया समेत अनेक गणमान्य लोगों ने अभियान के सदस्यों का उत्साहवर्धन किया। उत्तर प्रदेश पुलिस, उत्तर प्रदेश शासन, आईटीआरपीसी, पर्यटन व दैनिक जागरण के इस गंगा अभियान में 70 सदस्यों का जिला प्रशासन की ओर से क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी अमित ने बोट क्लब पहंुचकर यात्रा में शामिल लोगो का स्वागत किया। इस मौके पर गंगा अभियान क्रियान्वयन समिति के सदस्य नीरज श्रीवास्तव, राम निरंजन, प्रभात सिन्हा, त्रिभुवन निषाद, तरुणा निषाद, राजमणि कुशवाहा, राम बहादुर आदि गणमान्य शामिल रहे

Wednesday, 10 November 2010

घटती गहराई और बढ़ता तापक्रम खतरे का संकेत : प्रो. त्रिपाठी

बीएचयू में पर्यावरण विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी कहते हैं कि गंगा में बढ़ते प्रदूषण और घटते प्रवाह ने नदी ही नहीं वरन जन जीवन को भी खतरे में डाल दिया है। वजह, संतुलित पर्यावरण के लिए नदी में अधिकाधिक गहराई, नियंत्रित तापीय स्थिति और पानी में वेग का होना बेहद जरूरी है। नदी की गहराई ज्यादा होगी तो नीचे का ताप कम होगा। जब ताप कम होगा तो पानी में आक्सीजन रखने की क्षमता अधिक होगी और पानी का वेग अवजल की मात्रा को घटाता जाएगा। गंगा की मौजूदा दशा ठीक इसके विपरीत है। अत्यधिक जल दोहन से नदी की गहराई जहां कम होती जा रही है वहीं तलहटी का तापक्रम सामान्य से कही अधिक होता जा रहा है और पानी में आक्सीजन रखने की क्षमता घटती जा रही है। गंगा में पानी का वेग घटने और दूषित जल की मात्रा बढ़ने से गंगा घाटी में विपरीत माहौल तैयार होता जा रहा है। प्रो.त्रिपाठी ने बताया कि पिछले दिनों राष्ट्रीय गंगा नदी बेसीन प्राधिकरण की बैठक में गंगा की अविरलता और निर्मलता सुनिश्चित करने पर गहन चर्चा हुई। कहा गया कि गाद जमा होने से गंगा की जलग्रहण क्षमता घटती जा रही है लिहाजा प्रदूषण डाइल्यूशन प्रक्रिया भी गिरती जा रही है। ऐसे में गंगा से पानी निकासी रोकने और सिंचाई की व्यवस्था के लिए कोई और विकल्प तलाशने पर विचार करने का निश्चय किया गया

लड़खड़ाया गंगा का इको सिस्टम

वाराणसी, संवाददाता : नदी विज्ञान की अनदेखी कर लिये जा रहे निर्णय से गंगा का पारिस्थितिकी तंत्र (इको सिस्टम) असंतुलित होता जा रहा है। इसके चलते गंगा घाटी क्षेत्र में पर्यावरण संतुलन बिगड़ने का खतरा गहराने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नदी की प्रकृति को समझे बगैर कोई कार्ययोजना अथवा कानून गंगा के संदर्भ में बनता है तो वह न प्रभावी होगा और न व्यावहारिक, क्योंकि गंगा का विज्ञान एक शरीर का विज्ञान है। यह केवल जल का नहीं वरन जीव-जंतु, पेड़-पौधों के संवर्धन और वातावरण संतुलन का आधार भी है। मानवीय जीवन में गंगा की महत्ता को देखते हुए ही वेद, पुराण, उपनिषद् आदि ग्रंथों में गंगा को जीवनदायिनी की संज्ञा दी गई है। आज डैम, बैराज एवं नहरों द्वारा अवैज्ञानिक तरीके से गंगा जल के दोहन और अनियंत्रित अवजल प्रवाह से नदी का इको सिस्टम लड़खड़ा गया है। नतीजन उसकी सारी शक्तियां विलुप्त होती जा रही हैं। काशी में बालू क्षेत्र का विस्तार, सिमटता पाट इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। लिहाजा गंगा घाटी क्षेत्र में मृदाक्षरण बढ़ने, भूमिगत जल स्तर गिरने, पेड़-पौधों के सूखने जैसे हालात बनते जा रहे हैं।