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Monday, 12 March 2012

मरी संवेदना जगाने की कवायद है गंगा तप लेखक: अरुण तिवारी

इलाहाबाद। 19 जनवरी 2012। आखिर कोई तो वजह होगी कि गंगा के लिए अपनी जान देने वाले बिहार के सपूत स्वामी निगमानंद की अग्नि अभी शांत भी नहीं हुई है कि पांच और गंगा पुत्रों को अपने बलिदान की जरूरत आन पड़ी है। इन पांचों में एक सदस्य ऐसा भी है, जो राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्राधिकरण का विशेषज्ञ सदस्य है- जलपुरुष राजेंद्र सिंह। सदस्य होने के नाते जो बात वह सीधे प्राधिकरण में कह सकते थे। आखिर कोई तो कारण होगा, जो उन्हें अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए तप यह रास्ता अख्तियार करना पड़ा है? राजेंद्र सिंह कहते हैं- “प्रधानमंत्री जी, प्राधिकरण के अध्यक्ष हैं। प्राधिकरण के विशेषज्ञ सदस्यों के प्राधिकरण में बने रहने के औचित्य को लेकर हमने बहुत पहले ही प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखा था। लेकिन जब कोई सरकार असंवेदनशील हो जाये। सुनना बंद कर दे।... तो मेरे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता के पास और क्या रास्ता बचता है; सिवाय इसके कि हम तप और आत्मबलिदान के रास्ते पर बढ़ जायें। गंगा सिर्फ एक नदी नहीं है। गंगा, लाखों की आजीविका- आस्था और दुनिया में भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक भी है। हम यही सोचकर हतप्रभ हैं कि कोई सरकार गंगा जैसी महान धारा के प्रति असंवेदनशील कैसे हो सकती है! समाज और संतों की यह साझा तपस्या ऐसी सरकारों को संवेदनशील बनाने के लिए ही है।’’

सच है कि स्वामी निगमानंद के बलिदान के बावजूद सरकारों के रवैये में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता; न केंद्र में और न राज्यों में। गठन के चार साल पूरे होने को हैं। इस बीच प्राधिकरण की मात्र दो बैठकें बताती हैं कि प्रधानमंत्री के पास गंगा के लिए समय नहीं है। मायावती किसी बैठक में आई ही नहीं। रमेशचंद्र पोखरियाल निशंक जब तक रहे, उत्तराखण्ड में नदी रोको परियोजनायें कैसे बनें - इसी की जुगत करते रहे। शेष राज्यों के प्रतिनिधियों की प्राथमिकता भी गंगा के लिए आये कर्ज में से अपने राज्य का हिस्सा तय करने से ज्यादा कुछ नहीं रहा। ऐसे राजनैतिक परिवेश वाले देश में स्वामी निगमानंद का बलिदान व्यर्थ न जाने पाये; तपस्या यह सुनिश्चित करने के लिए भी है। उल्लेखनीय है कि मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व गंगासागर में पांच गंगापुत्रों ने गंगा की अविरलता-निर्मलता की गारंटी होने तक महातपस्या का संकल्प लिया था। इससे पहले प्रधानमंत्री को कई पत्र लिखे गये। मुंबई में प्रेसवार्ता कर मीडिया के जरिये संदेश दिया गया। संकल्प में कहा गया था कि जब तक गंगा की अविरलता- निर्मलता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी मांगों को सरकार मंजूर नहीं कर लेती, एक-एक कर अनेक संत क्रमशः अन्न, फल, जल त्याग करते हुए तप करेंगे।

स्वामी ज्ञानस्वरूप ‘सानंद’ (प्रो. जीडी अग्रवाल) ने इलाहाबाद में इस तप का श्रीगणेश कर दिया हैं। मकरसंक्रान्ति से माघ पूर्णिमा (15 जनवरी से 07 फरवरी) तक माघ मेले में अन्न त्याग। पूरे फाल्गुन माह (08 फरवरी से 8 मार्च) मातृसदन, हरिद्वार में फल त्याग। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (9 मार्च से आगे) श्रीविद्यामठ, वाराणसी में जल त्याग। प्राण जाने पर दूसरा संत इस तप को आगे बढ़ायेंगे। अपने नये नामकरण के साथ गंगा सेवा अभियानम् के भारत प्रमुख की भूमिका में प्रो. अग्रवाल भले ही नये हों, लेकिन अनशन कर सरकार झुकाने का उनका अभ्यास पुराना है। गंगोत्री से उत्तरकाशी के बीच बिजली परियोजनाओं को रद्द कराने में उनके अनशन की भूमिका को भला कौन भूल सकता है? संकल्पित पांच गंगा पुत्रों में प्रो. जी डी. अग्रवाल और गंगा जलबिरादरी प्रमुख राजेंद्र सिंह के अलावा तीन अन्य हैं- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, गंगाप्रेमी भिक्षुजी तथा ब्रह्मचारी श्री कृष्णप्रियानंदजी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी की पहचान शंकराचार्य जी के शिष्य प्रतिनिधि होने के अलावा गंगा सेवा अभियानम् के सार्वभौम प्रमुख के रूप में भी हैं। गंगा सेवा अभियानम् - बद्रिकाश्रम और शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी की पहल पर गठित संगठन है।

चिंता का मूल कारण: असंवेदनशील व निष्प्रभावी प्राधिकरण


गंगा सेवा अभियानम् ने तीन जनवरी, 2012 को प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र लिखकर संकल्प की सूचना दे दी थी। पत्र में राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्राधिकरण के गठन को दोषपूर्ण बताते हुए उसकी कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाये गये हैं। लिखा है कि प्राधिकरण का पर्यावरण एवम् वन मंत्रालय के अधीन होना गैरवाजिब है। प्राधिकरण में गैरसरकारी विशेषज्ञ सदस्यों की राय की उपेक्षा इस हद तक है कि वे निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं। अभियानम् ने क्षोभ व्यक्त किया है कि प्राधिकरण पत्रों के उत्तर तक नहीं देता। वह एक निष्प्रभावी संस्था है। गंगा सेवा अभियानम् इसलिए भी खफा है कि तमाम तर्कों, आंदोलनों और प्रतिवेदनों के बावजूद गंगा व उसकी सहायक धाराओं पर परियोजनाओं के काम पर कोई लगाम नजर नहीं आ रही है।

अभियानम् ने पूर्व में बिजनौर में छैया और गजरौला में बागपत नाले के जरिये गंगा में आ रहे विषाक्त औद्योगिक प्रदूषण पर प्राधिकरण का ध्यान इंगित किया था। पर प्राधिकरण को पैसा बांटने से ही फुर्सत नहीं, वह गंगा को प्रदूषित कर रहे अवजल को रोकने के लिए ठोस पहल कैसे करे! अभियानम् ने सूचना के अधिकार के तहत 9 जुलाई, 2011 को पत्र लिखकर नरोरा से प्रयाग के बीच न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित करने की बाबत जानना चाहा था। जवाब में पर्यावरण मंत्रालय तब भी नहीं जागा। उसने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। दरअसल, जयराम रमेश के मोबाइल तक तो गंगा कार्यकर्ताओं की पंहुच थी। सीधे संवाद भी बना रहा। किंतु नई पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने तो जैसे सुनना ही बंद कर दिया। बद्रीनाथ धाम के नीचे नियमों व पर्यावरण हितों की अनदेखी कर रही एक परियोजना को जयंती नटराजन द्वारा हाल ही में जिस तरह व्यक्तिगत दखल देकर चालू कराया गया है; संकल्पित संत उससे भी बुरी तरह क्षुब्ध हैं।

पांच मांगे, जिनके पूरी होने पर ही रुकेगी तपस्या


<span title=गंगा जी के अविरलता, निर्मलता एवं सम्मान के लिए तप करते स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी" title="गंगा जी के अविरलता, निर्मलता एवं सम्मान के लिए तप करते स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी" class="image image-_original " style="border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; border-image: initial; margin-right: 10px; " height="300" width="424">गंगा जी के अविरलता, निर्मलता एवं सम्मान के लिए तप करते स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जीगंगा क्यों बने राष्ट्रीय नदी प्रतीक? गांधी जयंती, वर्ष 2008 को छपी इस पुस्तक में सर्वप्रथम मांग की गई थी कि राष्ट्रीय ध्वज, पक्षी, पशु और पुष्प की भांति गंगा के प्रति संवैधानिक सम्मान व अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए उसे राष्ट्रीय नदी प्रतीक के रूप मान्यता दी जाये। किंतु सरकार ने उसे राष्ट्रीय नदी मात्र घोषित कर इतिश्री कर ली। नतीजा यह हुआ कि घोषणा, कोरी ही साबित हुई। आशंकायें सच हुईं। सरकार ने उसका राष्ट्रीय सम्मान सुनिश्चित करने की बाध्यता आज तक नहीं समझी। पत्र इसे लेकर भी चिंतित है। अभियानम् ने अपनी पांचसूत्री मांगपत्र में साफ कहा है कि सरकार गंगा को संवैधानिक रूप राष्ट्रीय नदी घोषित करने, यथोचित सम्मान देने व प्रबंधन की दृष्टि से समुचित, सक्षम और सशक्त बिल संसद में पारित करे। सम्मान व व्यवहार के अनुशासन का मतलब गंगा के अपमान करने, हानि पहुँचाने तथा उसके व्यावसायिक उपयोग करने को दंडित करना है। कहा गया है कि सम्मान व व्यवहार के कायदे बाढ़क्षेत्र के दोनों ओर कम से कम 5 किमी. के दायरे में लागू हों।

उत्तराखण्ड में विष्णु प्रयाग से लेकर देवप्रयाग तक के पंच प्रयागों का निर्माण करने वाली नदियों की मूलधाराओं के मार्ग को अवरुद्ध करने वाली सभी परियोजनाओं को तत्काल प्रभाव से निरस्त/बंद कर दिया जाये। विष्णुगंगा, पिंडर नंदाकिनी, मंदाकिनी और भागीरथी नामक धारायें अलकनंदा की मूलधारा से मिलकर इन पंच प्रयागों का निर्माण करती हैं। मांग यह भी है कि भविष्य में देवप्रयाग से आगे गंगासागर तक गंगा की मूलप्रवाह को रोकने वाली कोई परियोजना न रहे। नरोरा से प्रयाग तक हर बिंदु पर हर समय 100 घनमीटर प्रति सेकेंड का प्रवाह सुनिश्चित हो। कुंभ और माघ मेले के अलावा गंगा दशहरा, मौनी अमावस्या, कार्तिक पूर्णिमा आदि विशेष स्नान के मौकों पर न्यूनतम प्रवाह 200 घनमीटर प्रति सेकेंड की मांग की गई है। गंगा के नाम पर लिए गये कर्ज के पैसे से हो रहे नगर उन्न्यन के काम पर हो रहे खर्च पर एतराज जताया गया है। मांग है कि ऐसी परियोजनाओं को तब तक के लिए तत्काल रोक दिया जाये, जब तक इनकी इस दृष्टि से समीक्षा नहीं हो जाती कि ये गंगा के लिए हितकर हैं या नहीं।

प्रदूषण के निर्णायक हल के लिए जरूरी है कि गंगा व उसमें मिलने वाली नदी व नालों में विषाक्त रसायन वाले अवजल डालने वाले उद्योगों को गंगा से कम से कम 50 किमी दूर खदेड़ा जाये। प्रदूषित अवजल वाला कोई भी नाला प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में गंगा में न जाये। चुनाव सामने है। सरकार की प्राथकिता क्या होगा? गंगा का क्या होगा? पता नहीं। फिलहाल तो प्राधिकरण की आपात बैठक बुलाने के अनुरोध वाले 20 नवंबर, 2011 के पत्र का उत्तर विशेषज्ञ सदस्यों को भेज दिया गया है। गंगा प्राधिकरण 16 फरवरी को बैठेगा। देखना यह है कि गंगा किनारे बैठे तपस्वी और प्राधिकरण के भीतर बैठे विशेषज्ञ सदस्यों की मान मनौव्वल में प्राधिकरण सफल होता है या अगली होली कुछ और ही रंग लेकर आयेगी।

वक्त आ गया है कि विशेषज्ञ प्राधिकरण छोड़ें

वक्त आ गया है कि विशेषज्ञ प्राधिकरण छोड़ें। गंगा प्राधिकरण के तीन साल के कार्यों की समीक्षा हो। उसी संदर्भ को सजींदगी से लेते हुए 10 में से तीन विशेषज्ञ सदस्यों ने 10 मार्च को अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को फैक्स कर दिया। मैगसेसे सम्मानित राजेन्द्र सिंह, प्रो. राशिद हयात सिद्दिकी और रवि चोपड़ा। मैगसेसे सम्मानित एम सी मेहता, सुप्रीम कोर्ट के नामी वकील संजय पारिख और ’आईआई टीयन फॉर होली गंगा’ नामक संगठन के अध्यक्ष केके धर ने प्रेस वार्ता में पहुंच कर इस्तीफे को जायज बताते हुए अपना समर्थन जताया। इसके अलावा देशभर से बड़ी संख्या में ईमेल और फोन के जरिये संगठनों और लोगों ने इस्तीफे को प्रशंसनीय कदम करार दिया है।

प्रत्यक्षम् किम प्रमाणम्

इस्तीफा देने वाले सदस्यों ने आहूत प्रेस वार्ता में प्राधिकरण की निष्क्रियता व अधिकारिक सदस्यों की संवेदनहीनता के प्रत्यक्ष उदाहरण दिये - ’’तीन वर्षों में मात्र दो बैठकें। उस पर भी सरकारी अफसरों द्वारा पहले से तय एजेंडा। उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और प. बंगाल - तीन मुख्यमंत्रियों के पास बैठक के लिए समय नहीं। उत्तरांचल के मुख्यमंत्री ने बैठक में जो कहा, उसके विपरीत ऊर्जा के नाम पर नदियों पर कहर ढाया। उत्तर प्रदेश ने एक्सप्रेसवे बनाकर गंगा-यमुना की जमीन बेच डाली। बिहार की प्राथमिकता रेत खनन, पनबिजली परियोजनायें और बाढ़. राहत का पैसा है, नदी और बाढ़ मुक्ति नहीं। झारखण्ड के हिस्से में थोड़ी सी गंगा है। वह कांवड़ियों पर खर्च कर ही काम चला रहा है। प. बंगाल ने गंगा के नाम पर सबसे ज्यादा 600 करोड़ रूपये खींच लिए। प्राधिकरण ने 3000 करोड़ की परियोजनायें मंजूर कर दी। उस पैसे से प. बंगाल, नदी में निर्माण कर घाट व दीवारें बना रहा है। गंगा के नाम पर आये पैसे से कानपुर, इलाहाबाद और बनारस की सड़के खोद डाली गई हैं। एसटीपी जैसे ढांचे बनाये जा रहे हैं। गंगा के नाम पर निर्माण और सिर्फ निर्माण के अलावा कुछ नहीं हो रहा है। गंगा कार्य योजना में भी तो यही हुआ था। फर्क सिर्फ यह है कि गंगा कार्ययोजना में तो सिर्फ 15 सौ करोड़ खर्च हुआ था, अब हम 15 हजार करोड़ बहा रहे हैं। चिंता तो इस बात की है कि इस सब पर विशेषज्ञ सदस्यों की राय लेना तो दूर, उन्हें बताया भी नहीं जा रहा। तो आखिर हम प्राधिकरण क्यों रहें ? क्या हम सिर्फ रबर स्टैंप बने रहने के लिए हैं ?

बेबसी ने किया विवश- ’’नो वन कैन टेक सैंड फ्राम गंगा’’ - पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के इस बयान का जिक्र करते हुए चोपड़ा ने आश्चर्य जताया कि बावजूद इसके देवप्रयाग के ऊपर मलेथा तक दर्जनों ट्रक रेत पर रेत उठा रहे हैं। उत्तराखण्ड जाकर देखिए। सड़क बन रही हो चाहे बांध या पुल... मलबा बेखौफ नदियों में डाला जा रहा है। यह सरकार के अपने बनाये कानूनों का उल्लंघन है। टिहरी बांध के नियमित पानी न छोड़ने से जहां कभी रेत दिखाई नहीं देता था, वहां भी गंगा में बालू के ढेर दिखाई देने लगे हैं। ऋषिकेश से 14 -15 किमी ऊपर नदी सूख गई है। उत्तराखण्ड में बिजली के नाम पर गंगा का शोषण जारी है, उत्तर प्रदेश में प्रदूषण। लोग हमसे पूछ रहे हैं कि आपके रहते यह सब कैसे हो रहा है ? हम सरकार से कहते रहे हैं कि हमे हमारी अधिकारिक भूमिका बताइये। सारी गलतियां हो ही रहीं हैं, तो प्राधिकरण और उसकी सदस्यता का क्या मतलब है ? उसमें विशेषज्ञों को सदस्य क्यों बने रहना चाहिए ? 9 में से 7 विशेषज्ञ सदस्यों ने 20 नवंबर, 2011 को प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखकर यही पूछा था। अपनी सभी चिंतायें रखी थी। आपात् बैठक की मांग की थी। एजेंडा दिया था। वह बैठक आज तक नहीं हुई। 9 फरवरी को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से मिलकर अपनी चिंता जताई। उम्मीद की कि गंगा संरक्षण और प्रबंधन के सशक्त कानून बनाने की अपील पर कुछ प्रतिक्रिया होगी।

प्रो. सिद्दिकी ने कहा कि गोमुख से गंगा मूल की 135 किमी धारा के क्षेत्र को इको सेंसटिव यानी पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील अधिसूचित करने का निर्णय प्राधिकरण की एक उपलब्धि होती, लेकिन जब उसके मार्गदर्शी बिंदु सामने आये तो हम अवाक् रह गये। हमारी राय और हमारी सदस्यता.. दोनो ही जैसे मजाक बनकर रह गये हैं।

तपस्या की अनदेखी ने लांघी लक्ष्मणरेखा

राजेन्द्र सिंह ने प्राधिकरण की संवेदनशून्यता पर प्रहार करते हुए सवाल किया- ’’14 जनवरी से गंगा की अविरलता के लिए तपस्या पर बैठे प्रों जीडी अग्रवाल ने 9 मार्च से जल भी त्याग दिया है। उनकी हालत नाजुक है। प्रशासन ने उन्हें जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया है। आज तक सरकार का कोई प्रतिनिधि उनसे मिलने तक नहीं गया है। वे प्राण छोड़ने पर तत्पर हैं। भला ऐसे में हम पद पर कैसे बने रह सकते हैं ?’’

रवि चोपड़ा ने प्रो. जीडी अग्रवाल के गंगा के लिए अतिआवश्यक बताते हुए स्पष्ट किया कि वह पनबिजली के विरोधी नहीं हैं। वह जानते हैं कि देश के लिए नदी और बिजली... दोनो ही जरूरी है। उनका विश्वास है कि बांधों के नये डिजाइन बनाकर ऐसा किया जा सकता है। भारत में ऐसे डिजाइन बनाने वालों में प्रो. जीडी अग्रवाल से बड़ा नाम दूसरा नहीं है। सरकार उन्हें मारे नहीं, उनके प्राण बचाकर उनके ज्ञान का सदुपयोग करे।

कानून होते हुए भी उसकी उचित पालन न होने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए एमसी मेहता और संजय पारिख ने आगाह किया कि राष्ट्रीय नदी घोषित किया है, तो सरकार उसका सम्मान भी सुनिश्चित करे; तभी उसका महत्व है। उन्होंने प्राधिकरण को सक्रिय करने के लिए सभी से एकजुट होने की भी अपील की। मेहता ने कहा कि गंगा को महज् एक नदी मानना गलत है। गंगा भारत की सांस्कृतिक थाती है। इसे खोना बड़ी क्षति होगी।

अगला कदम क्या होगा ?

इसके जवाब में राजेन्द्र सिंह ने बताया कि देशभर के नदी, संस्कृति, कानून व सामाजिक विशेषज्ञों को जोड़कर जलबिरादरी पिछले एक साल से गंगा के संरक्षण व प्रबंधन हेतु जरूरी कानून का प्रारूप तैयार कर रही है। अगले एक सप्ताह के भीतर इस प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया जायेगा। सरकार उसे आधार बनाकर कानून बनाये। सरकार को इस हेतु बाध्य करने के लिए रणनीति बनाई जायेगी।

प्रेस वार्ता में उद्धृत उक्त विचारों, संदर्भों ने प्राधिकरण की निष्क्रियता पर तो निशाना साधा ही, राज्य सरकारों द्वारा राज्य प्राधिकरण व नदियों की उपेक्षा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जरूरत है कि हमारी नदियों के प्रति समाज व संतों के रवैये पर भी कोई सवाल उठाये ? संभव है कि तब समाज, संत और सरकार.... तीनों की तरफ से जवाब आने शुरू हों और नदियों के प्रति मरी हमारी संवेदनायें जाग उठें।... नाला बन चुकी धारायें पुनः नदी बन जायें। काश! कि ऐसा हो।