Monday, 12 March 2012
राजस्व तालाबों की कब्जा मुक्ति उत्तर प्रदेश का एक प्रेरक शासनादेश लेखक: अरुण तिवारी
जो जमीन राजस्व की है... पंचायती है; जो किसी एक की निजी नहीं, उस पर अपना हक जमाना एक जमाने से जबरों का जन्म सिद्ध अधिकार रहा है। इन जबरों में सरकारी दफ्तर भी खाली रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मायने में यह बात कुछ ज्यादा ही लागू होती है। इस जन्म सिद्ध अधिकार के चलते शहरों की लाल डिग्गियों पर आज इमारतें खड़ी हैं। सीताकुण्ड कोई कुण्ड नहीं, मकानों का झुण्ड है। लालबाग की जमीन पर कोठियां हैं। गांवों में चारागाह नाम की कोई जगह नहीं है। जिस जगह पर कभी गांव का खलियान लगता था, उस पर किसी दबंग का अड्डा चलता है। दो लाठे के चकरोड सिकुड़कर दो फुट हो गये हैं। कागज पर दर्ज 60 बीघे रकबे का तालाब मौके पर 6 बीघे भी नहीं है। तालाब की कब्जा हुई जमीन पर बाग है, खेत है, मकान है, लेकिन तालाब नहीं है। “अब यह उपयोग में नहीं है’’ - यह कहकर अन्य उपयोग हेतु तालाबों, चारागाहों आदि सार्वजनिक उपयोग की भूमि के पट्टे करने में उत्तर प्रदेश के ग्राम प्रधानों ने खूब उदारता दिखाई है। सरकारी योजनाओं, लेखपालों और चकबंदी विभाग ने भी इसमें खूब भूमिका निभाई है। रिकार्ड खंगाले जायें, तो इतने कस्बे, सरकारी दफ्तर और उद्योग उत्तर प्रदेश के झील-तालाबों के हिस्से की जमीन मारकर बैठे दिखाई देंगे, कि गिनती मुश्किल हो जायेगी। निजी तालाब भी इसी अधिकार के शिकार होते रहे हैं।
ऐसे ही शिकार हुए तालाबों के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने रास्ता दिखाया। उस आदेश को आधार बनाकर उत्तर प्रदेश की राजस्व परिषद ने जो शासनादेश जारी किया, वह ऐतिहासिक भी है, और प्रेरक भी।
मामला है-सिविल अपील संख्या- 4787/2001, हिंचलाल तिवारी बनाम कमलादेवी, ग्राम उगापुर, तालुका आसगांव, जिला - संतरविदास नगर, उ. प्र. इस मामले में तालाबों की सार्वजनिक उपयोग की भूमि के समतलीकरण कर यह करार दिया गया था कि वह अब तालाब के रूप में उपयोग में नहीं है। इसी बिना पर तालाबों की ऐसी भूमि का आवासीय प्रयोजन हेतु आवंटन कर दिया गया था। इस मामले में दिनांक-25.07.2001 को पारित हुए आदेश कोर्ट ने जंगल, तालाब, पोखर, पठार तथा पहाड़ आदि को समाज की बहुमूल्य मानते हुए इनके अनुरक्षण को पर्यावरणीय संतुलन हेतु जरूरी बताया है। निर्देश है कि तालाबों को ध्यान देकर तालाब के रूप में ही बनाये रखना चाहिए। उनका विकास एवम् सौन्दर्यीकरण किया जाना चाहिए, जिससे जनता उसका उपयोग कर सके। आदेश है कि तालाबों के समतलीकरण के परिणामस्वरूप किए गए आवासीय पट्टों को निरस्त किए जायें। आवंटी स्वयं निर्मित भवन को 6 माह के भीतर ध्वस्त कर तालाब की भूमि का कब्जा ग्रामसभा को लौटायें। यदि वे स्वयं ऐसा न करें, तो प्रशासन इस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराये।
यूं तालाब/पोखर के अनुरक्षण के संबंध में उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद का पूर्व में भी एक आदेश था। किंतु सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश का संज्ञान लेते हुए परिषद ने नये सिरे से 08 अक्तूबर को एक महत्वपूर्ण शासनादेश जारी किया। जिसकी याद दिलाते हुए परिषद के अध्यक्ष आदित्य कुमार रस्तोगी ने 24 जनवरी 2002 को पुनः पत्र जारी किया। तद्नुसार आवासीय प्रयोजन के लिए आरक्षित भूमि को छोड़कर किसी अन्य सार्वजनिक प्रयोजन की आरक्षित भूमि को आवासीय प्रयोजन हेतु आबादी में परिवर्तित किया जाना अत्यन्त आपत्तिजनक है। शासनादेश शीतकालीन भ्रमण के दौरान ऐसे मामले की जानकारी खुद करने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा सुप्रीम कोर्ट निर्णयानुसार कार्यवाही करने हेतु राजस्व विभाग के अधिकारी यानी लेखपाल, कानूनगो, तहसीलदार व उप जिलाधिकरियों को जिम्मेदारी देता है। ऐसी भूमि की सुरक्षा के लिए परिषद राहत कार्यों तथा पंचायती राज विभाग की योजनाओं के तहत् सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण, तालाबों की मेड़बंदी और उन्हें गहरा करने की जिम्मेदारी भी राजस्व विभाग को देता है।
जिलाधिकारियों व मंडलायुक्तों से स्वयंमेव निगरानी की भूमिका में आने की अपेक्षा करते हुए परिषद कहता है कि राजस्व विभाग के जो अधिकारी ऐसा न करें, भूराजस्व अधिनियम की धारा 218 के तहत् उनके विरुद्ध कार्यवाई की जा सकती है अथवा डी जी सी राजस्व के माध्यम से निगरानी का प्रार्थना की जा सकती है। मंडलायुक्तों की यह जिम्मेदारी है कि वे समय-समय पर इस बाबत् संबंधित जिलाधिकारियों से सूचना एकत्र कर अपनी आख्या के साथ राजस्व परिषद को एफ डी ओ में शामिल कर भेजते रहें। पंचायतीराज संस्थानों, जिला परिषद समितियों, जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों, अधिवक्ता संघों आदि सभी पक्षों को सुप्रीम कोर्ट तथा परिषद के संबंधित आदेश से अवगत कराने, प्रचारित करने की अपेक्षा शासनादेश में की गई है। स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद का उक्त शासनादेश सार्वजनिक उपयोग की भूमि को कब्जा मुक्त कर सिर्फ सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी प्रशासन पर नहीं डालता, उसे उसके मूल स्वरूप में लौटाने का दायित्व भी सुनिश्चित करता है। इस आदेश का उपयोग कर प्रतापगढ़ जिले के एक जिलाधिकारी ने तालाबों की कब्जा मुक्ति की बड़ी मुहिम छेड़ी थी। जिलाधिकारी के हटने पर वे फिर कब्जा होने शुरू हो गये। क्यों? क्योंकि प्रशासन उसे मूल स्वरूप में लौटाने के बजट आधारित कार्य कराने से चूक गया। जनता तालाबों के उपयोग से ज्यादा अपने लालच में फंसी रही।
उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के गांव डौला की तर्ज पर कई स्थानों पर निजी प्रयास के जरिए कब्जा मुक्ति की अच्छी कोशिशें हुई जरूर, किंतु ज्यादातर जगह प्रशासन आज भी अपेक्षा करता है कि कब्जा मुक्ति के इस प्रशासनिक दायित्व की याद दिलाने कोई उसके पास न आये। कब्जा मुक्ति के निजी प्रयास करने वालों को सहयोग करना या प्रोत्साहित करना तो दूर, प्रशासन निरुत्साहित ही ज्यादा करता है। अच्छा बस! इतना ही है कि अब तालाबों की सूची तथा रकबा आदि संबंधित जानकारियां कम्पयूटरीकृत की जा चुकी हैं। आर टी आई का माध्यम हमारे पास है। कोशिश करें, तो प्रशासन कार्रवाई को बाध्य होगा ही। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट ने भी कई बार प्रशासन को इस बाबत् तलब किया है। रिपोर्ट मांगी है। किंतु दी गई कागज पर दी जानकारियां जमीनी हकीकत से आज भी मेल नहीं खाती हैं। चूंकि जमीनी जानकारी देने से पहले उस कब्जामुक्त कराने की जिम्मेदारी भी जानकारी देने वाले अधिकारी की है और उसने वह जिम्मेदारी नहीं निभाई है। प्रशासन इस जिम्मेदारी को निभाने को तब तक बाध्य नहीं होगा, जब तक कि समाज अपनी सार्वजनिक भूमि को कब्जामुक्त कराने की जिम्मेदारी निभाने आगे नहीं आयेगा। शासन ने रास्ता दिया है। प्रशासन को कार्यवाही करनी है। समाजसेवकों का काम उसे बाध्य करना है। समाजसेवक आगे आयें। समाज उनकी ताकत बढायें। कम से कम जो तालाब और जितना रकबा मौके पर बचा है, उसे तो बचायें। उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश को भी पानीदार बनाने का यही रास्ता है।
राजस्व तालाबों की कब्जा मुक्ति उत्तर प्रदेश का एक प्रेरक शासनादेश लेखक: अरुण तिवारी
जो जमीन राजस्व की है... पंचायती है; जो किसी एक की निजी नहीं, उस पर अपना हक जमाना एक जमाने से जबरों का जन्म सिद्ध अधिकार रहा है। इन जबरों में सरकारी दफ्तर भी खाली रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मायने में यह बात कुछ ज्यादा ही लागू होती है। इस जन्म सिद्ध अधिकार के चलते शहरों की लाल डिग्गियों पर आज इमारतें खड़ी हैं। सीताकुण्ड कोई कुण्ड नहीं, मकानों का झुण्ड है। लालबाग की जमीन पर कोठियां हैं। गांवों में चारागाह नाम की कोई जगह नहीं है। जिस जगह पर कभी गांव का खलियान लगता था, उस पर किसी दबंग का अड्डा चलता है। दो लाठे के चकरोड सिकुड़कर दो फुट हो गये हैं। कागज पर दर्ज 60 बीघे रकबे का तालाब मौके पर 6 बीघे भी नहीं है। तालाब की कब्जा हुई जमीन पर बाग है, खेत है, मकान है, लेकिन तालाब नहीं है। “अब यह उपयोग में नहीं है’’ - यह कहकर अन्य उपयोग हेतु तालाबों, चारागाहों आदि सार्वजनिक उपयोग की भूमि के पट्टे करने में उत्तर प्रदेश के ग्राम प्रधानों ने खूब उदारता दिखाई है। सरकारी योजनाओं, लेखपालों और चकबंदी विभाग ने भी इसमें खूब भूमिका निभाई है। रिकार्ड खंगाले जायें, तो इतने कस्बे, सरकारी दफ्तर और उद्योग उत्तर प्रदेश के झील-तालाबों के हिस्से की जमीन मारकर बैठे दिखाई देंगे, कि गिनती मुश्किल हो जायेगी। निजी तालाब भी इसी अधिकार के शिकार होते रहे हैं।
ऐसे ही शिकार हुए तालाबों के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने रास्ता दिखाया। उस आदेश को आधार बनाकर उत्तर प्रदेश की राजस्व परिषद ने जो शासनादेश जारी किया, वह ऐतिहासिक भी है, और प्रेरक भी।
मामला है-सिविल अपील संख्या- 4787/2001, हिंचलाल तिवारी बनाम कमलादेवी, ग्राम उगापुर, तालुका आसगांव, जिला - संतरविदास नगर, उ. प्र. इस मामले में तालाबों की सार्वजनिक उपयोग की भूमि के समतलीकरण कर यह करार दिया गया था कि वह अब तालाब के रूप में उपयोग में नहीं है। इसी बिना पर तालाबों की ऐसी भूमि का आवासीय प्रयोजन हेतु आवंटन कर दिया गया था। इस मामले में दिनांक-25.07.2001 को पारित हुए आदेश कोर्ट ने जंगल, तालाब, पोखर, पठार तथा पहाड़ आदि को समाज की बहुमूल्य मानते हुए इनके अनुरक्षण को पर्यावरणीय संतुलन हेतु जरूरी बताया है। निर्देश है कि तालाबों को ध्यान देकर तालाब के रूप में ही बनाये रखना चाहिए। उनका विकास एवम् सौन्दर्यीकरण किया जाना चाहिए, जिससे जनता उसका उपयोग कर सके। आदेश है कि तालाबों के समतलीकरण के परिणामस्वरूप किए गए आवासीय पट्टों को निरस्त किए जायें। आवंटी स्वयं निर्मित भवन को 6 माह के भीतर ध्वस्त कर तालाब की भूमि का कब्जा ग्रामसभा को लौटायें। यदि वे स्वयं ऐसा न करें, तो प्रशासन इस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराये।
यूं तालाब/पोखर के अनुरक्षण के संबंध में उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद का पूर्व में भी एक आदेश था। किंतु सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश का संज्ञान लेते हुए परिषद ने नये सिरे से 08 अक्तूबर को एक महत्वपूर्ण शासनादेश जारी किया। जिसकी याद दिलाते हुए परिषद के अध्यक्ष आदित्य कुमार रस्तोगी ने 24 जनवरी 2002 को पुनः पत्र जारी किया। तद्नुसार आवासीय प्रयोजन के लिए आरक्षित भूमि को छोड़कर किसी अन्य सार्वजनिक प्रयोजन की आरक्षित भूमि को आवासीय प्रयोजन हेतु आबादी में परिवर्तित किया जाना अत्यन्त आपत्तिजनक है। शासनादेश शीतकालीन भ्रमण के दौरान ऐसे मामले की जानकारी खुद करने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा सुप्रीम कोर्ट निर्णयानुसार कार्यवाही करने हेतु राजस्व विभाग के अधिकारी यानी लेखपाल, कानूनगो, तहसीलदार व उप जिलाधिकरियों को जिम्मेदारी देता है। ऐसी भूमि की सुरक्षा के लिए परिषद राहत कार्यों तथा पंचायती राज विभाग की योजनाओं के तहत् सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण, तालाबों की मेड़बंदी और उन्हें गहरा करने की जिम्मेदारी भी राजस्व विभाग को देता है।
जिलाधिकारियों व मंडलायुक्तों से स्वयंमेव निगरानी की भूमिका में आने की अपेक्षा करते हुए परिषद कहता है कि राजस्व विभाग के जो अधिकारी ऐसा न करें, भूराजस्व अधिनियम की धारा 218 के तहत् उनके विरुद्ध कार्यवाई की जा सकती है अथवा डी जी सी राजस्व के माध्यम से निगरानी का प्रार्थना की जा सकती है। मंडलायुक्तों की यह जिम्मेदारी है कि वे समय-समय पर इस बाबत् संबंधित जिलाधिकारियों से सूचना एकत्र कर अपनी आख्या के साथ राजस्व परिषद को एफ डी ओ में शामिल कर भेजते रहें। पंचायतीराज संस्थानों, जिला परिषद समितियों, जिला ग्रामीण विकास एजेंसियों, अधिवक्ता संघों आदि सभी पक्षों को सुप्रीम कोर्ट तथा परिषद के संबंधित आदेश से अवगत कराने, प्रचारित करने की अपेक्षा शासनादेश में की गई है। स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद का उक्त शासनादेश सार्वजनिक उपयोग की भूमि को कब्जा मुक्त कर सिर्फ सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी प्रशासन पर नहीं डालता, उसे उसके मूल स्वरूप में लौटाने का दायित्व भी सुनिश्चित करता है। इस आदेश का उपयोग कर प्रतापगढ़ जिले के एक जिलाधिकारी ने तालाबों की कब्जा मुक्ति की बड़ी मुहिम छेड़ी थी। जिलाधिकारी के हटने पर वे फिर कब्जा होने शुरू हो गये। क्यों? क्योंकि प्रशासन उसे मूल स्वरूप में लौटाने के बजट आधारित कार्य कराने से चूक गया। जनता तालाबों के उपयोग से ज्यादा अपने लालच में फंसी रही।
उत्तर प्रदेश के जिला बागपत के गांव डौला की तर्ज पर कई स्थानों पर निजी प्रयास के जरिए कब्जा मुक्ति की अच्छी कोशिशें हुई जरूर, किंतु ज्यादातर जगह प्रशासन आज भी अपेक्षा करता है कि कब्जा मुक्ति के इस प्रशासनिक दायित्व की याद दिलाने कोई उसके पास न आये। कब्जा मुक्ति के निजी प्रयास करने वालों को सहयोग करना या प्रोत्साहित करना तो दूर, प्रशासन निरुत्साहित ही ज्यादा करता है। अच्छा बस! इतना ही है कि अब तालाबों की सूची तथा रकबा आदि संबंधित जानकारियां कम्पयूटरीकृत की जा चुकी हैं। आर टी आई का माध्यम हमारे पास है। कोशिश करें, तो प्रशासन कार्रवाई को बाध्य होगा ही। उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट ने भी कई बार प्रशासन को इस बाबत् तलब किया है। रिपोर्ट मांगी है। किंतु दी गई कागज पर दी जानकारियां जमीनी हकीकत से आज भी मेल नहीं खाती हैं। चूंकि जमीनी जानकारी देने से पहले उस कब्जामुक्त कराने की जिम्मेदारी भी जानकारी देने वाले अधिकारी की है और उसने वह जिम्मेदारी नहीं निभाई है। प्रशासन इस जिम्मेदारी को निभाने को तब तक बाध्य नहीं होगा, जब तक कि समाज अपनी सार्वजनिक भूमि को कब्जामुक्त कराने की जिम्मेदारी निभाने आगे नहीं आयेगा। शासन ने रास्ता दिया है। प्रशासन को कार्यवाही करनी है। समाजसेवकों का काम उसे बाध्य करना है। समाजसेवक आगे आयें। समाज उनकी ताकत बढायें। कम से कम जो तालाब और जितना रकबा मौके पर बचा है, उसे तो बचायें। उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश को भी पानीदार बनाने का यही रास्ता है।
प्रधानमंत्री जी के नाम खुला पत्र लेखक: अरुण तिवारी
प्रतिष्ठा में
माननीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,
प्रधानमंत्री – भारत सरकार एवं अध्यक्ष – राष्ट्रीयनदी गंगा घाटी प्राधिकरण 7,
रेसकोर्स रोड नई दिल्ली- 110001
विषय – राष्ट्रीयनदी गंगा जी की विषम स्थिति में सुधार के उद्देश्य से हमारा तपस्या करने और बलिदान देने का संकल्प।
माननीय प्रधानमंत्री महोदय,
जय गंगे।
आप और आपकी सरकार पुण्य सलिला गंगाजी की हमारी संस्कृति में महत्ता, उनके विलक्षण गुण, उन्हें भारतीय जनमानस की एकता का सूत्र तथा देश की आन, शान और पहचान के रूप में महत्वांकित करती रही है। इसी संदर्भ में आपने पूज्यपाद गुरूदेव ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज को 16-10-2008 को पुण्य सलिला गंगा जी को राष्ट्रीय नदी का सम्मान देने तथा एक राष्ट्रीय नदी गंगा घाटी प्राधिकरण गठित करने का आश्वासन दिया था। पर उन आश्वासनों का छलपूर्ण क्रियान्वयन आपकी एवं आपकी सरकार की भगवती गंगा के प्रति उदासीनता सिद्ध करता है। आपकी सरकार के पिछले तीन वर्ष के गंगा जी के प्रति बेहद अपमानजनक एवं विनाशकारी निर्णयों, क्रियाकलापों तथा हर स्तर पर उनके हितों की पूर्ण अवहेलना ने सिद्ध कर दिया है कि आपकी सरकार अल्पकालीन आर्थिक विकास और भौतिक सुख-सम्पदा की ललक में गंगा जी को बेच देने, उनकी हत्या तक को तैयार है। इसके कुछ उदाहरण हम नीचे दे रहे हैं :
(क) 4 नवम्बर 2008 को प्रधानमंत्री कार्यालय की प्रेस विज्ञप्ति में दिए गए वचनों के छलपूर्ण अनुपालन में जारी पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की 20 फरवरी 2009 की अधिसूचना सं. 328, जिसमें गंगा को राष्ट्रीयनदी का सम्मान देने की बजाय उन्हें एक राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिया गया और इस नाते गंगा जी को कभी भी एक राष्ट्र-चिह्न का सम्मान नहीं दिया गया। जो लचर, सरकार की आर्थिक स्वार्थपूर्ण हितों को प्रमुखता से आगे रखने वाला प्राधिकरण गंगा जी के प्रबंधन के लिए इस अधिसूचना द्वारा गठित किया गया, उसकी 3 वर्ष में मात्र दो छोटी-छोटी बैठकें होना, गंगा से जुड़े किसी भी प्रश्न पर अर्थपूर्ण चर्चा न होना और केवल सरकारी अधिकारियों द्वारा पहले से लिए गए निर्णयों के समर्थन में सिर हिला देना, उस प्राधिकरण की पूर्ण निरर्थकता सिद्ध करते हैं। संलग्न (परिशिष्ट संख्या 1) से जहां उक्त प्राधिकरण से उसके गैर-सरकारी सदस्यों की पूर्ण निराशा सिद्ध हो जाती है; वहीं उनके इस पत्र पर आपके द्वारा कोई भी त्वरित प्रतिक्रिया न होना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए इस बारे में प्रमाण रूप में पर्याप्त है।
(ख) हमारे शास्त्रों एवं लोक-संस्कृति दोनों के अनुसार ब्रह्माजी के कमण्डलु से, शिवजी की जटाओं से होती हुई भगीरथ जी के रथ के पीछे चली धारा भागीरथी, विष्णुपदी होने से बद्रीविशाल के चरणों को छूती धारा अलकनंदा, अलकनंदा पर स्थित पंचप्रयाग (विष्णु प्रयाग, नन्द प्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्र प्रयाग तथा देव प्रयाग) तथा इन प्रयागों पर मिलने वाली गंगाजी की प्रमुख धाराएं (क्रमशः धौली (विष्णु) गंगा, नंदाकिनी, पिण्डर, मंदाकिनी तथा भागीरथी) ये सभी अत्यन्त महत्वपूर्ण पुण्य स्थल/धाराएं हैं। इन धाराओं/स्थलों को हानि पहुँचाने वाली कोई भी छेड़-छाड़ हमें स्वीकार्य नहीं है। वर्तमान में धौली गंगा पर तपोवन-विष्णुगाड़, मंदाकिनी पर फाटा-बिऊग तथा सिंगौली-भटवारी, अलकनंदा पर विष्णु प्रयाग-पीपल कोटी तथा श्रीनगर परियोजना पर निर्माण कार्य भारी जन-विरोध, जिसमें लम्बे धरने, जेल-यात्रा (सुशीला भण्डारी, जगमोहन सिंह आदि), अनशन (जन-नेत्री उमाश्री भारती) शामिल रहे हैं, के बावजूद धड़ल्ले से चल रहा है। इस परियोजनाओं से उक्त प्रमुख धाराओं की अविरलता पूर्णतया नष्ट हो जाएगी। आपकी सरकार इन पर तुरन्त रोक लगाने से तो रही, अभी दो सप्ताह पूर्व उसने अलकनंदा जी पर एक अन्य बड़ी जल-विद्युत परियोजना को ठीक बद्रीनाथ धाम के नीचे, सभी पर्यावरणीय तर्कों को नकारते हुए सीधे मंत्राणी जी (मा.जयन्ती नटराजन्) के व्यक्तिगत हस्तक्षेत्र द्वारा हरी झण्डी दे दी गई। यह सब सीधे-सीधे हमारी भावनाओं और गंगा माँ का, हमारी राष्ट्रीय पहचान का अपमान नहीं तो क्या है? आदि शंकराचार्य भगवत्पाद द्वारा प्रणीत मठाम्नाय महानुशासनम् के अनुसार अलकनंदा धारा ज्योतिष्पीठ का प्रमुखतम तीर्थ है। इसके साथ कोई छेड़-छाड़ हमें स्वीकार नहीं।
(ग) छः मास पूर्व 9 जुलाई 2011 के हमारे पत्र में (देखें परिशिष्ट-2) हमने जो माँग गंगाजी के महत्वपूर्ण भाग (नरौरा से प्रयाग तक) में न्यूनतम प्रवाह बनाए रखने के लिए की थी उस पर आवश्यक निर्णय लेना तो दूर, न तो इस पर चर्चा के लिए प्राधिकरण की बैठक बुलाई गई और न ही हमारे पत्र का, उस पर भेजे स्मरण पत्रों का कोई उत्तर दिया गया। यहां तक कि सूचना के अधिकार के अंतर्गत पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में भी कुछ भी स्पष्ट उत्तर न देकर बात टाल दी गई। प्रयाग का माघ मेला एकदम सिर पर है पर गंगाजी में प्रवाह के बारे में सरकार की नीति में आज भी कोई स्पष्टता नहीं। (देखें परिशिष्ट-3)
(घ) जलप्रदूषण तथा पर्यावरण संरक्षण के तथाकथित कई कानून होने तथा केंद्रीय एवं राज्य सरकारों के सफेद हाथी तुल्य प्रदूषण नियंत्रण तंत्रों के बावजूद नगरीय एवं औद्योगिक अवजल धड़ल्ले से विभिन्न नालों द्वारा गंगा जी में निरंतर उड़ेला जा रहा है। आपके प्रदूषण-नियंत्रण एवं पर्यावरण-संरक्षण तंत्रों के अधिकारीगण इन विषयों में कितने संवेदनशील या कर्तव्यपरायण हैं यह तो इनकी पिछले कई दशकों की (जल-प्रदूषण बिल 1974 में पास हुआ था तो पर्यावरण संरक्षण बिल 1985 में) कार-गुजारियों से स्पष्ट है ही, पर हमारे इस विषय के पत्र पर (देखें परिशिष्ट-4) पूर्ण चुप्पी साध जाना, कोई उत्तर तक न देना, माँ गंगा और जनभावनाओं के प्रति उनकी अवहेलना-भरे भाव और निरंकुशता का भी प्रमाण है। विशेषतया धातु उद्योंगों, चमड़ा इकाइयों, कागज कारखानों, रासायनिक उद्योंगो आदि का अवजल अत्यंत विषाक्त तथा प्रदूषणकारी होता है। इनका गंगा जी में गिरना तुरन्त रोका जाना चाहिए।
(ङ) मातृसदन के गंगा-भक्त स्व. स्वामी निगमानंद जी की लम्बी तपस्या और उनके बलिदान के प्रति आपकी और आपकी सरकार की प्रतिक्रियाहीनता क्या आँखे खोल देने वाली नहीं?
(च) सरकारी तंत्र के गंगाजी के प्रति और हम सरीखे गंगाजी के श्रद्धालुओं के प्रति पूर्ण अवहेलना भरे भाव का एक अन्य नया प्रमाण आपकी सरकार की हमारे 20 नवम्बर 2011 के प्रस्ताव, प्रतिवेदन एवं मांग-पत्र (देखें परिशिष्ट- 5) पर जो 14 दिसम्बर 2011 को आपको भेज दिया गया था, कोई भी कार्यवाही या प्रतिक्रिया तक भी न होना है।
उरोक्त परिस्थितियों में हमारे पास आपकी सरकार, उसके तंत्र, उनकी गंगा-विरोधी नीतियों का खुला विरोध करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता। हमारी संस्कृति में आत्मबल को, तपोबल को सबसे ऊपर माना गया – हमारे पास सत्ताबल या भीड़-बल भले न हों पर हमारी आस्था के आगे इन कमियों का कोई महत्व नहीं। तपस्या और बलिदान से तो हमारे पूर्वजों ने देवताओं के आसन हिला दिये थे- हम प्रयास करेंगे अपनी तपस्या से, बलिदान से (एक जीवन से नहीं, एक के बाद एक जीवन से जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाये) आपकी आंखे खोलने, आपके तंत्र का आसन उलटने का।
हमने निश्चय किया है, संकल्प लिया है कि पुण्य सलिला, पतित पावनी माता गंगाजी की सेवा में, उनके हितों की रक्षा के लिये, मकर संक्रांति, माघ कृष्ण सप्तमी संवत् 2068 विक्रमी (तदनुसार रविवार, 15 जनवरी 2012 ई.) से मांग पूर्ति तक ज्योतिष्पीठ के प्रतिनिधि द्वारा निरंतर अनशन करते हुए अपने प्राणों की आहुति देंगे (एक के बाद एक) देते रहेंगे। हमारी मांगें और कार्यक्रम की रूपरेखा साथ की सारणी-1 में दी गई है।
परमपूज्य गुरूदेव ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंनद सरस्वती जी महाराज गंगाजी की प्रमुख धाराओं की अविरलता को एवं सम्पूर्ण गंगाजी की निर्मलता को लेकर अत्यंत चिंतित हैं और हमारे प्रयासों में उनकी प्रेरणा, ऊर्जा और आशीर्वाद हमारे साथ हैं।
आपकी आंखें अब भी खुल जायें तो गंगा मां की आप पर कृपा होगी।
निवेदक
(अविमुक्तेश्वरानंन्दः सरस्वती ‘स्वामिश्रीः’)
सार्वभौम संयोजक गंगा-सेवा-अभियानम्
सारणी -1
हमारी चिंता के मुख्य कारण
1.गंगाजी को राष्ट्र-प्रतीक के अनुरुप महत्व, सम्मान, अतिविशिष्ट स्थान न दिया जाना।
2. गंगा-प्राधिकरण का दोषपूर्ण एवं लचर गठन, उसका पर्यावरण मंत्रालय के आधीन होना, पिछले तीन वर्षों में उसकी शून्य-निकट सक्रियता; गैर-सरकारी सदस्यों की अनदेखी, उनका निष्प्रभावी होना।
3. गंगाजी की विभिन्न धाराओं की अविरलता को नष्ट करने वाली बांध/बराज/सुरंग परियोजनाओं पर धड़ल्ले से चल रहे निर्माण कार्य। एक नई परियोजना को हाल ही में पर्यावरणीय हरी झंडी दिया जाना।
4. गंगाजी में न्यूनतम प्रवाह न बनाये रखा जाना, विशेषतया नरौरा से नीचे।
5. नगरीय तथा औद्योगिक अवजल उड़ेल रहे नालों पर नियंत्रण की दिशा में संतोषजनक पहल नहीं, विषाक्त रासायनिक अवजल पर भी नहीं।
6. सरकार की गंगाजी संबंधित मुद्दों पर संवेदनहीनता। जन-आंदोलनों, प्राधिकरण के गैर-सरकारी सदस्यों के पत्र, हमारे पत्रों के उत्तर तक नहीं।
7. पूज्य स्वामी निगमानंद जी की आहुति से सरकार के रवैये में कोई परिवर्तन न होना।
हमारी तात्कालिक मांगे
1. पंचप्रयागों की निर्मात्री अलकनंदा गंगा, विष्णु-गंगा, नंदाकिनी गंगा और मंदाकिनी गंगा जी पर निर्माणाधीन सभी परियोजनाएं तत्काल बंद/निरस्त हों। भविष्य में भी राष्ट्रीयनदी (अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी की मूलधाराओं सहित गंगासागर तक की मूलधारा) पर अविरलता भंग करने वाली कोई परियोजना न हों।
2. नरौरा से प्रयाग तक हर बिंदु पर, हर समय सदैव 100 घनमीटर/सेकेंड से अधिक प्रवाह रहे। माघमेला, कुंभ तथा पर्व-स्नानों पर न्यूनतम 200 घनमीटर/सेकेंड प्रवाह रखा जाये।
3. गंगाजी के नाम पर ऋण लेकर विभिन्न प्रकार के नगर उन्नयन कार्यों पर धन लुटाने/बांटने पर रोक लगे, चल रहे कार्यों को तुरंत बंद किया जाये और उनकी गहन समीक्षा हो। समीक्षा परियोजनाओं द्वारा गंगाजी को होने वाले लाभ की दृष्टी से हो।
4. विषाक्त रसायनों से प्रदूषित अवजल गंगाजी में या उनमें गिरने वाले नदी-नालों में डालने वाले उद्योगों को गंगाजी से कम से कम 50 किमी. दूर हटाया जाये। सुनिश्चित हो कि उनका अवजल प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी रूप में गंगा जी में न जाए।
5. गंगाजी को संवैधानिक रूप से राष्ट्रीय-नदी घोषित करने, पदोचित सम्मान देने और प्रबंधन के लिये समुचित, सक्षम, सशक्त बिल संसद द्वारा पारित हो।
हमारा तात्कालिक कार्यक्रम
भारत प्रमुख स्वामी ज्ञानस्वरूप ‘सानन्द’ जी द्वारा
1. मकर संक्रांति 2068 वि. के पूर्वदिन (14 जनवरी 2012) को गंगा-सागर में तपस्या का संकल्प
2. मकर संक्रांति से माघपूर्णिमा (15 जनवरी से 07 फरवरी 2012) तक माघ मेला प्रयाग में अन्न त्याग
3. फाल्गुन माह भर (08 फरवरी से 08 मार्च 2012 ) मातृ सदन हरिद्वार में फल त्याग
4. चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (09 मार्च 2012) से श्रीविद्यामठ, वाराणसी में जल त्याग
शरीर जाने पर अन्य गंगा-भक्त द्वारा तपस्यारम्भ.......लक्ष्य प्राप्ति तक यही क्रम........
श्री शंकराचार्य गंगा सेवा न्यास के तत्वावधान में पूज्यपाद अनन्तश्रीविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज द्वारा आरब्ध सार्वभौम गंगा-सेवा-अभियानम्
सार्वभौम संयोजक : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती – शिष्य प्रतिनिधि- पूज्यपाद शंकराचार्य जी महाराज
भारत प्रमुख : स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द (प्रो. जीडी अग्रवाल)
मुख्य कार्यालय – श्रीविद्यामठ, केदारघाट, वाराणसी – 221001 उ.प्र.)
दूरभाष – 0542-2450520, 2450362
मो. 09005485481 Email : gangaseva@gmail.com
Website: www.ganga-sevaa-abhiyaanam.org
मरी संवेदना जगाने की कवायद है गंगा तप लेखक: अरुण तिवारी
सच है कि स्वामी निगमानंद के बलिदान के बावजूद सरकारों के रवैये में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता; न केंद्र में और न राज्यों में। गठन के चार साल पूरे होने को हैं। इस बीच प्राधिकरण की मात्र दो बैठकें बताती हैं कि प्रधानमंत्री के पास गंगा के लिए समय नहीं है। मायावती किसी बैठक में आई ही नहीं। रमेशचंद्र पोखरियाल निशंक जब तक रहे, उत्तराखण्ड में नदी रोको परियोजनायें कैसे बनें - इसी की जुगत करते रहे। शेष राज्यों के प्रतिनिधियों की प्राथमिकता भी गंगा के लिए आये कर्ज में से अपने राज्य का हिस्सा तय करने से ज्यादा कुछ नहीं रहा। ऐसे राजनैतिक परिवेश वाले देश में स्वामी निगमानंद का बलिदान व्यर्थ न जाने पाये; तपस्या यह सुनिश्चित करने के लिए भी है। उल्लेखनीय है कि मकर संक्रान्ति से एक दिन पूर्व गंगासागर में पांच गंगापुत्रों ने गंगा की अविरलता-निर्मलता की गारंटी होने तक महातपस्या का संकल्प लिया था। इससे पहले प्रधानमंत्री को कई पत्र लिखे गये। मुंबई में प्रेसवार्ता कर मीडिया के जरिये संदेश दिया गया। संकल्प में कहा गया था कि जब तक गंगा की अविरलता- निर्मलता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी मांगों को सरकार मंजूर नहीं कर लेती, एक-एक कर अनेक संत क्रमशः अन्न, फल, जल त्याग करते हुए तप करेंगे।
स्वामी ज्ञानस्वरूप ‘सानंद’ (प्रो. जीडी अग्रवाल) ने इलाहाबाद में इस तप का श्रीगणेश कर दिया हैं। मकरसंक्रान्ति से माघ पूर्णिमा (15 जनवरी से 07 फरवरी) तक माघ मेले में अन्न त्याग। पूरे फाल्गुन माह (08 फरवरी से 8 मार्च) मातृसदन, हरिद्वार में फल त्याग। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (9 मार्च से आगे) श्रीविद्यामठ, वाराणसी में जल त्याग। प्राण जाने पर दूसरा संत इस तप को आगे बढ़ायेंगे। अपने नये नामकरण के साथ गंगा सेवा अभियानम् के भारत प्रमुख की भूमिका में प्रो. अग्रवाल भले ही नये हों, लेकिन अनशन कर सरकार झुकाने का उनका अभ्यास पुराना है। गंगोत्री से उत्तरकाशी के बीच बिजली परियोजनाओं को रद्द कराने में उनके अनशन की भूमिका को भला कौन भूल सकता है? संकल्पित पांच गंगा पुत्रों में प्रो. जी डी. अग्रवाल और गंगा जलबिरादरी प्रमुख राजेंद्र सिंह के अलावा तीन अन्य हैं- स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, गंगाप्रेमी भिक्षुजी तथा ब्रह्मचारी श्री कृष्णप्रियानंदजी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी की पहचान शंकराचार्य जी के शिष्य प्रतिनिधि होने के अलावा गंगा सेवा अभियानम् के सार्वभौम प्रमुख के रूप में भी हैं। गंगा सेवा अभियानम् - बद्रिकाश्रम और शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी की पहल पर गठित संगठन है।
चिंता का मूल कारण: असंवेदनशील व निष्प्रभावी प्राधिकरण
गंगा सेवा अभियानम् ने तीन जनवरी, 2012 को प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र लिखकर संकल्प की सूचना दे दी थी। पत्र में राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्राधिकरण के गठन को दोषपूर्ण बताते हुए उसकी कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाये गये हैं। लिखा है कि प्राधिकरण का पर्यावरण एवम् वन मंत्रालय के अधीन होना गैरवाजिब है। प्राधिकरण में गैरसरकारी विशेषज्ञ सदस्यों की राय की उपेक्षा इस हद तक है कि वे निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं। अभियानम् ने क्षोभ व्यक्त किया है कि प्राधिकरण पत्रों के उत्तर तक नहीं देता। वह एक निष्प्रभावी संस्था है। गंगा सेवा अभियानम् इसलिए भी खफा है कि तमाम तर्कों, आंदोलनों और प्रतिवेदनों के बावजूद गंगा व उसकी सहायक धाराओं पर परियोजनाओं के काम पर कोई लगाम नजर नहीं आ रही है।
अभियानम् ने पूर्व में बिजनौर में छैया और गजरौला में बागपत नाले के जरिये गंगा में आ रहे विषाक्त औद्योगिक प्रदूषण पर प्राधिकरण का ध्यान इंगित किया था। पर प्राधिकरण को पैसा बांटने से ही फुर्सत नहीं, वह गंगा को प्रदूषित कर रहे अवजल को रोकने के लिए ठोस पहल कैसे करे! अभियानम् ने सूचना के अधिकार के तहत 9 जुलाई, 2011 को पत्र लिखकर नरोरा से प्रयाग के बीच न्यूनतम प्रवाह सुनिश्चित करने की बाबत जानना चाहा था। जवाब में पर्यावरण मंत्रालय तब भी नहीं जागा। उसने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। दरअसल, जयराम रमेश के मोबाइल तक तो गंगा कार्यकर्ताओं की पंहुच थी। सीधे संवाद भी बना रहा। किंतु नई पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने तो जैसे सुनना ही बंद कर दिया। बद्रीनाथ धाम के नीचे नियमों व पर्यावरण हितों की अनदेखी कर रही एक परियोजना को जयंती नटराजन द्वारा हाल ही में जिस तरह व्यक्तिगत दखल देकर चालू कराया गया है; संकल्पित संत उससे भी बुरी तरह क्षुब्ध हैं।
पांच मांगे, जिनके पूरी होने पर ही रुकेगी तपस्या
उत्तराखण्ड में विष्णु प्रयाग से लेकर देवप्रयाग तक के पंच प्रयागों का निर्माण करने वाली नदियों की मूलधाराओं के मार्ग को अवरुद्ध करने वाली सभी परियोजनाओं को तत्काल प्रभाव से निरस्त/बंद कर दिया जाये। विष्णुगंगा, पिंडर नंदाकिनी, मंदाकिनी और भागीरथी नामक धारायें अलकनंदा की मूलधारा से मिलकर इन पंच प्रयागों का निर्माण करती हैं। मांग यह भी है कि भविष्य में देवप्रयाग से आगे गंगासागर तक गंगा की मूलप्रवाह को रोकने वाली कोई परियोजना न रहे। नरोरा से प्रयाग तक हर बिंदु पर हर समय 100 घनमीटर प्रति सेकेंड का प्रवाह सुनिश्चित हो। कुंभ और माघ मेले के अलावा गंगा दशहरा, मौनी अमावस्या, कार्तिक पूर्णिमा आदि विशेष स्नान के मौकों पर न्यूनतम प्रवाह 200 घनमीटर प्रति सेकेंड की मांग की गई है। गंगा के नाम पर लिए गये कर्ज के पैसे से हो रहे नगर उन्न्यन के काम पर हो रहे खर्च पर एतराज जताया गया है। मांग है कि ऐसी परियोजनाओं को तब तक के लिए तत्काल रोक दिया जाये, जब तक इनकी इस दृष्टि से समीक्षा नहीं हो जाती कि ये गंगा के लिए हितकर हैं या नहीं।
प्रदूषण के निर्णायक हल के लिए जरूरी है कि गंगा व उसमें मिलने वाली नदी व नालों में विषाक्त रसायन वाले अवजल डालने वाले उद्योगों को गंगा से कम से कम 50 किमी दूर खदेड़ा जाये। प्रदूषित अवजल वाला कोई भी नाला प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में गंगा में न जाये। चुनाव सामने है। सरकार की प्राथकिता क्या होगा? गंगा का क्या होगा? पता नहीं। फिलहाल तो प्राधिकरण की आपात बैठक बुलाने के अनुरोध वाले 20 नवंबर, 2011 के पत्र का उत्तर विशेषज्ञ सदस्यों को भेज दिया गया है। गंगा प्राधिकरण 16 फरवरी को बैठेगा। देखना यह है कि गंगा किनारे बैठे तपस्वी और प्राधिकरण के भीतर बैठे विशेषज्ञ सदस्यों की मान मनौव्वल में प्राधिकरण सफल होता है या अगली होली कुछ और ही रंग लेकर आयेगी।
वक्त आ गया है कि विशेषज्ञ प्राधिकरण छोड़ें
प्रत्यक्षम् किम प्रमाणम्
इस्तीफा देने वाले सदस्यों ने आहूत प्रेस वार्ता में प्राधिकरण की निष्क्रियता व अधिकारिक सदस्यों की संवेदनहीनता के प्रत्यक्ष उदाहरण दिये - ’’तीन वर्षों में मात्र दो बैठकें। उस पर भी सरकारी अफसरों द्वारा पहले से तय एजेंडा। उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और प. बंगाल - तीन मुख्यमंत्रियों के पास बैठक के लिए समय नहीं। उत्तरांचल के मुख्यमंत्री ने बैठक में जो कहा, उसके विपरीत ऊर्जा के नाम पर नदियों पर कहर ढाया। उत्तर प्रदेश ने एक्सप्रेसवे बनाकर गंगा-यमुना की जमीन बेच डाली। बिहार की प्राथमिकता रेत खनन, पनबिजली परियोजनायें और बाढ़. राहत का पैसा है, नदी और बाढ़ मुक्ति नहीं। झारखण्ड के हिस्से में थोड़ी सी गंगा है। वह कांवड़ियों पर खर्च कर ही काम चला रहा है। प. बंगाल ने गंगा के नाम पर सबसे ज्यादा 600 करोड़ रूपये खींच लिए। प्राधिकरण ने 3000 करोड़ की परियोजनायें मंजूर कर दी। उस पैसे से प. बंगाल, नदी में निर्माण कर घाट व दीवारें बना रहा है। गंगा के नाम पर आये पैसे से कानपुर, इलाहाबाद और बनारस की सड़के खोद डाली गई हैं। एसटीपी जैसे ढांचे बनाये जा रहे हैं। गंगा के नाम पर निर्माण और सिर्फ निर्माण के अलावा कुछ नहीं हो रहा है। गंगा कार्य योजना में भी तो यही हुआ था। फर्क सिर्फ यह है कि गंगा कार्ययोजना में तो सिर्फ 15 सौ करोड़ खर्च हुआ था, अब हम 15 हजार करोड़ बहा रहे हैं। चिंता तो इस बात की है कि इस सब पर विशेषज्ञ सदस्यों की राय लेना तो दूर, उन्हें बताया भी नहीं जा रहा। तो आखिर हम प्राधिकरण क्यों रहें ? क्या हम सिर्फ रबर स्टैंप बने रहने के लिए हैं ?
बेबसी ने किया विवश- ’’नो वन कैन टेक सैंड फ्राम गंगा’’ - पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के इस बयान का जिक्र करते हुए चोपड़ा ने आश्चर्य जताया कि बावजूद इसके देवप्रयाग के ऊपर मलेथा तक दर्जनों ट्रक रेत पर रेत उठा रहे हैं। उत्तराखण्ड जाकर देखिए। सड़क बन रही हो चाहे बांध या पुल... मलबा बेखौफ नदियों में डाला जा रहा है। यह सरकार के अपने बनाये कानूनों का उल्लंघन है। टिहरी बांध के नियमित पानी न छोड़ने से जहां कभी रेत दिखाई नहीं देता था, वहां भी गंगा में बालू के ढेर दिखाई देने लगे हैं। ऋषिकेश से 14 -15 किमी ऊपर नदी सूख गई है। उत्तराखण्ड में बिजली के नाम पर गंगा का शोषण जारी है, उत्तर प्रदेश में प्रदूषण। लोग हमसे पूछ रहे हैं कि आपके रहते यह सब कैसे हो रहा है ? हम सरकार से कहते रहे हैं कि हमे हमारी अधिकारिक भूमिका बताइये। सारी गलतियां हो ही रहीं हैं, तो प्राधिकरण और उसकी सदस्यता का क्या मतलब है ? उसमें विशेषज्ञों को सदस्य क्यों बने रहना चाहिए ? 9 में से 7 विशेषज्ञ सदस्यों ने 20 नवंबर, 2011 को प्रधानमंत्री जी को पत्र लिखकर यही पूछा था। अपनी सभी चिंतायें रखी थी। आपात् बैठक की मांग की थी। एजेंडा दिया था। वह बैठक आज तक नहीं हुई। 9 फरवरी को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से मिलकर अपनी चिंता जताई। उम्मीद की कि गंगा संरक्षण और प्रबंधन के सशक्त कानून बनाने की अपील पर कुछ प्रतिक्रिया होगी।
प्रो. सिद्दिकी ने कहा कि गोमुख से गंगा मूल की 135 किमी धारा के क्षेत्र को इको सेंसटिव यानी पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील अधिसूचित करने का निर्णय प्राधिकरण की एक उपलब्धि होती, लेकिन जब उसके मार्गदर्शी बिंदु सामने आये तो हम अवाक् रह गये। हमारी राय और हमारी सदस्यता.. दोनो ही जैसे मजाक बनकर रह गये हैं।
तपस्या की अनदेखी ने लांघी लक्ष्मणरेखा
राजेन्द्र सिंह ने प्राधिकरण की संवेदनशून्यता पर प्रहार करते हुए सवाल किया- ’’14 जनवरी से गंगा की अविरलता के लिए तपस्या पर बैठे प्रों जीडी अग्रवाल ने 9 मार्च से जल भी त्याग दिया है। उनकी हालत नाजुक है। प्रशासन ने उन्हें जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया है। आज तक सरकार का कोई प्रतिनिधि उनसे मिलने तक नहीं गया है। वे प्राण छोड़ने पर तत्पर हैं। भला ऐसे में हम पद पर कैसे बने रह सकते हैं ?’’
रवि चोपड़ा ने प्रो. जीडी अग्रवाल के गंगा के लिए अतिआवश्यक बताते हुए स्पष्ट किया कि वह पनबिजली के विरोधी नहीं हैं। वह जानते हैं कि देश के लिए नदी और बिजली... दोनो ही जरूरी है। उनका विश्वास है कि बांधों के नये डिजाइन बनाकर ऐसा किया जा सकता है। भारत में ऐसे डिजाइन बनाने वालों में प्रो. जीडी अग्रवाल से बड़ा नाम दूसरा नहीं है। सरकार उन्हें मारे नहीं, उनके प्राण बचाकर उनके ज्ञान का सदुपयोग करे।
कानून होते हुए भी उसकी उचित पालन न होने को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए एमसी मेहता और संजय पारिख ने आगाह किया कि राष्ट्रीय नदी घोषित किया है, तो सरकार उसका सम्मान भी सुनिश्चित करे; तभी उसका महत्व है। उन्होंने प्राधिकरण को सक्रिय करने के लिए सभी से एकजुट होने की भी अपील की। मेहता ने कहा कि गंगा को महज् एक नदी मानना गलत है। गंगा भारत की सांस्कृतिक थाती है। इसे खोना बड़ी क्षति होगी।
अगला कदम क्या होगा ?
इसके जवाब में राजेन्द्र सिंह ने बताया कि देशभर के नदी, संस्कृति, कानून व सामाजिक विशेषज्ञों को जोड़कर जलबिरादरी पिछले एक साल से गंगा के संरक्षण व प्रबंधन हेतु जरूरी कानून का प्रारूप तैयार कर रही है। अगले एक सप्ताह के भीतर इस प्रारूप को अंतिम रूप दे दिया जायेगा। सरकार उसे आधार बनाकर कानून बनाये। सरकार को इस हेतु बाध्य करने के लिए रणनीति बनाई जायेगी।
प्रेस वार्ता में उद्धृत उक्त विचारों, संदर्भों ने प्राधिकरण की निष्क्रियता पर तो निशाना साधा ही, राज्य सरकारों द्वारा राज्य प्राधिकरण व नदियों की उपेक्षा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जरूरत है कि हमारी नदियों के प्रति समाज व संतों के रवैये पर भी कोई सवाल उठाये ? संभव है कि तब समाज, संत और सरकार.... तीनों की तरफ से जवाब आने शुरू हों और नदियों के प्रति मरी हमारी संवेदनायें जाग उठें।... नाला बन चुकी धारायें पुनः नदी बन जायें। काश! कि ऐसा हो।
वाराणसी (एसएनबी)। गंगा तप पर बैठे स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द (पर्यावरणविद् प्रो. जी.डी.अग्रवाल) का तप भंग कराने की पटकथा तो बीती रात ही तैयार कर ली गयी थी। इसे पूरा करने के उद्देश्य से प्रशासनिक अमला लाली घाट पहुंचा भी था। हालांकि उस वक्त उन्हें सफलता नहीं मिली। मगर रात की अधूरी योजना रविवार की सुबह (शेष पेज 15) ‘स्वामी ज्ञानस्वरूपसानन्द ने मुख से कुछ भी ग्रहण नहीं किया है। वे संकल्प पथ पर अब भी अडिग हैं। उन्हें अस्पताल लाने का कदम सरकारी है। इसके लिए स्वामीजी ने खुद से कोई पहल नहीं की है। दिल्ली से दूत आये और उनसे बातचीत भी हुई। जहां तक रहा गंगा को बचाने का संघर्ष तो वो जारी रहेगा।’ -स्वामी अविमुक्तेरानन्द सरस्वती महाराज, श्री विद्या मठ ‘ये उच्चस्तरीय विषय हैं। इस पर फैसला केन्द्र की सुप्रीम अथर्रिटी ही ले सकती है। इस बारे में केन्द्र को अवगत भी करा दिया गया है। इस पर चर्चा होने के बाद ही कोई निर्णय हो सकता है। जहां तक बात स्वामी ज्ञानस्वरूप सानन्द जी के स्वास्थ्य की है तो फिलहाल उनका स्वास्थ्य स्थिर है। उनके स्वास्थ्य के लिए सभी चिंतित हैं।’ -रविन्द्र, जिलाधिकारी प्रशासन ने स्वामी ज्ञानस्वरूप को जबरन उठाया, इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया हृदय का बांया हिस्सा बढ़ा अस्पताल में मुख्य चिकित्साधिकार डा. डी. वी. सिंह और डा. एस. जे. वर्मा ने स्वामीजी का स्वास्थ्य परीक्षण किया। डाक्टरों ने बताया कि स्वामीजी का स्वास्थ्य धीरे-धीर सामान्य हो रहा है। हालांकि उन्ह डिहाइड्रेशन है और ईसीजी की रिपरेट में उनके हृदय का बांया भाग बढ़ने की बात सामने आयी है। इसकी वजह स्वामी जी का वयोवृद्ध होना है। तप् स्थल पर गंगा (शेष पेज 15) कब क्या हुआ प्रात: 6:30 बजे- प्रशासनिक अमला लाली घाट प्रात: 7:15 बजे- स्वामीजी को लेकर प्रशासनिक अमला अस्पताल रवाना प्रात: 7:30 बजे- अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में स्वामी जी भर्ती शाम तीन बजे-डीएम अस्पताल पहुंचे 3:45 बजे-नेशनल क्लीन गंगा मिशन 20:20 के मिशन निदेशक राजीव शर्मा अस्पताल पहुंचे शाम 4:15 बजे- राजीव शर्मा और स्वामीजी के पहले चरण की वार्ता समाप्त सायं 6:15 बजे-दूसरे चरण की वार्ता |
बेहद खफा हैं महंत जी
..और जुड़ती कडि़यां बनने लगीं जंजीर
अस्पताल में प्रार्थना
स्वामी सानंद अस्पताल में भी तपस्या पर अडिग
काशी में अनशन, दिल्ली में भूचाल
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राजेन्द्र सिंह, रवि चोपड़ा व आरएच सिद्दीकी का एनजीआरबीए से इस्तीफा नई दिल्ली (एजेंसी)। मैगसेसे पुरस्कार विजेता जल संरक्षण विशेषज्ञ राजेन्द्र सिंह और दो अन्य लोगों ने गंगा नदी के प्रति सरकार की अनदेखी के विरोधस्वरूप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (एनजीआरबीए) से शनिवार को इस्तीफा दे दिया। राजेन्द्र सिंह के साथ गंगा प्राधिकरण के दो अन्य सदस्यों रवि चोपड़ा और आर एच सिद्दिकी ने भी गंगा नदी की सफाई पर जोर देने के लिए पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल के आमरण अनशन के समर्थन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना इस्तीफा भेज दिया। राजेन्द्र सिंह ने कहा कि जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल के साथ हुई बैठक के बाद इस्तीफा भेजा गया। इसमें अग्रवाल के विरोध के विषय में उन्हें अवगत कराया गया। अग्रवाल ने कल घोषणा की थी कि गंगा का स्वच्छ एवं निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए जोर देने के वास्ते वह आमरण अनशन के अंतिम दौर में जल ग्रहण नहीं करेंगे। चोपड़ा देहरादून स्थित पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट में निदेशक है, , |



