Saturday, 11 June 2011
ऐसे तो नहीं रुकेगा नदियों का प्रदूषण
गंगा दशहरा अर्थात गंगा के अवतरण का पर्व। गंगा हमारे देश की जल संपदा की प्रतीक है। गंगा यानी नदी, जो सिर्फ जलराशि नहीं, जीवनदायिनी है। लेकिन आज हम अपनी नदियों के महत्व को भुला बैठे हैं। हम उनका सिर्फ दोहन ही कर रहे हैं। लेकिन हमारे देश में नदियों का प्रदूषण बेहद गंभीर रूप ले चुका है। अनेक नदियों के प्रदूषण को रोकने के प्रयास तो हो ही नहीं रहे हैं, चिंताजनक बात यह है कि गंगा और यमुना जैसी जिन नदियों को उच्चतम प्राथमिकता देकर उनमें प्रदूषण रोकने के लिए विशेष एक्शन प्लान बनाए गए और उन्हें काफी धन उपलब्ध करवाया गया, उनका प्रदूषण भी आज तक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। अब तक के इस निराशाजनक अनुभव के बाद समय आ गया है कि नदियों के प्रदूषण को रोकने के बारे में प्रचलित मान्यताओं को खुलकर चुनौती दी जाए तथा इस बारे में ऐसी नई सोच को आगे आने दिया जाए, जो नदियों को प्रदूषण मुक्त करने की वास्तविक उम्मीद प्रदान करती हो। अब तक के प्रयासों में इस मान्यता को चुनौती नहीं दी गई कि सीवेज व्यवस्था के माध्यम से घरों के मल-मूत्र एवं उद्योगों के खतरनाक द्रव्यों को नदियों की ओर बहाया जाएगा। इस बारे में यह पहले से मानकर चला गया कि इस गंदगी को तो नदियों में ही जाना है, बस चिंता केवल इसके ट्रीटमेंट की करनी है। पर ट्रीटमेंट काफी महंगा होने के साथ सीमित मात्रा में ही हो सकता है और इसके बाद भी काफी मात्रा में गंदगी का प्रवेश नदियों में होता ही रहता है। इसलिए घरों के मल-मूत्र या उद्योगों के खतरनाक द्रव्यों को नदियों में बहाने की अवधारणा का तोड़ ढूंढना होगा। वैसे भी, ठंडे दिमाग से सोचिए, तो यह सोच बुनियादी तौर पर कितनी गलत है कि अपने घर के मल-मूत्र को हम प्रतिदिन उस नदी की ओर बहाते रहें, जिसे हम पवित्र मानते हैं। इस तरह, एक ओर तो दीर्घकालीन स्तर पर हम अपने ही जीवन और पर्यावरण की क्षति करते हैं, दूसरी ओर अपनी ही आस्था का अपमान करते हैं। इस तरह के सवाल उठाने पर प्रायज् जल व शहरी विकास विशेषज्ञ कहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था इस कारण से चल रही है, क्योंकि इसका कोई विकल्प ही नहीं है। वे कहते हैं कि इस घरेलू व औद्योगिक गंदगी को नदियों में न छोडें, तो कहां छोड़ें? जितने हमारे संसाधन हैं, उसके अनुसार जितना संभव होता है, उतना उसका ट्रीटमेंट हम अवश्य कर लेते हैं। लेकिन इस तरह की दलीलों के जवाब में यह कहना जरूरी है कि वर्तमान व्यवस्था के विकल्प उपलब्ध हैं, पर वे विकसित तभी होंगे, जब उनकी जरूरत पर समुचित ध्यान दिया जाए। वैकल्पिक सोच का मूल आधार यह होना चाहिए कि किसी भी एक यूनिट, मोहल्ले व बस्ती का सीवेज नियोजन इस आधार पर हो कि उस यूनिट में जितनी भी सीवेज जनित होती है, उसको उस यूनिट के अंदर ही खपाया जाएगा, उसके बाहर नहीं भेजा जाएगा। इस यूनिट के भीतर ही इसका ट्रीटमेंट होगा, इससे खाद अलग किया जाएगा, सिंचाई लायक पानी अलग किया जाएगा, पानी की जितनी री-साइकिलिंग संभव है, वह की जाएगी और उपयुक्त पेड़-पौधों के हरे-भरे क्षेत्र तैयार कर वहां इस पानी का उपयोग किया जाएगा। खतरनाक अवशेषों वाले उद्योगों को अपने औद्योगिक क्षेत्र के भीतर ही अधिकतम ट्रीटमेंट करने को कहा जाएगा, ताकि अधिक खतरनाक अवशेषों वाला पानी वहां से बाहर न निकले। जब किसी क्षेत्र की सीवेज को ठिकाने लगाने का कार्य उस क्षेत्र के भीतर ही होता है, तो यह संभावना बढ़ती है कि लोग इससे जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करेंगे एवं इसे सुलझाने के प्रयास करेंगे। सीवेज के प्रति यह दृष्टिकोण अनुचित है कि किसी नागरिक की जिम्मेदारी बस फ्लश करने भर की है और इससे आगे उसे कुछ सोचने की जरूरत नहीं है। दरअसल, आम नागरिक भी मजबूर है, क्योंकि आवास व सीवेज व्यवस्था इस अनुचित प्रणाली के अनुकूल ही बनाई गई है। जो अनुचित व्यवस्था हर जगह चल रही है, अपने दैनिक कार्य उसके अनुकूल करने को सभी मजबूर हैं। यह तो सच है, पर एक लोकतंत्र में हर जागरूक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि जो व्यवस्था उसे अनुचित लगे उसके विरुद्ध वह किसी न किसी माध्यम से आवाज उठाए और उसमें बदलाव लाने का प्रयास करे। पर सीवेज व गंदगी को तो बस हम फ्लश के माध्यम से अपने से दूर कर देना चाहते हैं। हम सबकी इस गलती के कारण ही जीवनदायिनी नदियां इतनी प्रदूषित हो रही हैं, उनमें रहने वाले जीव मर रहे हैं एवं पेयजल का संकट भी लगातार विकट हो रहा है। अत: हमें मिलकर इस पूरी व्यवस्था में बुनियादी बदलाव की मांग उठानी पडे़गी।
कराहती नदियां
कभी जीवनदायिनी रहीं हमारी पवित्र नदियां आज कूड़ा घर बन जाने से कराह रही हैं, दम तोड़ रही हैं। गंगा, यमुना, घाघरा, बेतवा, सरयू, गोमती, काली, आमी, राप्ती, केन एवं मंदाकिनी आदि नदियों के सामने ख़ुद का अस्तित्व बरकरार रखने की चिंता उत्पन्न हो गई है। बालू के नाम पर नदियों के तट पर क़ब्ज़ा करके बैठे माफियाओं एवं उद्योगों ने नदियों की सुरम्यता को अशांत कर दिया है। प्रदूषण फैलाने और पर्यावरण को नष्ट करने वाले तत्वों को संरक्षण हासिल है। वे जलस्रोतों को पाट कर दिन-रात लूट के खेल में लगे हुए हैं। केंद्र ने भले ही उत्तर प्रदेश सरकार की सात हज़ार करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना अपर गंगा केनाल एक्सप्रेस-वे पर जांच पूरी होने तक तत्काल रोक लगाने के आदेश दे दिए हों, लेकिन नदियों के साथ छेड़छाड़ और अपने स्वार्थों के लिए उन्हें समाप्त करने की साजिश निरंतर चल रही है। गंगा एक्सप्रेस-वे से लेकर गंगा नदी के इर्द-गिर्द रहने वाले 50 हज़ार से ज़्यादा दुर्लभ पशु-पक्षियों के समाप्त हो जाने का ख़तरा भले ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की पहल पर रुक गया हो, लेकिन समाप्त नहीं हुआ। गंगा और यमुना के मैदानी भागों में माफियाओं एवं सत्ताधीशों की मिलीभगत साफ दिखाई देती है। नदियों के मुहाने और पाट स्वार्थों की बलिवेदी पर नीलाम हो रहे हैं।बड़ी मात्रा में रेत खनन के चलते जल जीवों के सामने संकट पैदा हो गया है। गंगा की औसत गहराई वर्ष 1996-97 में 15 मीटर थी, जो वर्ष 2004-2005 में घटकर 11 मीटर रह गई। जलस्तर में गिरावट निरंतर जारी है। आईआईटी कानपुर के एक शोध के अनुसार, पूरे प्रवाह में गंगा क़रीब चार मीटर उथली हो चुकी है। गाद सिल्ट के बोझ से बांधों की आयु घटती जा रही है। जीवनदायिनी और सदा नीरा गंगा कानपुर के पास दशक भर पूर्व 15 से 20 मीटर गहरी थी, जबकि पहाड़ी इलाक़ों में इसकी गहराई मात्र चार मीटर ही थी। जलवायु विशेषज्ञ परमेश्वर सिंह अपनी पुस्तक पर्यावरण के राष्ट्रीय आयाम में नदियों के घटते दायरे पर चिंता जता चुके हैं। वह कहते हैं, बात केवल गंगा तक ही सीमित नहीं है। पिछले एक दशक में बूढ़ी गंडक 6 से 4 मीटर, घाघरा 6 से 4 मीटर, बागमती 5 से 3 मीटर। राप्ती 4.5 एवं यमुना की औसत गहराई 3।5 से दो मीटर तक कम हो चुकी है। नदियों का पानी पीने लायक तक नहीं बचा है। कभी बेतवा नदी का पानी इतना साफ एवं स्वास्थ्यवर्द्धक होता था कि टीबी के मरीज़ इस जल का सेवन करके स्वस्थ हो जाते थे। आज बेतवा के किनारे स्थित बस्ती के लोग उसमें गंदगी डाल रहे हैं। बेतवा में नहाने वाले लोग चर्म रोग का शिकार हो रहे हैं। यमुना नदी में पुराने यमुना घाट से लेकर पुल तक बड़ी संख्या में शव प्रवाहित किए जा रहे हैं। हमीरपुर का गंदा पानी पुराने यमुना घाट पर नाले के ज़रिए नदी में डाला जा रहा है। नदी की सफाई करने वाली मछलियां, घोघे एवं कछुए समाप्त हो गए हैं। यहां लोग पानी का आचमन करने से भी डरते हैं।डुमरियागंज से निकली आमी नदी रुधौली, बस्ती, संत कबीर नगर, मगहर एवं गोरखपुर ज़िले के क़रीब ढाई सौ गांवों से होकर बहती है। यह नदी कभी इन गांवों को हरा-भरा रखती थी। गोरख, कबीर, बुद्ध एवं नानक की तपोस्थली रही आमी आज बीमारी और मौत का पर्याय बन चुकी है। यह नदी 1990 के बाद तेज़ी से गंदी हुई।रुधौली, संत कबीर नगर एवं 93 में गीडा में स्थापित की गईं फैक्ट्रियों से आमी का जल तेज़ी से प्रदूषित हुआ। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला कचरा सीधे आमी में गिरता है। आमी के प्रदूषित हो जाने के चलते इलाक़े से दलहन की फसल ही समाप्त हो गई। गेहूं और तिलहन का उत्पादन भी खासा प्रभावित हुआ है। पेयजल का भीषण संकट है। नदी तट से तीन-चार किमी तक हैडपंपों से काला बदबूदार पानी गिरता है। आमी तट के गांव में जब महामारी आई तो सीएमओ की टीम ने अपनी जांच में पाया कि सभी बीमारियों की जड़ आमी का प्रदूषित जल है। आमी के प्रदूषण के चलते मगहर, सोहगौरा एवं कोपिया जैसे गांवों के अस्तित्व पर संकट आ गया है।आमी का गंदा जल सोहगौरा के पास राप्ती नदी में मिलता है। सोहगौरा से कपरवार तक राप्ती का जल भी बिल्कुल काला हो गया है। कपरवार के पास राप्ती सरयू नदी में मिलती है। यहां सरयू का जल भी बिल्कुल काला नज़र आता है। बताते हैं कि राप्ती में सर्वाधिक कचरा नेपाल से आता है। उसे रोकने की आज तक कोई पहल नहीं हुई। पिछले दिनों राप्ती एवं सरयू के जल को इंसान के पीने के अयोग्य घोषित किया गया। यह पानी पशुओं के पीने के लायक तो माना गया, मगर इन नदियों के तट पर बसे गांवों के लोग पशुओं को यह जल नहीं पीने देते।ऐसा लगता है कि अपनी दुर्दशा पर नदी संवाद करती हुई कहती है, मैं काली नदी हूं। मानों तो काली मां। भूल तो नहीं गए! ऐसा इसलिए कि आजकल मेरे पास कोई आता कहां है। सभी ने मुझे अकेला छोड़ रखा है मरने के लिए। वैसे भी मैं ज़िंदा हूं कहां? मेरा पानी न पीने लायक है, न सिंचाई लायक। पर्यावरणविद् तो मुझे मुर्दा बता चुके हैं। मैं हूं ही ऐसी। किसी प्यासे को जीवन नहीं दे सकती। जिस ज़मीन को छू लूं, वह बंजर हो जाए। मेरी दशा हमेशा से ऐसी नहीं थी। मेरा भी बचपन था, जवानी थी…क्या दिन थे वे! ख़ूब बारिश होती थी। सारे ताल-तलैया और नाले लबालब हो उठते थे। धुआंधार बारिश के बीच ही क़रीब 150 साल पहले मुज़फ़़्फरनगर के गांव उंटवारा में मेरा जन्म हुआ था। इसमें खतौली के पास स्थित गांवों निठारी एवं जंढेडी के योगदान को भला कैसे भूल सकती हूं। यहीं की बारिश का पानी मेरे लिए ऑक्सीजन देता था। यह न मिलता तो मेरा नामोनिशान कब का मिट चुका होता। यहां से शुरू हुआ मेरा सफर 374 किलोमीटर दूर तक पहुंचा। इस दौरान मेरे निकट 1200 गांव, क़स्बे और शहर आए। मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, कांशीराम नगर, एटा, फर्रुखाबाद और कन्नौज ने मुझे अपनाया, रास्ता दिया। शुरू में सभी का स्नेह मिला। किसानों ने सूखती फसलों को मेरा पानी दिया। वे लहलहा उठीं। मछलियां, कीड़े-मकोड़े सभी ख़ूब अठखेलियां करते, गोते लगाते। जलीय पौधे भी स्वस्थ रहते थे।लेकिन आज ख़ुद को देखती हूं तो हूक सी उठती है। मृत्युशैय्या पर पड़ी हूं, आख़िरी सांसें ले रही हूं। मेरा सब कुछ लुट चुका है। जलीय जीव-जंतु सब मर चुके हैं। मेरे पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घटती चली गई। अलीगढ़ आने के पहले तक कुछ ज़िंदा रहने की गुंजाइश भी थी, लेकिन यहां अब दो मिलीग्राम प्रति लीटर डिसाल्व ऑक्सीजन में कैसे बचते जलीय जीव-जंतु? साधु आश्रम के पास मेरे पानी में ज़िंदा रहने लायक कुछ नहीं बचा। अब ख़ुद को ज़िंदा लाश न मानूं तो क्या करूं? किसी से कहूं भी तो क्या? जिन्हें ज़िंदगी भर बेटे की तरह माना, वही आस्तीन के सांप निकले। वे अपनी फैक्ट्रियों और सीवर का कचरा मेरे ऊपर उड़ेल रहे। इससे मेरी काया काली होती गई, पानी ज़हर बनता गया। पर्यावरणविद् मेरी प्रकृति को क्षारीय बता रहे हैं। कन्नौज में मेरा हाल एकदम सीवर के पानी जैसा हो चुका है। मैं यह बोझ अब और नहीं झेल सकती। बड़ी मां गंगा ही मेरा उद्धार करेंगी, लेकिन सुना है कि मोक्षदायिनी मां गंगा भी मैली होती जा रही हैं। मैं तो आख़िरी सांसें गिन ही रही हूं। मेरे साथ जो सलूक किया, वैसा कम से कम मोक्षदायिनी गंगा मइया के साथ मत करना। यही मेरी अंतिम इच्छा है। क्या पूरी करेंगे आप सब? प्रख्यात पर्यावरणविद् प्रो. वीरभद्र मिश्र को इस बात से थोड़ी तसल्ली ज़रूर है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह क्लीन गंगा मिशन में व्यक्तिगत रुचि ले रहे हैं, लेकिन पुराने अनुभव प्रो। मिश्र को आशंकाओं से मुक्त नहीं कर पा रहे। वह कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने 2020 तक गंगा में गिरने वाले नालों को पूरी तरह रोकने और सीवेज के ट्रीटमेंट का भरोसा दिलाया है, लेकिन इसके लिए प्रस्तावित उपायों का ख़ुलासा नहीं किया। फिर यह सवाल भी उठना लाज़िमी है कि तब तक केंद्र में किसकी सरकार होगी और उसका गंगा को लेकर नज़रिया क्या होगा? प्रो. मिश्र ने गंगा के मामले में सैद्धांतिक से कहीं ज़्यादा व्यवहारिक पक्ष को महत्व दिए जाने पर जोर दिया। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के सदस्य प्रो. मिश्र ने कहा कि आज सबसे बड़ा संकल्प यह होना चाहिए कि गंगा में एक भी नाला नहीं गिरने दिया जाएगा। गंगा तट पर वाराणसी समेत 116 शहर बसे हैं, जिनकी आबादी एक लाख से ज़्यादा है। इन शहरों के नालों से गिरने वाली गंदगी ही गंगा के 95 फीसदी प्रदूषण का कारण है। ज़रूरत इस बात की है कि नालों को डायवर्ट कर शोधन की त्रुटिविहीन व्यवहारिक व्यवस्था लागू की जाए। प्रो. मिश्र इस बात से पूरा इत्ते़फाक रखते हैं कि गंगा में पर्याप्त जल होना चाहिए, लेकिन साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल ज़्यादा पानी छोड़े जाने भर से प्रदूषण कम नहीं होगा। वह पर्यावरण असंतुलन के लिए प्राकृतिक चक्र में व्यवधान को कारण बताते हैं। उनका कहना है कि मनुष्य अपने फायदे के लिए प्राकृतिक स्रोतों का ज़बरदस्त दोहन कर रहा है। यही वजह है कि कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा विनाशकारी साबित हो रहे हैं। प्रकृति में वेस्ट नामक कोई चीज नहीं रही। सब कुछ री-साइकिलिंग से नियंत्रित हो रहा है।मानसून के बल पर सदनीरा बनने वाली नदियां वर्षा की बूंदों को अपने आंचल में छुपाकर एक लंबी यात्रा के साथ हमारे होंठो को तरलता देकर जीवन चक्र को गतिमान करती हैं। प्रकृति के इस विराट खेल का अंदाज़ा इसी बात से चल जाता है कि भारत के पश्चिमी तट पर क़रीब 75 अरब टन जल बरसता है। मैदानी इलाक़ा 15 लाख किमी के क्षेत्र में फैला है। इस क्षेत्र में 1.7 सेमी औसत दैनिक वर्षा का अर्थ हुआ कि पश्चिमी तट से भारत में प्रवेश करने वाली वाष्प का एक तिहाई भाग जल में परिवर्तित होता है। जल है तो कल है, का नारा लगाने वाले भारतीय मानसून नामक अरबी शब्द से अपनी सारी आशा-आकांक्षाएं प्रकट करते हैं। इस एक शब्द ने सदियों से लोगों को इतना प्रभावित किया है कि हमारी जीवनशैली एवं संस्कृति मानसून और नदियों के इर्द-गिर्द सिमट गई है। गंगा और यमुना का मैदानी भाग दुनिया का सबसे उपजाऊ क्षेत्र माना जाता है। लेकिन अब गंगा ही नहीं, बेतवा, केन, शहजाद, सजनाम, जामुनी, बढ़ार, बंडई, मंदाकिनी एवं नारायन जैसी अनेक छोटी-बड़ी नदियों के सामने संकट खड़ा हो गया है। ललितपुर में बीच शहर से निकलने वाली शहजाद नदी का हाल बेहाल है। प्रदूषण की शिकार इस नदी को लोगों ने अपने आशियाने के रूप में इस्तेमाल करने के लिए आधे से ज़्यादा पाट दिया हैं। यही हाल इससे मिलने वाले नालों का है। उन पर आलीशान मकान खड़े हो गए हैं। बंडई नदी मड़ावरा ब्लॉक में जंगली नदी के रूप में बहती है। इससे जंगली जानवरों के लिए पीने का पानी सुलभ होता है। इसकी भी असमय मौत हो रही है। चित्रकूट में बहने वाली मंदाकिनी नदी के सामने प्रदूषण का ख़तरा मंडरा रहा है। नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अनाप-शनाप पैसा फूंक रही हैं। गोमती नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए 285.6857 करोड़ रुपये अवमुक्त हो चुके हैं, लेकिन गोमती का हाल ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। बेशक़ीमती प्रकृति स्रोत प्रदान करने वाली नदियों-नालों के साथ हो रही छेड़छाड़ ने संकट खड़ा कर दिया है। कराहती नदियां अपनी पीड़ा कहें तो किससे कहें? कौन सुनेगा उनकी अकाल मृत्यु की शोक गाथा! कौन मनाएगा मातम!
गंगा को प्रदूषित करते शहरआबादी में छोटे एवं मंझोले शहरों की श्रेणी में आने वाले छह शहर ऐसे हैं, जिनके नालों का गंदा पानी परोक्ष रूप से गंगा में मिलकर उसे मैला करता है और उसे साफ करने के लिए सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी) लगाए जाने की कोई भावी योजना भी नहीं है। इनमें बबराला, उझेनी एवं गुन्नौर (बदायूं), सोरों (एटा) और बिल्हौर (कानपुर) शामिल हैं। गंगा की निगरानी कर रही उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इकाई ने इन्हें चिन्हित करते हुए इनमें एसटीपी के लिए कोई योजना न बनाए जाने पर चिंता जताई है। दरअसल, हाल में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के गठन के बाद गंगा नदी में पर्यावरण की दृष्टि से विकास की शर्त रखी गई है। बोर्ड अब तक गंगा में सीधे गिर रहे सीवेज पर ही नज़र रखता था। बोर्ड की मुख्य पर्यावरण अधिकारी डॉ। मधु भारद्वाज ने बताया कि छोटे एवं मंझोले शहरों के पुनरुत्थान के लिए बनी यूआईडीएसएसएमटी के तहत फर्रुखाबाद, मिर्ज़ापुर, मुगलसराय, गाज़ीपुर, सैदपुर, गढ़मुक्तेश्वर, बिजनौर, अनूपशहर एवं चुनार आदि में गंगा में सीधे गिर रहे सीवेज प्रबंधन के लिए योजनाएं बनकर स्वीकृत हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़, बबराला (बदायूं) के दो नालों का दो मिलियन लीटर गंदा पानी (एमएलडी) प्रतिदिन वरद्वमार नदी में सीधे गिरता है, जो आगे चलकर गंगा में मिलती है। उझेनी (बदायूं) का आठ एमएलडी गंदा पानी गंगा से तीस किमी दूर स्थित तालाब में गिरता है, जो आगे नालों में मिलता है। गुन्नौर (बदायूं) के दो नालों का तीन एमएलडी गंदा पानी एक तालाब में गिरता है, जो आगे चलकर वरद्वमार नदी से होता हुआ गंगा में मिलता है। सोरों (एटा) के तीन नालों का चार एमएलडी गंदा पानी गंगा में सीधे नहीं गिरता, पर आगे चलकर उसमें ही मिलता है। बिल्हौर (कानपुर) के नालों का तीन एमएलडी सीवेज ईशान नदी में सीधे गिरता है। यह भी आगे चलकर गंगा में ही मिलता है।
गंगा को प्रदूषित करते शहरआबादी में छोटे एवं मंझोले शहरों की श्रेणी में आने वाले छह शहर ऐसे हैं, जिनके नालों का गंदा पानी परोक्ष रूप से गंगा में मिलकर उसे मैला करता है और उसे साफ करने के लिए सीवेज शोधन संयंत्र (एसटीपी) लगाए जाने की कोई भावी योजना भी नहीं है। इनमें बबराला, उझेनी एवं गुन्नौर (बदायूं), सोरों (एटा) और बिल्हौर (कानपुर) शामिल हैं। गंगा की निगरानी कर रही उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की इकाई ने इन्हें चिन्हित करते हुए इनमें एसटीपी के लिए कोई योजना न बनाए जाने पर चिंता जताई है। दरअसल, हाल में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के गठन के बाद गंगा नदी में पर्यावरण की दृष्टि से विकास की शर्त रखी गई है। बोर्ड अब तक गंगा में सीधे गिर रहे सीवेज पर ही नज़र रखता था। बोर्ड की मुख्य पर्यावरण अधिकारी डॉ। मधु भारद्वाज ने बताया कि छोटे एवं मंझोले शहरों के पुनरुत्थान के लिए बनी यूआईडीएसएसएमटी के तहत फर्रुखाबाद, मिर्ज़ापुर, मुगलसराय, गाज़ीपुर, सैदपुर, गढ़मुक्तेश्वर, बिजनौर, अनूपशहर एवं चुनार आदि में गंगा में सीधे गिर रहे सीवेज प्रबंधन के लिए योजनाएं बनकर स्वीकृत हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़, बबराला (बदायूं) के दो नालों का दो मिलियन लीटर गंदा पानी (एमएलडी) प्रतिदिन वरद्वमार नदी में सीधे गिरता है, जो आगे चलकर गंगा में मिलती है। उझेनी (बदायूं) का आठ एमएलडी गंदा पानी गंगा से तीस किमी दूर स्थित तालाब में गिरता है, जो आगे नालों में मिलता है। गुन्नौर (बदायूं) के दो नालों का तीन एमएलडी गंदा पानी एक तालाब में गिरता है, जो आगे चलकर वरद्वमार नदी से होता हुआ गंगा में मिलता है। सोरों (एटा) के तीन नालों का चार एमएलडी गंदा पानी गंगा में सीधे नहीं गिरता, पर आगे चलकर उसमें ही मिलता है। बिल्हौर (कानपुर) के नालों का तीन एमएलडी सीवेज ईशान नदी में सीधे गिरता है। यह भी आगे चलकर गंगा में ही मिलता है।
प्रदूषण की भेंट चढ़ती गंगा
Source: Author: रोहित कौशिकपिछले कुछ वर्षों में गंगा को स्वच्छ बनाने हेतु अनेक परियोजनाएं लागू की गई हैं लेकिन इसका प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा हैं। गंगा के प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट भी अनेक बार दिशा-निर्देश जारी कर चुके हैं लेकिन इस बाबत अभी तक नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है।गौरतलब है कि गंगा के किनारे अनेक शहर, कस्बे और गांव स्थित हैं। प्रतिदिन इस आबादी का लगभग 1.3 बिलियन लीटर अपशिष्ट गंगा में गिरता है। गंगा के आस-पास स्थित सैकडों फैक्ट्रियाँ भी गंगा को प्रदूषित कर रही हैं। एक अनुमान के अनुसार प्रतिदिन लगभग 260 मिलियन लीटर औद्योगिक अपशिष्ट गंगा में जहर घोल रहा है। गंगा में फेंके जाने वाले कुल कचरे में लगभग अस्सी फीसद नगरों का कचरा होता है जबकि पंद्रह फीसद औद्योगिक कचरा।जहां एक ओर नागरीय कचरा विभिन्न तौर-तरीकों से गंगा के प्राकृतिक स्वरूप को नष्ट कर रहा है वहीं औद्योगिक कचरा विभिन्न रसायनों के माध्यम से गंगा को जहरीला बना रहा है। पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या विस्फोट के कारण गंगा किनारे की आबादी तेजी से बढ़ी है। विडम्बना यह है कि किनारे बसी इस आबादी ने भी गंगा को साफ-सुथरा रखने की कोई सुध नहीं ली बल्कि इसे प्रदूषित ही किया। पिछले दिनों जब वाराणसी में गंगा के नमूनों की जांच की गई तो प्रति 100 मिलीलीटर जल में हानिकारक जीवाणुओं की संख्या 50 हजार पाई गई जो नहाने के पानी के लिए सरकार द्वारा जारी मानकों से 10 हजार फीसद ज्यादा थी। इस प्रदूषण के कारण ही आज हैजा, पीलिया, पेचिश और टाइफायड जैसी जल-जनित बीमारियां बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 80 फीसद स्वास्थ्यगत समस्याएं और एक तिहाई मौतें जल-जनित बीमारियों के कारण ही होती हैं।गौरतलब है कि ऋषिकेश से इलाहाबाद तक गंगा के आस-पास लगभग 146 औद्योगिक इकाइयां स्थित हैं। इनमें चीनी मिल, पेपर फैक्ट्री, फर्टिलाइजर फैक्ट्री, तेलशोधक कारखाने तथा चमड़ा उद्योग प्रमुख हैं। इनसे निकलने वाला कचरा और रसायन युक्त गंदा पानी गंगा में गिरकर इसके पारिस्थितिक तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले अपशिष्ट में मुख्य रूप से हाइड्रोक्लोरिक एसिड, मरकरी, भारी धातुएं, तथा कीटनाशक जैसे खतरनाक रसायन होते हैं। ये रसायन मनुष्यों की कोशिकाओं में जमा होकर बहुत सी बीमारियां उत्पन्न करते हैं। गंगा किनारे होने वाले दाह-संस्कार, श्रद्धालुओं द्वारा विसर्जित फूल और पॉलीथिन भी गंगा को बीमार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि गंगा को स्वच्छ करने की योजना के तहत वर्ष 1985 से 2000 के बीच गंगा एक्शन प्लान एक और दो के क्रियान्वयन पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन गंगा अभी भी प्रदूषण की मार झेल रही है। गंगा को स्वच्छ रखने के लिए 3 मई 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी तथा उत्तराखंड सरकार को गंगा में पर्याप्त पानी छोड़ने और गंगा के आस-पास पॉलीथिन को प्रतिबन्धित करने का आदेश दिया था लेकिन अभी भी इन क्षेत्रों में पॉलीथिन पर रोक नहीं लगाई जा सकी है। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड के अनुसार गंगा विश्व की उन दस नदियों में से एक है जिन पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। गंगा में मछलियों की लगभग 140 प्रजातिया पाई जाती हैं। हाल ही में हुए एक अध्ययन में पता चला है कि गंगा को स्वच्छ बनाने में सहायक मछलियों की अनेक प्रजातियां प्रदूषण के कारण विलुप्त हो चुकी हैं। हमें यह समझना होगा कि केवल सरकारी परियोजनाओं के भरोसे ही गंगा को स्वच्छ नहीं बनाया जा सकता बल्कि इसके लिए एक जन-जागरण अभियान की जरूरत है।
वॉटर मैनेजमेंट के लिए भेजा प्लान
बगावत पर उतारू पाताल, पानी का साथ छोड़ते कुंए, तालाब, ताल-तलैया और सूखते हलक को देखते हुए अब वॉटर मैनेजमेंट पर सोचना बेहद जरूरी हो गया है। एक तरफ गंगा को बचाने की गंभीर चुनौती हमारे सामने है तो दूसरी तरफ पेयजल और सिंचाई सुविधा को बरकरार रखने की जरूरत। ऐसे में खासतौर से सरकारी स्तर पर पानी को लेकर मजबूत व ठोस पॉलिसी बनानी पड़ेगी जिससे पेयजल व सिंचाई के लिए गंगा व भूमिगत जल के बेहिसाब दोहन पर अंकुश लगे। इस बाबत राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण के वैज्ञानिक सदस्य और बीएचयू के पर्यावरणविद् प्रो. बीडी त्रिपाठी ने वॉटर मैनेजमेंट पर आधारित एक अध्ययन रिपोर्ट प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को प्रेषित की है। साथ ही इसकी एक प्रति गंगा बेसिन मैनेजमेंट प्लान के लिए गठित आईटियन्स ग्रुप के कोआर्डिनेटर प्रो. विनोद तारे को भी भेजी है। प्रो. त्रिपाठी ने बताया कि हाल ही में राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण की बैठक में उन्होंने अगाह किया कि हालात को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर पर वॉटर मैनेजमेंट पॉलिसी तैयार करने की जरूरत महसूस की जाने लगी है अन्यथा गंगा घाटी क्षेत्र को ड्राईजोन में तब्दील होने से रोका नहीं जा सकेगा। इस बाबत उनसे सुझाव मांगे गए थे। बुधवार को भेजे गए अपने पत्र में उन्होंने बताया है कि, गंगा का प्रवाह घटने से जहां प्रदूषण की मात्रा बढ़ती जा रही है तो बालू जमाव बढ़ने से जल-जीव मर रहे हैं। बड़ा संकट यह है कि गंगा और इसकी घाटी का ईको सिस्टम लड़खड़ा रहा है। ऐसे में गंगा का फ्लो बढ़ाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही ध्यान यह भी रखना होगा कि सिंचाई व पेयजल के नाम पर गंगा का दोहन संतुलित मात्रा में किया जाए। खासतौर से सिंचाई के लिए तो हरहाल में विकल्प तलाशनें होंगे। इसके लिए हमारे पास री-साइकलिंग ऑफ वेस्ट वॉटर तकनीक मौजूद है। हमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के शोधित जल को गंगा में गिराने के बजाए उसे आसपास के कैनाल व नहरों के हवाले कर उसे सिंचाई में प्रयोग करने की योजना बनानी होगी। इससे जहां कैनालों में पानी की उपलब्धता बढ़ेगी तो खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में भी कामयाब होंगे। हमें फ्लड एरिगेशन सिस्टम की जगह माइक्रो एरिगेशन तकनीक व्यवहार में लाना होगा ताकि कम पानी में बेहतर सिंचाई कर सकें। ट्रीटमेंट वॉटर के आधार पर नहरों को थोड़ा और विस्तार दे दिया गया तो ये नहर हमारे ग्राउंड वॉटर को रिचार्ज करने में भी सहायक हो सकती हैं। ठीक इसी तरह पेयजल के लिए हमें वर्षाजल को संरक्षित करने के संसाधनों को हरहाल में विकसित करना होगा। पुराने कुएं, तालाब, बावड़ी, कुंड को वजूद में लाना होगा। ये हमारे भूमिगत जल स्तर को न केवल बढाएंगे बल्कि एक तरफ गंगा जल के दोहन पर हद तक अंकुश लगाएंगे। साथ ही ये हमारे इकोनामिक ग्राफ को भी बढ़ाएंगे। मखाना, मछली पालन, सिंघाड़ा आदि पानी तो लेते नहीं उल्टे धन जरूर दे जाते हैं। हमें वॉटर मैनेजमेंट पॉलिसी तैयार करते समय लोकल स्तर पर भी मॉनीटरिंग कमेटी के गठन पर विचार करना होगा।
गोमती जो एक नदी थी
गोमती नदी की कलकल धारा लोगों की आस्था और विश्वास का संगम थी। उसका साफ और नीला अंजुलियों में भर कर लोग सर-माथे से लगाते थे। लेकिन प्रदूषण ने गोमती के जल को काला कर डाला है। नदी के अतीत और वर्तमान पर निगाह डाल रहे हैं हरिकृष्ण यादव।दियरा में गोमती के दोनों किनारों को पुल ने मिला डाला था, यह देख कर खुशी हुई। साल में एक बार गोमती के पार जाना ही पड़ता है। पुल नहीं था तो नाव से गोमती पार करने के सिवा कोई चारा न था, लेकिन पुल के निर्माण से हुई खुशी नदी के तट पर पहुंचते ही काफूर भी हो गई। पहले जब भी जाना हुआ नाव पर चढ़ने से पहले साफ नीले जल से हाथ-पैर धोकर एक-दो घूंट पानी जरूर पीता था। पर इस बार पानी इतना गंदा था कि घूंट भरना तो दूर पांव तक धोने की इच्छा न हुई। वैसे तो हर साल जेठ के महीने में दशहरे के दिन लाखों श्रद्धालु पवित्र गोमती में स्नान करते हैं। इस बार दशहरे पर नाले में बदल गई गोमती में श्रद्धालु डुबकी लगाने की आस्था कैसे निभाएंगे।दियरा घाट पर पुल देख बचपन की योद ताजा हो गई। बड़े भाई का गौना था। भैया की ससुराल जाने के लिए ज्यादातर रिश्तेदार या तो साइकिल से गए या पैदल। अलबत्ता बच्चों और बुजुर्गों के लिए बैलगाड़ी का बंदोबस्त था। इससे पहले कभी कोई नदी नहीं देखी थी। इसलिए बैलगाड़ी हमें लेकर गोमती के किनारे पहुंची तो लगा कि यह कोई बड़ा तालाब है। सोच में पड़ गया कि बैलगाड़ी आगे कैसे जाएगी। थोड़ी देर में नाव घाट पर आई।बालगाड़ी के पहियों के सामांतर दो पटरे लगा कर बैलगाड़ी को नाव पर धक्का देकर चढ़ाया गया। जबकि बैलों को रस्सी के सहारे नदी पार कराया गया। वापसी में बैलगाड़ी पर बोझ बढ़ गया था। नदी के पास एक नाले में बैलगाड़ी रेत में फंस गई. इस पर मेरे बाबा झुंझला गए। बोले-कोई अंजुरी भर सोना भी देगा तो भी मैं इस पार अपने बच्चों के ब्याह नहीं करूंगा। यह बात अलग है कि झुझलाहट में किए गए उनके संकल्प के बावजूद कइयों का ब्याह नदी पार के गांवो में ही हुआ। बाबा होते तो गोमती पर पुल देखकर खुश होते।गोमती नदीपुल बनने से जहां इलाके लोगों को खासी राहत मिली है। जेठ के दशहरे के मौके पर धोपाप पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को जोखिम से छुटकारा भी मिलेगा। जोखिम तो होता ही था क्योंकि जल्दी पहुंचने के चक्कर में श्रद्दालु नाव पर सवार होने से पहले उसकी क्षमता भी नहीं देखते थे। इस वजह से अक्सर नाव पलट जाती थी। कितने ही श्रद्धालुओं की हादसे में जान भी चली गई। इस इलाके में प्रचलित मान्यता है कि रावण का वध करने के बाद भगवान राम ने ब्राह्मण हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए गोमती में डुबकी लगाई थी। और जिस जगह उन्होंने अपने पाप को धोया था वही कालांतर में धोपाप के नाम से पहचानी गई। धोपाप में गोता लगाने के बाद भगवान राम ने गोमती के तट पर दीया जला कर जहां पूजा की थी, वह दियरा के नाम से चर्चित हो गया। बाद में यह दियरा बाकायदा एक रियासत बन गई। किदवंती तो यह भी है कि दियरा के राजा ने धोपाप में भव्य मंदिर बनाने की शुरुआत की थी। पर कामयाबी नहीं मिली। उसके बाद उन्होंने दियरा में जहां भगवान राम ने पूजा अर्चना की थी, गोमती किनारे वहीं विशाल मंदिर बनवाया। साथ में पांच मंजिला धर्मशाला भी। जिसकी पहली मंजिल तो नदी में ही समाई है। बताते हैं कि नदी के बीच में लगभग सौ मीटर चौड़ी सीढ़ियां हैं। मंदिर के पिछवाड़े फूलों का बगीचा है। बगीचे के बीचों-बीच एक कुआं है। मंदिर इतना सुंदर है कि उसे चाहे कितनी भी देर तक देखते रहें, आंखों थकती नहीं हैं। मंदिर के छज्जे पर लगी विभिन्न मुद्राओं वाली पत्थर की मानव मूर्तियां भी कम आकर्षक नहीं हैं। इन मुद्राओं में नृत्य करती स्त्रियां और ढोल-मजीरे सहित कई वाद्ययंत्र बजाते कलाकार हैं।मंदिर के पश्चिम में करीब एक किलोमीटर के फासले पर राजा का प्राचीन महल है। दरवाजा इतना विशालकाय है कि सजे-धजे हाथियों के इससे गुजरने की कहानी पर कतई अविश्वास नहीं होता। राजमहल के पिछवाड़े किस्म-किस्म के फलदार पेड़ों का विशाल बगीचा था तो दक्षिण में मीलों में फैला आंवे और अमरूद का बगीचा। दरवाजा तो अब भी बचा है। पर लंबे-चौड़े क्षेत्र में बना राजमहल वक्त के साथ खंडहर में तब्दील हो गया है। रख-रखाव की कमी ने हरे-भरे बाग-बगीचे को भी वीरान बना डाला है। दरवाजा सलामत रहने की भी वजह है। दरअसल उसके दोनों किनारों पर कई कमरे बने हैं। जिनमें एक इंटर कालेज चलता है। अपनी भी कुछ पढ़ाई इसी स्कूल में हुई। किशोरावस्था के वे तीन साल खासे मस्ती भरे थे। इसीलिए जब भी इस तरफ से दियरा घाट की तरफ जाता हूं, यहां की तमाम पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं।नदी के तट पर स्थित धर्मशाला में राजा ने जूनियर हाई स्कूल चलाने की अनुमती दी थी। रियासतें खत्म होने लगी तो राजा ने अपनी धर्मशाला से इस स्कूल को बाहर करना चाहा। पर गणित के एक अध्यापक अदालत चले गए। अदालत ने राजा के खिलाफ फैसला सुनाया। लिहाजा धर्मशाला में स्कूल का वजूद बना रहा। पढ़ाई के दौरान ही गोमती को कई रूपों में देखा। गर्मी और सर्दी में शांत भाव से बहने वाली गोमती बरसात के मौसम में विकराल रूप धर लेती है। दियरा में चंद्राकार बहने वाली गोमती में जब भी बाढ़ आती, वह कई धाराओं में बहने लगती। तट के गांवों और खेत-खलिहानों को समेटती हुई जब उफान पर होती तो उसे देख कर डर लगता था। स्कूल में भी पानी भर जाता और पढ़ने वालों की छुट्टी हो जाती थी। हालांकि इस तरह छुट्टी मिलना बचपन में बड़ा सुखद लगता था। पानी उतरने पर जब हम लोग स्कूल आते तो पाते के सबसे नीचे वाली मंजिल बालू से अटी पड़ी है। उसकी सफाई में महीनों लग जाते। बाढ़ के बाद पानी उतरता तो उल्टी दिशा में जाते सूंस दिखाई देते. इस विशाल जल जंतु को पंद्रह-बीस मिनट के अंतराल पर पानी में उछल-कूद करते देखना रोमांच पैदा करता था। गर्मियों के दिनों में दोपहर बाद स्कूल की छुट्टी होने पर सीढ़ियों पर बस्ता रख, कपड़े उतार कर नदी में छलांग लगाते। हम ऐसा घंटों करते। हम तैर कर नदी के दूसरे छोर पर निकलते। किनारे पर खड़े पेड़ों से तोड़ कर जंगली जलेबी का मजा लेते। फिर रेत से दांत साफ करते। अब तो चाह कर भी नहीं लौट-सकते बचपन के उस दौर में। धोपाप की पौराणिक महत्ता के कारण जहां हर साल गंगा सागर जाने वाले तीर्थयात्री अयोध्या में भरत कुंड पर पिंडदान करने के बाद यहां डुबकी जरूर लगाते हैं, वहीं जेठ के दशहरे पर दूर-दराज से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। गोमती गंगा से भी पुरानी नदी मानी जाती है। मान्यता है कि मनु-सतरूपा ने इसी नदी के किनारे यज्ञ किया था और इसी के तट पर नैमिषारण्य में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं ने तपस्या की थी।
सरकार भी मानती है कि गोमती में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। आईटीआरसी के शोधपत्र के मुताबिक चीनी मिलों और शराब के कारखानों के कचरे के कारण यह नदी प्रदूषित हो चुकी है। गोमती में जो कुछ पहुंचता है वह पानी नहीं बल्कि औद्योगिक कचरा होता है।गोमती पीलीभीत जिले के माधो टांडा के पास एक झील से निकल कर बनारस के पास गंगा में मिलती है। लखनऊ में आमतौर पर गोमती साफ रहती है। सरकार भी मानती है कि गोमती में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। आईटीआरसी के शोधपत्र के मुताबिक चीनी मिलों और शराब के कारखानों के कचरे के कारण यह नदी प्रदूषित हो चुकी है। गोमती में जो कुछ पहुंचता है वह पानी नहीं बल्कि औद्योगिक कचरा होता है। जानकार बताते हैं कि गोमती की दुर्दशा के लिए चीनी मिलें ज्यादा जिम्मेदार हैं। जो अपना कचरा इस नदी में उड़ेलती हैं।दो दशक पहले तक भी लखनऊ और सुल्तानपुर शहरों के आसपास भले गोमती का पानी मटमैला होता था, पर दियरा घाट पर वह हमेशा साफ रहता था। पानी तकनीकी दृष्टि से भले प्रदूषिक हो, पर दिखने में स्वच्छ और पीने में स्वादिष्ट होता था। इस बार पूरी नदी का काला रूप देखा तो बचपन की सारी यादें बेमानी लगने लगीं। एक तो पानी पहले ही काफी प्रदूषित हो चुका है ऊपर से नए बने पुल पर रोजाना हजारों वाहन गुजरेंगें तो स्वाभाविक है कि यहां की आबोहवा भी प्रदूषित हुए बिना न रहेगी। विकास का मतलब अगर प्राकृतिक संसाधनों का विनाश है तो ऐसे विकास का फायदा क्या है।
सरकार भी मानती है कि गोमती में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। आईटीआरसी के शोधपत्र के मुताबिक चीनी मिलों और शराब के कारखानों के कचरे के कारण यह नदी प्रदूषित हो चुकी है। गोमती में जो कुछ पहुंचता है वह पानी नहीं बल्कि औद्योगिक कचरा होता है।गोमती पीलीभीत जिले के माधो टांडा के पास एक झील से निकल कर बनारस के पास गंगा में मिलती है। लखनऊ में आमतौर पर गोमती साफ रहती है। सरकार भी मानती है कि गोमती में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। आईटीआरसी के शोधपत्र के मुताबिक चीनी मिलों और शराब के कारखानों के कचरे के कारण यह नदी प्रदूषित हो चुकी है। गोमती में जो कुछ पहुंचता है वह पानी नहीं बल्कि औद्योगिक कचरा होता है। जानकार बताते हैं कि गोमती की दुर्दशा के लिए चीनी मिलें ज्यादा जिम्मेदार हैं। जो अपना कचरा इस नदी में उड़ेलती हैं।दो दशक पहले तक भी लखनऊ और सुल्तानपुर शहरों के आसपास भले गोमती का पानी मटमैला होता था, पर दियरा घाट पर वह हमेशा साफ रहता था। पानी तकनीकी दृष्टि से भले प्रदूषिक हो, पर दिखने में स्वच्छ और पीने में स्वादिष्ट होता था। इस बार पूरी नदी का काला रूप देखा तो बचपन की सारी यादें बेमानी लगने लगीं। एक तो पानी पहले ही काफी प्रदूषित हो चुका है ऊपर से नए बने पुल पर रोजाना हजारों वाहन गुजरेंगें तो स्वाभाविक है कि यहां की आबोहवा भी प्रदूषित हुए बिना न रहेगी। विकास का मतलब अगर प्राकृतिक संसाधनों का विनाश है तो ऐसे विकास का फायदा क्या है।
गांधी के पथ पर संत
Source: दि संडे पोस्टशिवानंद महाराजसाधारण सा धोती-कुर्ता और खड़ाऊं पहने दुबली-पतली काया वाले एक संत बाकी संतों से कुछ अलग हैं। यह न बड़े पण्डाल में बैठ प्रवचन देते हैं, न ही टेलीविजन चैनलों में, पर गांधी को भूल चुके उनके अनुयायियों के लिए ये एक सीख की तरह हैं। इनके गाँधीवादी तरीके से जारी आंदोलनों ने कई बार शासन को अपनी नीतियाँ बदलने को मजबूर किया। गंगा को खनन माफियाओं से बचाने की इनकी लड़ाई लगातार जारी है। ये संत हैं हरिद्वार के कनखल में गंगा किनारे बने मातृसदन के कुटियानुमा आश्रम में रहने वाले शिवानंद महाराज स्टोन क्रेशर माफिया और शासन-प्रशासन की कैद में खोखली होती गंगा को मुक्त कराने का एक दशक से भी लंबा इनका संघर्ष किसी से छुपा नहीं है। शिवानंद महाराज की गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने की प्रतिबद्धता ऐसे दौर में भी लगातार बनी हुई है जब गंगा के नाम पर खूब राजनीति हो रही हैराष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की शुरूआत दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ सबसे पहले की थी। इस आंदोलन की बड़ी विशेषता अनशन को हथियार बना सत्ता तक अपनी बात पहुंचाना और मनवाना था। गांधी जी ने बाद में राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में इसको बार-बार अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ अपना सबसे ताकतवर हथियार बना इस्तेमाल किया। वे कुल 17 बार अनशन पर बैठे थे। गांधी अनशन को सबसे श्रेष्ठ प्रकार की पूजा कहते थे। हरिद्वार मातृसदन के महात्मा शिवानंद महाराज गांधी जी से प्रेरणा ले अनशन को खनन माफियाओं और संवेदनहीन सरकार के विरुद्ध हथियार बना एक अनूठी लड़ाई लड़ रहे हैं। हिंसक माफियाओं के खिलाफ उन्हें इस अहिंसक युद्ध में कई बार जान की बाजी तक लगानी पड़ी है लेकिन वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।बिहार के दरभंगा जिले में सझुआर गांव के मूल निवासी शिवानंद महाराज के पिता बचपन में ही गुजर गए थे। इनका पालन पोषण मां ने किया। आठवीं कक्षा से ही इनका झुकाव अध्यात्म की ओर हो गया। बिहार विश्वविद्यालय से कैमिस्ट्री में बीएससी करने के बाद कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय से एमएससी की डिग्री ली। पढ़ाई पूरी कर केशोराम इंटर कॉलेज कोलकाता में प्रवक्ता बन गए। अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए इन्हें छोटे मोटे काम भी करने पड़े।अध्यात्म के प्रति झुकाव ने इन्हें तीर्थ यात्रा करने के लिए प्रेरित किया। कॉलेज की छुट्टियों में शिवानंद महाराज उत्तराखण्ड की घाटियों में आने लगे। यह 1970 का दशक था। सत्तर के दशक से ही इनकी उत्तराखण्ड की नियमित यात्रा शुरू हुई। शिवानंद महाराज कहते हैं'उत्तराखण्ड की घाटियों और जंगलों में आकर सुकून मिलता था। यहां की प्रकृति बार-बार आकर्षित करती थी। छुट्टियों में यहां ध्यान करता था।' तभी से संन्यास को इन्होंने आधार बनाया। जून 1994 में कॉलेज की छुट्टियों के समय शिवानंद महाराज बदरीनाथ आए थे। बदरीनाथ में ही इन्होंने घर त्यागने का फैसला लिया। 1995 में घर बार छोड़कर पूरी तरह संन्यासी जीवन अपना लिया। भिक्षा मांग कर अपना जीवन चलाने लगे। शुरूआती दिनों में ब्रज को इन्होंने अपना स्थान बनाया लेकिन 1996 में ये हरिद्वार आ गए। हरिद्वार के कनखल में एक बगीचे में रहने लगे। उस वक्त इनके आठ-दस अनुयायी भी थे जो इनके साथ रहते थे। हरिद्वार में आकर इन्होंने भिक्षा फंड बनाया और इसी में मिलने वाले दान से ये और इनके शिष्य जीवन यापन करने लगे।हरिद्वार आने वाले विदेशी श्रद्धालुओं की मदद से मातृसदन को स्थापित किया गया। डरबन विश्वविद्यालय में फाइन आर्ट्स की प्रोफेसर ललिता जवाहरी लाल ने मातृसदन की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। ललिता हरिद्वार ध्यान के लिए आती थीं लेकिन सुबह चार बजे से ही हरिद्वार में बजने वाले लाउडस्पीकरों के चलते वे ध्यान नहीं कर पाती थीं। इस दौरान वे शिवानंद महाराज के संपर्क में आईं और उनकी शिष्य बन गईं। कनखल में गंगा के किनारे करीब पांच एकड़ जमीन खरीदकर उन्होंने मातृसदन आश्रम बनाया। गंगा किनारे तप कर रहे शिवानंद महाराज ने 1997 से गंगा को बचाने की मुहिम शुरू की। पहले उत्तर प्रदेश फिर उत्तराखण्ड शासन में लंबी लड़ाई के बाद पिछले साल इन्हें आंशिक सफलता मिली है।महाकुंभ 2010 से पहले खनन माफियाओं के दबाव में प्रदेश सरकार ने कुंभ मेला क्षेत्र को गंगा तट से सिमटाकर अन्य क्षेत्रों में फैला दिया। इस फैलाव में पौड़ी एवं देहरादून जिले के कई इलाकों को शामिल किया गया था। लेकिन हरिद्वार के मुख्य गंगा तट की तरफ इसे कम कर दिया गया। कुंभ मेला 1998 और वर्तमान कुंभ मेला 2010 के नक्शे से यह स्पष्ट होता है। इसकी मुख्य वजह इलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह फैसला माना जाता है जिसमें कुंभ मेला क्षेत्र में खनन पर रोक लगाई गई थी। गंगा किनारे हो रहे खनन वाले क्षेत्र को कुंभ क्षेत्र से निकालकर सरकार ने अपनी मंशा जाहिर कर दी थी कि खनन में उसकी सहमति और भागीदारी है। इस साजिश को नाकाम करने के लिए मातृसदन के महात्मा सौ से अधिक दिनों तक आमरण अनशन पर बैठे। राज्य सरकार ने इनकी बात सुनने के बजाय इन्हें प्रताड़ित करने में अपनी ताकत झोंक दी। दिल्ली से एक केंद्रीय मंत्री तक मातृसदन के महात्माओं से मिलने पहुंच गए लेकिन राज्य सरकार की नींद नहीं खुली। कुंभ के दौरान हरिद्वार में बढ़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ तथा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया की शहर में उपस्थिति से सरकार पर भारी दबाव था। आखिरकार सरकार ने 18 मार्च 2010 को आदेश (जीओ) जारी कर कुंभ क्षेत्र को गंगा तट की ओर बढ़ाया। एक सप्ताह बाद 26 मार्च 2010 को एक और सरकारी आदेश (जीओ) में कुंभ क्षेत्र में खनन पर रोक लगा दी गई। फिर भी गंगा में चल रहे खनन पर विराम नहीं लग सका। खनन कर रहा हिमालयन स्टोन क्रेशर कोर्ट की शरण में पहुंच गया और वहां से स्टे ले आया। मातृसदन के अनुसार बिना सरकार और दूसरे पक्ष को सुने न्यायालय ने खनन माफिया को स्टे दे दिया।गौरतलब है कि वर्ष 1998 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खनन माफियाओं से गंगा को बचाने के लिए कुंभ क्षेत्र में खनन एवं स्टोन क्रेशरों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था। उस वक्त उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए प्रशासन ने गंगा किनारे चल रहे सात स्टोन क्रेशरों में से छह को बंद करा दिया था। लेकिन प्रशासन यहां चल रहे हिमालयन स्टोन क्रेशर को पूर्णतः बंद कराने में नाकाम रहा। बताया जाता है कि हिमालयन स्टोन क्रेशर में भाजपा के एक मंत्री की हिस्सेदारी है। इसलिए जब भी प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती है, यह स्टोन क्रेशर यहां चालू हो जाता है। हरिद्वार में कुंभ मेला शुरू होने के पहले से ही सरकार पर इस खनन माफिया का भारी दबाव था। यही वजह है कि सरकार ने इस बार कुंभ मेला 2010 के क्षेत्र को गंगा तट की तरफ कनखल तक सीमित कर दिया ताकि हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना पर शासन-प्रशासन अपना पल्ला झाड़ सके। वर्ष 1998 के कुंभ मेला क्षेत्र में जगजीतपुर, अजीतपुर, मिस्सरपुर एवं जियापोता शामिल था। हिमालयन स्टोन क्रेशर मिस्सरपुर और अजीतपुर घाट पर ही है। इसलिए इस बार मिस्सरपुर, अजीतपुर सहित जगजीतपुर और जियापोता को कुंभ मेला क्षेत्र से बाहर कर दिया गया। इस बात का पता चलते ही पिछले बारह साल से गंगा बचाने की लड़ाई लड़ रहे मातृसदन के महात्मा आमरण अनशन पर बैठ गए। 15 अक्टूबर 2009 से ये कुंभ क्षेत्र बढ़ाने की मांग के साथ अनशन पर बैठे। एक सौ से ज्यादा दिन बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार का कोई प्रतिनिधि इनसे बात करने के लिए नहीं पहुंचा। इसी बीच केंद्रीय पर्यावरण एवं वन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जयराम रमेश ने अपने हरिद्वार दौरे के दौरान मातृसदन पहुंचकर पूरे मामले की जानकारी ली और कार्रवाई करने के आदेश दिए थे। केंद्रीय मंत्री के आने के बाद भी राज्य सरकार का कोई नुमाइंदा तत्काल इनसे मिलने नहीं आया।उस वक्त शिवानंद महाराज ने कहा था कि ' कुंभ मेला क्षेत्र को गंगा तट से कम करने के पीछे का सरकारी मकसद साफ है। सरकार खनन को रोकना नहीं चाहती। हमारे अनशन पर रोक लगा दी जाती है और अनशन खत्म होते ही खनन फिर शुरू हो जाता है। इस दौरान रात-दिन खनन कर माफिया साल भर का स्टोन जमा कर लेते हैं। बाद में उसका व्यापार करते हैं।' सरकार के रवैये को देखते हुए मातृसदन के महात्माओं ने घोषणा की 'यदि सरकार खनन पर स्थायी रोक नहीं लगाती तो मेले में वे पूर्ण आहुति देंगे।' इसके बाद हरिद्वार के जिलाधिकारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए महात्माओं की मांग की संस्तुति कर सरकार के पास भेजा। 24 जनवरी 2010 को जिलाधिकारी हरिद्वार के भेजे गए पत्र में स्पष्ट लिखा था कि मातृसदन के महात्मा पूर्ण आहुति के लिए अमादा हैं। ये बिना स्थायी समाधान के मानने को तैयार नहीं हैं। जिलाधिकारी ने यह भी आशंका व्यक्त की थी कि हरिद्वार में चल रहे कुंभ मेले में देश-विदेश से संत महात्मा एकत्रित हो रहे हैं। शहर में राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भी उपस्थित है। इसलिए यदि इसका तत्काल समाधान नहीं किया गया तो मेले में अवांछनीय घटना हो सकती है। जो सरकार और प्रशासन के लिए कठिनाइयां उत्पन्न कर सकती है। जिलाधिकारी के इस पत्र के बाद ही सरकार ने 18 मार्च 2010 और 26 मार्च 2010 को जीओ जारी किया था।गौरतलब है कि 'दि संडे पोस्ट' ने 15 नवंबर 2009 के अंक में खनन माफिया पर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें बताया गया था कि गंगा बचाने की मुहिम में जुटे मातृसदन के महात्माओं को प्रशासन ने प्रताड़ित करने के साथ कैसे उन पर कई झूठे मामले दर्ज किए। आमरण अनशन पर बैठे दो महात्माओं संत दयानंद तथा यजनानंद ब्रह्मचारी को गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया था। अनशन के दौरान यजनानंद ब्रह्मचारी ने कुछ भी खाने-पीने से मना कर दिया था। जबरदस्ती करने पर उन्होंने जिंदगी भर पानी तक नहीं पीने की धमकी दी थी। फिर भी पुलिस ने उन्हें त्रयोदशी व्रत के दिन जबरदस्ती नली से तरल पदार्थ दिया। जेल में उनकी तबीयत बिगड़ने पर पुलिस उन्हें आश्रम छोड़कर चली गयी। संत कई दिनों तक अस्पताल के आईसीयू में भर्ती रहे। वहीं आश्रम में शांतिपूर्ण ढंग से अनशन पर बैठे महात्मा शिवानंद पर भी प्रशासन का डंडा समय-समय पर चलता रहा।बाद में जेल भेजे गए महात्माओं पर लगाए गए सभी आरोप निराधार साबित हुए। आरोपों की जांच कर रही पुलिस जांच टीम इस पर अपनी फाइनल रिपोर्ट में सभी आरोप फर्जी बताए। इस रिपोर्ट के बाद पुलिस प्रशासन को मुंह की खानी पड़ी। महात्माओं को जेल भेजने के अलावा आश्रम की सुरक्षा में तैनात रहे सुरक्षाकर्मियों के शासकीय शुल्क के रूप में करीब 25 लाख रुपये वसूलने का दबाव बनाया गया। जबकि यह सुरक्षाकर्मी आश्रम को निःशुल्क प्रदान किए गए थे।शिवानंद महाराज की गंगा बचाने की मुहिम पिछले साल तब रंग लाई जब सौ से भी ज्यादा दिनों तक इनके आमरण अनशन के बाद उत्तराखण्ड सरकार ने गंगा किनारे स्टोन क्रेशर पर पाबंदी लगाने का आदेश जारी किया। यह आदेश 18 और 26 मार्च 2010 को जारी किया गया था। तब स्टोन क्रेशर मालिक कोर्ट जाकर इस आदेश पर स्टे प्राप्त कर लिया था। मातृसदन के संस्थापक शिवानंद महाराज ने न्यायाधीश बीएस वर्मा के समक्ष इस पर रोक के लिए याचिका दायर की थी। लेकिन कोर्ट ने बिना इनका पक्ष जाने पर्यावरण कानून का उल्लंघन होने के बावजूद इनकी याचिका को खारिज कर दिया। यह आश्चर्यचकित करने वाला फैसला था। न्यायाधीश बीएस वर्मा के इस फैसले से शिवानंद महाराज की लड़ाई को झटका लगा लेकिन वे पीछे नहीं हटे। इन्होंने पिछले साल एक बार फिर अनशन शुरू कर दिया जिसके बाद राज्य सरकार ने 10 दिसंबर 2010 को कुंभ क्षेत्र से खनन पर पूर्णतः रोक लगा दी। इस बार मातृसदन के महात्माओं की ओर से कोर्ट में कैबेट दाखिल किया गया था। इसके बाद उक्त मामले को चुनौती देने वाले किसी याचिका के दाखिल होने पर कैबेट देने वाले व्यक्ति को जानकारी दी जाती है तथा उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है। इस सरकारी आदेश के बाद हिमालयन स्टोन क्रेशर मालिक ने 27 दिसंबर को नैनीताल हाईकोर्ट के न्यायाधीश तरुण अग्रवाल के समक्ष याचिका दाखिल कर दी। इस मामले पर मातृसदन द्वारा कैबेट दर्ज कराए जाने के कारण कोर्ट को उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। हिमालयन स्टोन क्रेशर मालिक को याचिका दाखिल करने के दूसरे दिन ही स्टे दे दिया गया। नियमतः सरकारी आदेश पर स्टे लगाने की याचिका पर सरकार से जवाब मांगा जाता है और कैबेट दाखिल करने वाले को भी पक्ष रखने का मौका दिया जाता है।इस फैसले से आहत होकर मातृसदन के संस्थापक शिवानंद महाराज ने दो जनवरी से फिर अनशन पर बैठने का फैसला लिया था लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने उन्हें सलाह दी कि अनशन के पहले हाईकोर्ट के डबल बेंच में अपील करनी चाहिए। 6 जनवरी को नैनीताल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बारेन घोष और न्यायाधीश वीके बिष्ट की बेंच में याचिका दाखिल की गयी। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने रोक लगाने की बात कही थी लेकिन सुनवाई के बाद जब मातृसदन वालों को फैसले की कॉपी दी गई तो उसमें स्टे पर रोक नहीं लगायी गयी। मातृसदन के महात्माओं ने जब इस पर खोजबीन की तो आश्चर्यचकित करने वाले नतीजे सामने आए। शिवानंद महाराज कहते हैं 'हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार एनडी तिवारी ने बेंच के आदेश को बदल दिया है। अब कोर्ट में भी भ्रष्टाचार सामने आने लगा है। जब पूरी शासन व्यवस्था को भ्रष्टाचार की दीमक खा रही है तो ऐसे में न्यायपालिका पर सबकी उम्मीदें टिकी रहती हैं। हमने देखा कि हमारे मामले में न्यायाधीश वर्मा और न्यायाधीश तरुण अग्रवाल ने कानून को नजरंदाज कर फैसला सुनाया। इन दोनों न्यायाधीशों के खिलाफ हमने शिकायत की है।'
हमेशा के लिए ना रूठ जाए गंगा
देश में गंगा का अगर कहीं बहुत ही खूबसूरत रूप दिखता है तो वो है वाराणसी, लेकिन, गंगा अब काशी के लोगों को अपना डरावना रूप दिखा रही है. पहली बार वाराणसी के घाटों से गंगा दूर हो गई है और काशी के लोगों को अब ये डर सता रहा है कि कहीं उनसे हमेशा के लिए ना रूठ जाए गंगा
Monday, 23 May 2011
शंकुलधारा तालाब की सफाई के लिए श्रमदान
वाराणसी : खोजवां स्थित शंकुलधारा तालाब की सफाई के लिए रविवार को श्रमदान शुरू हुआ। केंद्रीय देव दीपावली महासमिति व श्रीद्वारिकाधीश शंकुलधारा श्रमदान समिति की ओर से इसके लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया था। पहले दिन तालाब की सीढि़यों की सफाई के साथ पानी से कुछ कचरा भी निकाला गया। इस क्रम में द्वारिकाधीश मंदिर में गोष्ठी आयोजित की गई। मुख्य वक्ता नगर आयुक्त विजय कांत दुबे ने कहा कि भौतिक संसाधनों से संस्कृति का क्षरण कभी नहीं रोका जा सकता। उन्होंने तालाबों के संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करने की जरूरत बताई। विकास प्राधिकरण के संयुक्त सचिव सतीश चंद्र मिश्र ने कहा कि कुंडों की रक्षा प्रशासन के साथ नागरिकों का भी दायित्व है। उन्होंने शंकुलधारा तालाब की सफाई में मदद के लिए नाव देने की घोषणा की। डॉ. केके शर्मा, महंत रामादाचार्य, महासमिति के अध्यक्ष बागीश दत्त मिश्र, छेदीलाल वर्मा, गुप्तेश्वर चौधरी, श्रीनारायण द्विवेदी, अशोक कुमार गुप्त, तुलसीदास मिश्र आदि ने विचार व्यक्त किए। संयोजन पन्नालाल सेठ ने किया।
मिट रही उद्धार की इबारत भी
अब तो मां गंगा के उद्धार की उद्घोषणा करने वाले शब्द भी मिटने लगे हैं। इसके लिए लगाया गया शिलापट्ट भी एक कोने में इस तरह दुबक गया है कि ढूंढ़ना मुश्किल। काशी के जिस घाट पर यह उद्घोषणा की गई थी, वह घाट भी अब झुग्गीनुमा दुकानों की भीड़ में गुम हो गया है। न तो यह स्थान मामूली है और न ही उद्घोषणा करने वाला व्यक्ति। यह वह स्थल है जहां से तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने गंगा को प्रदूषण से निजात दिलाने का एलान किया था। मां गंगा की दशा बद से बदतर होती जा रही है पर राजीव गांधी का वह भगीरथ प्रयत्न परवान नहीं चढ़ सका है। स्व. राजीव गांधी ने मां गंगा को निर्मल व स्वच्छ बनाने की योजना बनाई थी। इसके तहत गंगा में गिरने वाले नालों व सीवर को ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ दिया जाना था। गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के इस राष्ट्रीय अभियान की शुरुआत काशी के ही प्रसिद्ध राजेन्द्र प्रसाद घाट से हुई थी। दश्वाश्वमेध घाट से सटे इस घाट पर राजीव ने ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी, 14 जून 1986 को पांच साल के भीतर मां गंगा के मूलरूप को वापस लौटाने का एलान किया था। यह कोई आम एलान नहीं था वरन देश की सर्वोच्च सत्ता द्वारा की गई घोषणा थी। यह अलग बात है कि आज तक यह कार्य पूरा न हो सका बल्कि आज तो इस घोषणा का नामों निशान तक मिटने लगा है। स्थिति यह है कि बाहर से देखने पर राजेन्द्र प्रसाद घाट ढूढ़ा ही नहीं जा सकता। इस घाट पर जाने वाले मार्ग पर झुग्गीनुमा दुकानों का कब्जा है। कभी रेडिश मार्केट का हिस्सा रहीं इन दुकानों को इस घाट पर बसा दिया गया है। घाट पर अगर किसी तरह कोई पहुंच भी जाए तो उसे यह पता नहीं चल सकेगा कि इस स्थल पर देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने गंगा को प्रदूषण से निजात दिलाने के लिए कोई घोषणा की थी या कोई परियोजना शुरू की थी। इस अवसर पर बनाया गया शिलापट्ट अब लापता है। इसकी जगह मानमंदिर की दीवार में राजेन्द्र प्रसाद घाट के निर्माण व उद्घाटन के संबंध में चस्पा शिलापट्ट के अंत में कुछ पंक्तियां गंगा प्रदूषण मुक्ति अभियान की शुरूआत को समर्पित कर दी गई हैं। इसमें लिखा गया है कि ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी संवत 2043 तदनुसार 14 जून 1986 दिन शनिवार को राजीव गांधी प्रधानमंत्री भारत सरकार ने गंगा प्रदूषण मुक्ति अभियान की शुरुआत की थी। वैसे इस शिलापट पर लिखे यह अक्षर भी अब मिटने लगे हैं। यह हालात तब हैं जबकि 1991 में स्व. गांधी की शहादत से उभरी सहानुभूति लहर ने कांग्रेस को केन्द्र में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता दिलाई थी। अब भी केन्द्र सरकार कांग्रेस की ही है।
देश में पीने के पानी का भी होगा अकाल
तेजी से गिर रहे भूजल स्तर से गंगा-यमुना का मैदानी इलाका भी गंभीर जल संकट के भंवर में है। खेती-बाड़ी वाले बड़े राज्यों में जल संकट की वजह से खाद्य सुरक्षा की नई चुनौती खड़ी हो गई है। सूखा और पानी के अंधाधुंध दोहन से देश के 35 फीसदी ब्लॉकों में जमीन का पानी तेजी से सूख रहा है। उत्तरी राज्यों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आधे से अधिक ब्लॉक डार्क एरिया में तब्दील हो चुके हैं। केंद्र सरकार भी इस पर चिंता जताने से आगे नहीं बढ़ पाई है। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट भूजल संकट की और भी खतरनाक तस्वीर सामने रख रही है। इसमें चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध जल दोहन का हाल यही रहा, तो अगले एक दशक में भारत के 60 फीसदी ब्लॉक सूखे की चपेट में होंगे। तब फसलों की सिंचाई तो दूर पीने के पानी के लिए भी मारामारी शरू हो सकती है। इन्हीं तथ्यों का हवाला देते हुए केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने राज्यों को पत्र लिखकर राज्य भूजल प्राधिकरण के गठन के निर्देश को फिर याद दिलाने की रस्म अदायगी कर ली है, लेकिन एक भी ठोस कदम नहीं उठाए जा सके हैं। राष्ट्रीय स्तर पर 5723 ब्लॉकों में से 1820 ब्लॉक में जल स्तर खतरनाक हदें पार कर चुका है। जल संरक्षण न होने और लगातार दोहन के चलते 200 से अधिक ब्लॉक ऐसे भी हैं, जिनके बारे में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने संबंधित राज्य सरकारों को तत्काल प्रभाव से जल दोहन पर पाबंदी लगाने के सख्त कदम उठाने का सुझाव दिया है। जल संसाधन मंत्रालय ने अंधाधुंध दोहन रोकने के उपाय भी सुझाए हैं। इनमें सामुदायिक भूजल प्रबंधन पर ज्यादा जोर दिया गया है। भूजल के भारी दोहन से दिल्ली के तीन जिले डार्क एरिया में शुमार हैं। नतीजतन, यहां पेयजल की आपूर्ति भूजल के बजाय अब गंगा और यमुना के पानी पर अधिक हो गई है। मगर अभी बाकी देश खासतौर से उत्तरी राज्यों में इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा सका है। उत्तरी राज्यों में हरियाणा के 65 फीसदी, पंजाब के 81, राजस्थान के 86 और उत्तर प्रदेश के 30 फीसदी ब्लॉकों में भूजल चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है, वहां की सरकारें आंखें बंद किए हुए हैं।
Tuesday, 12 April 2011
डॉ.नरेन्द्र कोहली
175, वैशाली, पीतमपुरा, दिल्लीक 110034 फोन : 91-11-27312605, 27315197 अणुमेल : narendra@narendrakohli.org
प्रिय व्योेमेश जी,
आपका संदेश मिला। सूर्यभान ने जीवट का काम किया है। यह प्रसन्नदता का विषय है कि हमारी युवा पीढ़ी अपनी संस्कृपति की रक्षा के लिए दत्तनचित्ता है। देश का भूगोल हमारी संस्कृतति का महत्वदपूर्ण अंग है। उसकी रक्षा, उसकी स्वतच्छाता की रक्षा, संस्कृीति की रक्षा है। दार्शनिक और आध्या्त्मिक दृष्टि से भी हमारी यह मान्य ता है कि ब्रह्म ने ही स्वकयं अपने आप को प्रकृति के रूप में प्रकट किया है। स्वायमी विवेकानन्दह ने कहा था, इट इज़ नॉट क्रियेशन, इट इज़ प्रोजेक्श।न। प्रकृति ब्रह्म से भिन्न् नहीं है। इसलिए गंगा और वरुणा उस ब्रह्म का ही प्रकटीकृत रूप हैं। उनकी पूजा कर हम ब्रह्म की ही आराघना करते हैं और प्रकृति की पूजा उसकी स्वीच्छबता की रक्षा कर ही की जातीहै।
मैं आज तक यह समझ नहीं पाया कि वे लोग, जो सारे महानगरों का मल स्व च्छ सरिताओं में मिलाने की योजनाएं बनाते हैं, जो गंदे नालों को पीने के स्वहच्छछ जल में मिला कर उसे विष में परिणत कर देते हैं, वे स्वकयं को अभियन्ताह, वास्तुेश्रिल्पीि और नगरनिर्माता कहने का साहस कैसे करते हैं। कैसे हमारी शैक्षिक संस्थासएं उनको वे उपाधियों देती हैं और कैसे हमारी सरकारें उनको अधिकारी विद्वान् मानती हैं।
मैं उन लोगों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूं, जो गंगा और वरुणा के स्व च्छन अस्तित्वक की रक्षा के लिए प्रयत्नर ही नहीं कर रहे, अपने प्राणों पर संकट झेल कर अनशन पर बैठे हैं। मैं भारत माता से प्रार्थना करता हूं कि वह अपने इन सपूतों के भाल पर स्वैयं अपने हाथ से सफलता का तिलक अंकित कर दें।
आपका
नरेन्द्र कोहली
14.6.2008
175, वैशाली, पीतमपुरा, दिल्लीक 110034 फोन : 91-11-27312605, 27315197 अणुमेल : narendra@narendrakohli.org
प्रिय व्योेमेश जी,
आपका संदेश मिला। सूर्यभान ने जीवट का काम किया है। यह प्रसन्नदता का विषय है कि हमारी युवा पीढ़ी अपनी संस्कृपति की रक्षा के लिए दत्तनचित्ता है। देश का भूगोल हमारी संस्कृतति का महत्वदपूर्ण अंग है। उसकी रक्षा, उसकी स्वतच्छाता की रक्षा, संस्कृीति की रक्षा है। दार्शनिक और आध्या्त्मिक दृष्टि से भी हमारी यह मान्य ता है कि ब्रह्म ने ही स्वकयं अपने आप को प्रकृति के रूप में प्रकट किया है। स्वायमी विवेकानन्दह ने कहा था, इट इज़ नॉट क्रियेशन, इट इज़ प्रोजेक्श।न। प्रकृति ब्रह्म से भिन्न् नहीं है। इसलिए गंगा और वरुणा उस ब्रह्म का ही प्रकटीकृत रूप हैं। उनकी पूजा कर हम ब्रह्म की ही आराघना करते हैं और प्रकृति की पूजा उसकी स्वीच्छबता की रक्षा कर ही की जातीहै।
मैं आज तक यह समझ नहीं पाया कि वे लोग, जो सारे महानगरों का मल स्व च्छ सरिताओं में मिलाने की योजनाएं बनाते हैं, जो गंदे नालों को पीने के स्वहच्छछ जल में मिला कर उसे विष में परिणत कर देते हैं, वे स्वकयं को अभियन्ताह, वास्तुेश्रिल्पीि और नगरनिर्माता कहने का साहस कैसे करते हैं। कैसे हमारी शैक्षिक संस्थासएं उनको वे उपाधियों देती हैं और कैसे हमारी सरकारें उनको अधिकारी विद्वान् मानती हैं।
मैं उन लोगों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूं, जो गंगा और वरुणा के स्व च्छन अस्तित्वक की रक्षा के लिए प्रयत्नर ही नहीं कर रहे, अपने प्राणों पर संकट झेल कर अनशन पर बैठे हैं। मैं भारत माता से प्रार्थना करता हूं कि वह अपने इन सपूतों के भाल पर स्वैयं अपने हाथ से सफलता का तिलक अंकित कर दें।
आपका
नरेन्द्र कोहली
14.6.2008
Sunday, 10 April 2011
हजार रूपों में दिखे अन्ना हजारे
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वाराणसी, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में उतरे गांधीवादी अन्ना हजारे के समर्थन में शुक्रवार को तमाम संगठन आंदोलन में कूद पड़े। मैदान-ए-जंग में कूदकर मातृशक्ति ने जहां अन्ना की अगुवाई में छिड़े संग्राम को और शक्ति प्रदान की, वहीं अधिवक्ताओं, चिकित्सकों, बैंक कर्मियों, शिक्षकों व व्यापारियों के कई और संगठनों ने भी मोर्चा खोला। यूं लग रहा था मानों अन्ना हजारों रूपों में घूम रहे हों। उपवास, कैंडिल मार्च, जुलूस व सभा कर सबने संकल्प लिया कि जन लोकपाल बिल पर अन्ना की सारी मांग तो मान ली गई है लेकिन आम जीवन में आगे भी भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रहेगी। पाणिनी : मातृशक्ति ने रखा उपवास- पाणिनी कन्या महाविद्यालय एवं नारी जागरण की ओर से पाणिनी मंदिर परिसर में छात्राओं व महिलाओं ने उपवास रखा। इस दौरान अन्ना तुम संघर्ष करो-हम तुम्हारे साथ हैं का नारा बुलंद किया गया। इस मौके पर हुई सभा में महिलाओं ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक जंग शुरू हो चुकी है और मातृशक्ति दूसरी लोकतांत्रिक क्रांति के तैयार है। सभा को मीना चौबे, नंदिता शास्त्री, प्रियंका भारती, संजीवनी आनंद, ज्योति आर्या, प्रियंबदा, मधु यादव, डॉ.वीणा सहाय, जाह्नवी आदि ने संबोधित किया। महिला चिकित्सकों का संकल्प : स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों की संस्था फॉग्सी की डॉ.आशा भारद्वाज की अध्यक्षता में सिगरा में हुई बैठक में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन को पूर्ण समर्थन देने का संकल्प लिया गया। डॉ.आशा ने कहा कि अन्ना की जंग से सीख लेते हुए यदि देश का हर व्यक्ति भ्रष्टाचार न करने और उसे प्रोत्साहित न करने का संकल्प ले ले तो राष्ट्र की तस्वीर बदल जाएगी। अधिवक्ताओं का कैंडिल मार्च : सेल्सटैक्स व इनकमटैक्स से जुड़े अधिवक्ताओं ने अन्ना हजारे के समर्थन में वाणिज्य कर भवन से कैंडिल मार्च निकाला और आजाद पार्क (लहुराबीर) पहुंच कर सामूहिक उपवास पर बैठ गए। इस दौरान हुई सभा में सेल्स टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष सज्जन कुमार जालान ने कहा कि गांधीवादी अन्ना हजारे की लड़ाई एक ऐसी गंभीर समस्या को लेकर है जिससे पूरा देश प्रभावित है। कहा कि लोकपाल संस्था को स्वायत्तशासी व संवैधानिक दर्जा दिया जाए। सभा में नवरतन सिंह, केदारनाथ टण्डन, शरद त्रिपाठी, काली शंकर श्रीवास्तव, सुधीर सक्सेना, प्रियनंद मिश्र, रामजी अग्रवाल, सदानंद सिंह, लल्लन सिंह, अशोक सेठ, अशोक श्रीवास्तव के अलावा इनकम टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद शुक्ल, मंत्री गोपेश जैन, अजय सिंह, श्रीहर्ष सिंह ने भाग लिया। मोमबत्ती लेकर उतरे सड़क पर : इंडिया एगेंस्ट करप्शन की ओर से लंका से कैंडिल मार्च निकाला और लोगों में हैंडबिल बांटे। इस कार्यक्रम में अवधेश मिश्रा, मो. आरिफ अंसारी, रविशंकर भारत, नकुल अरोड़ा, संतोष बिहारी, मनींद्र, संजय शुक्ल सहित काफी संख्या में आईटी के छात्रों ने हिस्सा लिया। अखिल भारतीय लोकाधिकार संगठन की ओर से टाउनहाल स्थित गांधी प्रतिमा के निकट दीप प्रज्जवलित किया गया। इस कार्यक्रम में गंगा सहाय पाण्डेय, राजेंद्र त्रिवेदी, शिवकरण अवस्थी, चंद्रेश्वर प्रसाद, सिद्धनाथ शर्मा, उमाशंकर पाण्डेय आदि शामिल थे। डीएलडब्ल्यू मजदूर संघ ने कंदवा गेट से डीरेका तक कैंडिल मार्च निकाला। इस मार्च में नरेंद्र मिश्र, आलोक मिश्र, राकेश कुमार पाण्डेय, सुरेश प्रसाद, सुरेश विश्वकर्मा आदि शामिल थे। बैंक कर्मियों का समर्थन : इलाहाबाद बैंक की चौक शाखा में वरिष्ठ प्रबंधक वासुदेव ओबेराय की अध्यक्षता में हुई बैठक में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की जंग को समर्थन देने का संकल्प लिया गया। श्री ओबेराय ने कहा कि गांधीवादी अन्ना ने एक ऐसी समस्या यानी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा है, जो राष्ट्र को दीमक समान चाट रहा है। बैठक में गिरीश पाण्डेय, संजय प्रसाद, रमित मिश्र आदि ने भाग लिया। आईएमए की रैली : अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में आईएमए के बैनर तले चिकित्सकों ने शहीद उद्यान से भारत माता मंदिर तक रैली निकाली। इस दौरान जन लोकपाल विधेयक को लागू करने की सरकार से मांग की गई। रैली में डॉ. कुसुम चंद्रा, डॉ. विवेक कुमार, डॉ. आलोक भारद्वाज, डॉ. आशा भारद्वाज, डॉ.संजय राय, डॉ. अजित सैगल, डॉ. ज्योति सिंह, डॉ. वीपी सिंह, डॉ. अश्विनी टंडन, डॉ. अनुराग टंडन, डॉ. राजेश अग्रवाल, डॉ. शैलेष ने भाग लिया। मुख्यालय पर जुटे सामाजिक संगठन : जिला मुख्यालय पर चौथे दिन भी अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं भ्रष्टाचार को मिटाना है, अन्ना का साथ निभाना है आदि नारे बुलंद होते रहे। साझा संस्कृति मंच, भाकपा माले, आइसा, गौरी केदार सेवा समिति, भ्रष्टाचार निर्मूलन समिति, नरेगा मजदूर यूनियन के कार्यकर्ताओं ने धरना देकर सभा की। लोगों ने हस्ताक्षर अभियान में सहभागिता की। सभा व धरने में मनीष शर्मा, कुसुम वर्मा, राजेश, गणेश शर्मा, सहेंद्र पाल, राजेंद्र पांडेय, आनंद तिवारी, ओपी केजरीवाल, पूनम, आशा शामिल थे। विभिन्न संगठन भी मैदान में : भारत विकास परिषद व माहेश्वरी समाज के पुरूषों व महिलाओं ने सिगरा के शहीद उद्यान में दीपक माहेश्वरी के नेतृत्व में मोमबत्ती जलाकर अन्ना के आंदोलन को समर्थन देने का संकल्प लिया। मारवाड़ी समाज के लोगों ने अनिल जाजोदिया व जेसीआई वाराणसी के सदस्यों ने जेसी संजय अरोड़ा की अगुवाई में मलदहिया स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिभा के समक्ष मोमबत्ती जलाकर अन्ना को समर्थन का संकल्प लिया। इस मौके पर अजय साहनी, प्रवीण कपूर, संजय अग्रवाल, रूपेश माहेश्वरी आदि मौजूद थे।मीरापुर बसहीं के क्षेत्रीय लोगों ने बबलू श्रीवास्तव के नेतृत्व में कैंडिल मार्च निकाला, जो भोजूबीर तिराहे तक गया। अर्दली बाजार व भोजूबीर व्यापार मंडल की ओर से व्यापारियों ने अनशन किया। अनशन में विपुल पाठक, आनंद सोनकर, विनोद पाण्डेय, अजय गुप्ता, ओमप्रकाश गुप्ता, विनोद सिंह शामिल थे। आजाद पार्क में जुटे व्यापारी : वाराणसी नगर उद्योग व्यापार मंडल के तत्वावधान में व्यापारियों ने अन्ना हजारे के समर्थन में लहुराबीर स्थित आजाद पार्क में सामूहिक उपवास रखा। उपवास में मोहनलाल सरावगी, जेठमल चाण्डक, अजीत बग्गा, प्रभाकर सिंह आदि शामिल थे। बांसफाटक व्यावसायिक संघ जनता दल यूनाईटेड, राष्ट्र बचाओ संघर्ष समिति, जागृति फाउंडेशन के सदस्यों ने भी अन्ना हजारे के समर्थन में सभा की और कैंडिल मार्च निकाला। कचहरी में पैदल मार्च : अधिवक्ताओं ने दीवानी कचहरी परिसर से जिला मुख्यालय तक पैदल मार्च किया। मार्च में राजेंद्र प्रताप पाण्डेय, वीरेंद्र प्रताप सिंह, राजेश मिश्र, विवेक शंकर तिवारी (माइकल), संजय कुमार चौरसिया, लवकुश सिंह, कामेश्वर ओझा शामिल थे। महामना प्रतिमा के पास अनशन : लंका पर महामना प्रतिमा के निकट बीएचयू के प्रोफेसर, चिकित्सक भी अनशन पर बैठे। इनमें पवन सिंह, डॉ. श्रविण कुमार सिंह, रामबचन पाण्डेय, शिवकुमार सिंह, ओमप्रकाश सिंह, डॉ. जेपी सिंह, डॉ. वीपी सिंह, प्रो. दीनानाथ सिंह, प्रो. राजेंद्र राय, प्रो. आद्या पाण्डेय आदि शामिल थे। किया यज्ञ व पूजन : विकास एवं शिक्षण समिति ने शिवपुरवा स्थित कार्यालय पर बुद्धि-शुद्धि यज्ञ आयोजित किया। यज्ञ में राजेश श्रीवास्तव, संतोष द्विवेदी, रेनू श्रीवास्तव, प्रवीण मौजूद थे। समाजवादी पार्टी का जुलूस : सपा कार्यकर्ताओं ने नरिया से लंका तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जुलूस निकाला। जुलूस में कमल पटेल, अखिलेश सोनकर, अनिल राजभर, पप्पू यादव आदि शामिल थे। पूर्वाचल मुक्ति मोर्चा के भरत तिवारी, रमेश चौधरी, डॉ. हरिकेश सिंह, ऊषा सिंह चौहान ने धरना दिया। द टूरिस्ट ड्राइवर वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से मोमबत्ती जुलूस निकाला गया। आदर्श भारतीय संघ की ओर से भारत माता मंदिर में मोमबत्ती जलाई गई। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सुरक्षा परिषद की ओर से पहडि़या में, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से यूपी कालेज से जिला मुख्यालय तक कैंडिल मार्च निकाला गया। हरहुआ में भाजपा कार्यकर्ताओं ने कैंडिल मार्च निकाला। पिण्डरा में नंदराम शास्त्री के नेतृत्व में धरना दिया गया।
Friday, 8 April 2011
उफ! किसने कर दी हरियाली की हत्या
वाराणसी, दुस्साहस तो देखिए। जिस रास्ते से प्रतिदिन जिले के तमाम आला अफसरों की गाडि़यां गुजरती है। कमिश्नर का आवास व विकास प्राधिकरण का दफ्तर जहां से चंद कदम की दूरी पर है। फिर भी निर्मम तरीके से कचहरी के समीप उद्यान विभाग के पिछले हिस्से पर सड़क के किनारे लगे आधा दर्जन से अधिक पेड़ों को काट डाला गया। नए वरुणापुल से जेपी मेहता इंटर कॉलेज से लेकर कमिश्नर आवास तक जिस मार्ग पर धूप अपने तेवर नहीं दिखा पाती थी आज उस इलाके के एक दर्जन से अधिक पेड़ काट दिए गए हैं। एक तो बनारस वैसे ही कंक्रीट का शहर बनता जा रहा है। विभागीय अफसरों की आंकड़ेबाजी के चलते हरियाली नाममात्र की रह गई है। ऐसे में अगर बड़े-बड़े पेड़ों को लोग यूं ही काटते रहेंगे तो शहर में सांस लेना भी मुश्किल हो जाएगा। जेपी मेहता इंटर कॉलेज के सामने बनारस क्लब के पिछले हिस्से में सड़क के किनारे दर्जनों पेड़ मौजूद थे। इधर कुछ महीनों से एक-एक कर पेड़ गायब होते गए। आज सिर्फ ठूंठ बचा है जो अपनी कुर्बानी की गवाही दे रहा है। सवाल यह उठता है कि आखिर वह कौन लोग हैं जो दिनदहाड़े या रात में पेड़ों पर कुल्हाड़ी चला कर मौज में हैं। पुलिस व वन विभाग के लोग आखिर कहां गए। सूत्रों की माने तो क्षेत्र में खानाबदोश लोग अपना डेरा-डंडा कई महीनों से जमाए हैं। उनमें से कुछ परिवार लकड़ी के खिलौने बनाने का भी काम करता है। आशंका है कि खिलौने के लिए उन्हीं लोगों ने पेड़ों की बलि चढ़ा दी होगी
Wednesday, 23 March 2011
प्रति व्यक्ति पानी खपत कम करने पर जोर
वाराणसी : वर्ष 2010 से 2030 के बीच पीने योग्य पानी की विकट समस्या खड़ी होने वाली है, क्योंकि इस दौरान एशिया एवं अफ्रीका की जनसंख्या दोगुनी हो जाएगी। इसका सर्वाधिक प्रभाव शहरी क्षेत्रों में पड़ेगा। कारण यह है कि आधी से अधिक जनसंख्या शहर में ही प्रवास करेगी। इस जनसंख्या के 38 फीसदी लोगों का प्रवास झुग्गी झोपडि़यों में होगा। बीएचयू स्थित प्रौद्योगिकी संस्थान के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में विश्व जल दिवस पर मंगलवार को शहरों में जल समस्या पर आयोजित संगोष्ठी में उक्त विचार उभरकर आए। वक्ताओं का कहना रहा कि यदि समय रहते चेता नहीं गया तो आने वाले दिनों में जल की झलक पाने को लोग तरस जाएंगे। इस समस्या का हल बिना जन सहयोग के संभव नहीं होगा। इसके लिए प्रति व्यक्ति पानी की खपत की दर में कम करने की कोशिश की जाए। वर्तमान में 140 लीटर प्रति व्यक्ति पानी की खपत है। विकसित देशों में इस ओर प्रयास अभी से शुरू हो चुके हैं। पीने योग्य जल के अलावा अन्य आवश्यकताओं के लिए विकसित देशों में व्यर्थ पानी को रिसाइकिल कर प्रयोग में लाया जा रहा है। हमें भी इस पर विचार करना होगा।
.................तो क्या सूख जाएंगी गंगा ?
देवि सुरेश्वरी भगवती गंगे, त्रिभुवन तारिणी तरल तरंगे। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह पंक्तियां यह बताने के लिए पर्याप्त हैं गंगा का पृथ्वी पर अवतरण विश्व को तारने व जन्म जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था। इसी वजह से वह देव नदी कहलाई। यह देव नदी अब सूखने के कगार पर है। कम से कम पूर्वाचल के हालात तो यही हैं। पूर्वाचल की शुरुआत से लेकर अंत तक गंगा का जलस्तर हर स्थान पर लगातार तेजी से घट रहा है। अकेले वाराणसी में गंगा के स्तर में एक साल में ढाई फीट से अधिक की कमी आ चुकी है। जल स्तर घटने की यह रफ्तार हर साल बढ़ती जा रही है। गंगा का पृथ्वी पर अवतरण दैवीय उद्देश्यों के लिए हुआ था। इसके जल को अमृत मान कर काफी विवेक से इस्तेमाल की परंपरा रही है। अब स्थिति बदल गई है। इस समय इसका उपयोग किसी आम जल की तरह बिजली बनाने व सिंचाई करने में ही हो रहा है। टिहरी समेत दर्जनों बड़े छोटे बांध हर स्तर पर इसके प्रवाह को रोके पड़े हैं। बांधों से बने सरोवरों में इसकी समस्त जलराशि रुक जाने के चलते मैदानी ही नहीं अधिकांश पहाड़ी इलाकों में इसमें पानी की खासी किल्लत हो गई है। कभी साल भर पूरे पाट बहने वाली यह नदी अब बारिश में भी अपने पाट के दोनों किनारे नहीं छू पा रही है। खुद केन्द्रीय जल आयोग के आंकड़ों की मानें तो गंगा के जल स्तर में हर साल गिरावट आ रही है। इतना ही नहीं, जलस्तर घटने की रफ्तार हर साल बढ़ती जा रही है। वर्ष 2009-10 में एक फीट तो 10-11 में दो से ढाई फीट तक जलस्तर गिर गया। पूर्वाचल के मुहाने पर स्थित इलाहाबाद का उदाहरण लें तो यहां फाफामऊ में गंगा का जलस्तर 15 मार्च 2009 में 76.290 मीटर था। 2010 में 15 मार्च को यह जलस्तर 76.180 मीटर रह गया। इलाहाबाद में यमुना से मिलने के बाद भी गंगा की स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आ रहा है। इलाहाबाद स्थित छतनाग में 15 मार्च वर्ष 2009 में 71.400 मीटर जल था। 15 मार्च 2010 को यह घट कर 71.065 रह गया। वाराणसी के राजघाट से लेकर गाजीपुर तक घटने की यह रफ्तार इसी गति से जारी है। केन्द्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार गाजीपुर में 15 मार्च 2009 को 52.425 मीटर जल था। 15 मार्च 2010 को यह घट कर 51.840 रह गया। विशेषज्ञों की माने तो यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब गंगा नदारद हो जाएंगी। गंगा का जलस्तर गोपनीय! करोड़ों की श्रद्धा का केन्द्र मां गंगा के साथ खासा खिलवाड़ किया जा रहा है। इसमें कोई व्यवधान न खड़ा हो, इसके लिए सभी संभव सावधानियां बरती जा रही हैं। मां गंगा में कितना जल है, यह भी सीधे नहीं जाना जा सकता। केन्द्रीय जल आयोग के अधिकारियों की माने तो यह अति गोपनीय है। बाढ़ के समय केन्द्र सरकार के आदेश पर ही जलस्तर सार्वजनिक किया जाता है। अन्य मौसम में यह नहीं बताया जा सकता। वैसे इस गोपनीयता के बीच आंकड़ों के साथ कितना खिलवाड़ हो रहा होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। केन्द्रीय जल मंत्री के आने की सूचना मिलने के बाद लिए गए जल स्तर के आंकड़े इस बात की खुद गवाही दे रहे हैं। अचानक इलाहाबाद तक के सभी स्थानों पर जलस्तर पिछले साल की तुलना में बढ़ गया जबकि वाराणसी में मंत्री के आने की तिथि निर्धारित न होने के चलते ऐसा नहीं हुआ।
Tuesday, 22 March 2011
यह सच है कि जल ही जीवन
मंगलवार को विश्व जल दिवस है। हर साल यह दिन स्वच्छ पानी के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। पानी के महत्व का अहसास प्यास लगने पर ही होता है। पानी का कोई विकल्प नहीं है। इसकी एक-एक बूंद अमृत है। दूसरी ओर शहरों की बढ़ती जनसंख्या ने पानी की समस्या को और भी विकराल कर दिया है। न्यूनतम 140 लीटर प्रति व्यक्ति पानी की जरूरत पड़ती है लेकिन एशिया में 25 फीसदी लोगों की न्यूनतम पानी की आवश्यकता की भी पूर्ति नहीं हो पाती है। कंक्रीट के जंगल (शहरीकरण) में पानी जमीन के अंदर न जाकर बह जाता है। रास्ते में यह अपने साथ हमारे द्वारा बिखेरे खतरनाक रसायनों, तेल, ग्रीस, कीटनाशकों एवं उर्वरकों जैसे कई प्रदूषक तत्वों को ले जाकर पूरे जलFोत को प्रदूषित कर देता है। इसलिए संभव हो तो छिद्रित फर्श बनाए जा सकते हैं।
विश्व जल दिवस 22 मार्च 2011 पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून का संदेश
संसार इस समय जहां अधिक टिकाऊ भविष्य के निर्माण में व्यस्त हैं वहीं पानी, खाद्य तथा ऊर्जा की पारस्परिक निर्भरता की चुनौतियों का सामना हमें करना पड़ रहा है। जल के बिना न तो हमारी प्रतिष्ठा बनती है और न गरीबी से हम छुटकारा पा सकते हैं। फिर भी शुद्ध पानी तक पहुंच और सैनिटेशन यानी साफ-सफाई, संबंधी सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य तक पहुंचने में बहुतेरे देश अभी पीछे हैं।
एक पीढ़ी से कुछ अधिक समय में दुनिया की आबादी के 60 प्रतिशत लोग कस्बों और शहरों में रहने लगेंगे और इसमें सबसे अधिक बढ़ोतरी विकासशील संसार में शहरों के अंदर उभरी मलिन बस्तियों तथा झोपड़-पट्टियों के रूप में होगी। इस वर्ष के विश्व जल दिवस का विषय “शहरों के लिए पानी” –शहरीकरण की प्रमुख भावी चुनौतियों को उजागर करता है।
शहरीकरण के कारण अधिक सक्षम जल प्रबंधन तथा समुन्नत पेय जल और सैनिटेशन की जरूरत पड़ेगी। इसके साथ ही शहरों में अक्सर समस्याएं विकराल रूप धारण कर लेती हैं, और इस समय तो समस्याओं का हल निकालने में हमारी क्षमताएं बहुत कमजोर पड़ रही हैं।
जिन लोगों के घरों या नजदीक के किसी स्थान में पानी का नल उपलब्ध नहीं है ऐसे शहरी बाशिंदों की संख्या पिछले दस वर्षों के दौरान लगभग ग्यारह करोड़ चालीस लाख तक पहुंच गई है, और साफ-सफाई की सुविधाओं से वंचित लोगों की तादाद तेरह करोड़ 40 लाख बतायी जाती है। बीस प्रतिशत की इस बढ़ोतरी का हानिकारक असर लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक उत्पादकता पर पड़ा हैः लोग बीमार होने के कारण काम नहीं कर सकते।
पानी संबंधी चुनौतियां पहुंच से भी आगे बढ़ चुकी हैं। अनेक देशों में साफ-सफाई की सुविधाओं में कमी के कारण लड़कियों को स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है, और पनघट से पानी लाते समय या सार्वजनिक शौचालयों को जाते या आते हुए औरतों को परेशान किया जाता है। इसके अलावा, समाज के अत्यधिक गरीब और कमजोर वर्ग के सदस्यों को अनौपचारिक विक्रेताओं से अपने घरों में पाइप की सुविधा प्राप्त अमीर लोगों के मुकाबले 20 से 100 प्रतिशत अधिक मूल्य पर पानी खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। यह तो बड़ा अन्याय है। रियो डि जेनेरियोन में सन 2012 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास सम्मेलन में पानी का मसला उठाया जायेगा। गरीबी तथा असमानता घटाने, रोजगारों की रचना करने, तथा जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से उत्पन्न दबावों से होने वाले खतरों को कम करने के उद्देश्य से मेरा वैश्विक टिकाऊपन और यूएन-वॉटर पैनेल यह जांच कर रहा है कि पानी, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा की समस्याओं को आपस में जोड़ने के लिए क्या रास्ते निकाले जाएं।
इस विश्व दिवस पर मैं सरकारों से अनुरोध करता हूं कि शहरी जल संकट के बारे में वे यह मानकर चलें कि पानी की किल्लत जैसी कोई समस्या नहीं है, समस्या केवल चुस्त प्रशासन, लचर नीतियों और ढीले प्रबंधन की है। आइये, हम प्रतिज्ञा करें कि निवेश की भारी कमी को दूर करेंगे, और यह संकल्प भी ले कि प्रचुरता से सम्पन्न इस संसार में 80 करोड़ से भी अधिक लोग स्वस्थ और सम्मानपूर्वक रूप से जीने के लिए अब भी शुद्ध और सुरक्षित जल एवं साफ-सफाई के लिए तरस रहे हैं।
एक पीढ़ी से कुछ अधिक समय में दुनिया की आबादी के 60 प्रतिशत लोग कस्बों और शहरों में रहने लगेंगे और इसमें सबसे अधिक बढ़ोतरी विकासशील संसार में शहरों के अंदर उभरी मलिन बस्तियों तथा झोपड़-पट्टियों के रूप में होगी। इस वर्ष के विश्व जल दिवस का विषय “शहरों के लिए पानी” –शहरीकरण की प्रमुख भावी चुनौतियों को उजागर करता है।
शहरीकरण के कारण अधिक सक्षम जल प्रबंधन तथा समुन्नत पेय जल और सैनिटेशन की जरूरत पड़ेगी। इसके साथ ही शहरों में अक्सर समस्याएं विकराल रूप धारण कर लेती हैं, और इस समय तो समस्याओं का हल निकालने में हमारी क्षमताएं बहुत कमजोर पड़ रही हैं।
जिन लोगों के घरों या नजदीक के किसी स्थान में पानी का नल उपलब्ध नहीं है ऐसे शहरी बाशिंदों की संख्या पिछले दस वर्षों के दौरान लगभग ग्यारह करोड़ चालीस लाख तक पहुंच गई है, और साफ-सफाई की सुविधाओं से वंचित लोगों की तादाद तेरह करोड़ 40 लाख बतायी जाती है। बीस प्रतिशत की इस बढ़ोतरी का हानिकारक असर लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक उत्पादकता पर पड़ा हैः लोग बीमार होने के कारण काम नहीं कर सकते।
पानी संबंधी चुनौतियां पहुंच से भी आगे बढ़ चुकी हैं। अनेक देशों में साफ-सफाई की सुविधाओं में कमी के कारण लड़कियों को स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है, और पनघट से पानी लाते समय या सार्वजनिक शौचालयों को जाते या आते हुए औरतों को परेशान किया जाता है। इसके अलावा, समाज के अत्यधिक गरीब और कमजोर वर्ग के सदस्यों को अनौपचारिक विक्रेताओं से अपने घरों में पाइप की सुविधा प्राप्त अमीर लोगों के मुकाबले 20 से 100 प्रतिशत अधिक मूल्य पर पानी खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। यह तो बड़ा अन्याय है। रियो डि जेनेरियोन में सन 2012 में होने वाले संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास सम्मेलन में पानी का मसला उठाया जायेगा। गरीबी तथा असमानता घटाने, रोजगारों की रचना करने, तथा जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से उत्पन्न दबावों से होने वाले खतरों को कम करने के उद्देश्य से मेरा वैश्विक टिकाऊपन और यूएन-वॉटर पैनेल यह जांच कर रहा है कि पानी, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा की समस्याओं को आपस में जोड़ने के लिए क्या रास्ते निकाले जाएं।
इस विश्व दिवस पर मैं सरकारों से अनुरोध करता हूं कि शहरी जल संकट के बारे में वे यह मानकर चलें कि पानी की किल्लत जैसी कोई समस्या नहीं है, समस्या केवल चुस्त प्रशासन, लचर नीतियों और ढीले प्रबंधन की है। आइये, हम प्रतिज्ञा करें कि निवेश की भारी कमी को दूर करेंगे, और यह संकल्प भी ले कि प्रचुरता से सम्पन्न इस संसार में 80 करोड़ से भी अधिक लोग स्वस्थ और सम्मानपूर्वक रूप से जीने के लिए अब भी शुद्ध और सुरक्षित जल एवं साफ-सफाई के लिए तरस रहे हैं।
क्यों फेंके जाते हैं नदियों में सिक्के
अक्सर आपने देखा होगा कि जब बड़े-बुजुर्गो के साथ यात्रा कर रहे होते हैं तो रास्ते में किसी पौराणिक नदी के पड़ने पर वे उसे नमन करने के साथ ही परंपरा अनुसार नदी में सिक्के फेंकते हैं। अक्सर यह सवाल उठता है कि लोग नदी में सिक्के क्यों फेंकते हैं, यह परंपरा क्यों है और उसका क्या प्रभाव होता है। इसके पीछे कई कारण हैं। सभी धर्मो में दान-पुण्य मुख्य कर्म माना गया है। शास्त्रों के अनुसार दान करना पुनीत कार्य है। दान के महत्व को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वजों ने कई नियम बनाए थे। भारत में भी अनेकों परंपराएं ऐसी हैं जिन्हें लोग अंधविश्वास मानते है तो कुछ उनको निभाने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। ऐसी ही एक परंपरा है नदी में सिक्के डालना। दरअसल हमारे पूर्वज प्रकृति व उसके द्वारा उपहार में दी गई चीजों की पूजा करते थे। मसलन आग, हवा, पानी, पेड़-पौधे, सूर्य व चांद। पौराणिक नदियों को हमारे यहां देवी का मान दिया गया है। प्राचीन काल में चांदी व तांबे के सिक्कों का प्रचलन हुआ करता था। नदियों में स्नान-पूजन के बाद श्रद्धालु उसमें दान स्वरूप चांदी-तांबे के सिक्के डालते थे। नदियों के किनारे रहने वाले गरीब बच्चे उन्हें एकत्र करते थे। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार बहते पानी में चांदी का सिक्का डालने से चंद्रदोष का प्रभाव समाप्त होता है। यानि दान पुण्य के साथ ही दोष का भी अंत। अब जरा इसके दूसरे पहलू पर भी नजर डालिए। सभी जानते हैं कि तांबा व चांदी में जल को शुद्ध करने के तमाम गुण मौजूद हैं। नदियों की तलहटी में जमा रहने वाले चांदी-तांबा के सिक्के पानी के शुद्धीकरण का कार्य करते थे। समय बदला तो प्राचीन काल में चलने वाले सिक्के भी बदल गए। वर्तमान में भारत में गिलट के सिक्कों का प्रचलन है जो मिश्रित धातुओं का आकार है। उनमें ऐसा कोई खास गुण नहीं है जो जल के शुद्धीकरण में महती भूमिका निभा सके। अधिकतर बड़े बुजुर्ग अभी भी परंपरा को निभाते हुए मजबूरीवश प्रचलित सिक्के फेंकते हैं। कुछ दिनों पूर्व ही एक रिपोर्ट आई थी कि गंगा के पानी में आक्सीजन की मात्रा मानक से बहुत कम रह गई है। कुछ तटवर्ती इलाकों में अब गंगा का जल आचमन योग्य भी नहीं रह गया है। ऐसे में हम अगर एकजुट होकर अपनी परंपराओं का सहारा लें तो गंगाजल के शुद्धीकरण में अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। सिक्का न सही, धातु ही सही।
Wednesday, 2 March 2011
हर बरस एक मीटर नीचे
वाराणसी, जल ही जीवन है। इसके बिना आम आदमी ही नहीं पशु-पक्षी की जिंदगी के साथ हरे-भरे पेड़-पौधे की कल्पना करना भी बेमानी है। ऐसे में खासकर शहरी इलाके में पानी का स्तर हर साल एक मीटर नीचे भाग रहा है। आलम यह है कि नगर क्षेत्र में हैंडपंप जवाब देने लगे हैं। वहीं कूपों का पानी भी सतह पकड़ने लगा है जबकि गर्मी अभी आने को बाकी है। नगर क्षेत्र में भूजल की मापी के लिए 46 जगहों पर लगाए गए यंत्रों के जरिए बरसात के पहले और बाद की स्थिति में तेजी से बदलाव आने के संकेत मिले हैं। पिछले तीन साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि शहरी इलाके में बरसात के पहले पानी के लेबल का अधिकतम औसत क्रमश: 17, 18 व 19 मीटर तक पहुंच चुका है। इस तरह से एक मीटर तक नीचे गिरता जल स्तर खतरे की घंटी है। भूगर्भ जल विभाग के आंकड़े खुद ही इस बात की पुष्टि करते हैं कि शहरी सीमा से सटे जगतपुर व भिटारी की स्थिति कुछ ज्यादा ही भयावह है। वर्ष 2010 की रिपोर्ट में जगतपुर में बरसात के पहले पानी की अधिकतम गहराई 27 मीटर जबकि भिटारी में 25 मीटर तक दर्ज की गई है। शहर में पानी का अधिकतम औसत 19 मीटर तक रिकार्ड किया गया है। वहीं बरसात के बाद पानी का औसत 16 मीटर तक पहुंच गया। उधर, डॉक्टर कालोनी (पाण्डेयपुर) में पानी का न्यूनतम औसत छह मीटर तथा सराय में 2.5 मीटर तक होना पाया गया है
तालाबों व कुंडों की बदहाली गंभीर मामला
वाराणसी, नगर विकास विभाग के प्रमुख सचिव आलोक रंजन ने यहां के तालाबों व कुंडों की बदहाली को गंभीर बताया है। विभागीय मंत्री के साथ सोमवार को मंडलीय समीक्षा बैठक में हिस्सा लेने के बाद वह सर्किट हाउस में मीडिया से बातचीत कर रहे थे। यह बताने पर कि वाराणसी शहर में 65 तालाब व कुंड सरकारी अभिलेख में दर्ज हैं। इन जलाशयों की स्थिति बेहद खराब है। कहीं अवैध कब्जा तो बेइंतहा गंदगी है। इस बारे में न्यायालय के स्पष्ट निर्देश हैं लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है। इस पर प्रमुख सचिव ने कहा, ऐसा है तो बेहद गंभीर बात है। वह इसे खुद देखेंगे। गंगा में 18 नालों से गिर रहे कचरे के बारे में सवाल उठा तो रंजन ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि नालों के ऊपर जाली लगाई जाए ताकि गंदगी सीधे गंगा में न गिरे। यहां इसका पालन नहीं होने की आज जानकारी मिल रही है। इस बारे में नगर निगम प्रशासन से पूछताछ की जाएगी। फिर जो भी जिम्मेदार होगा उसे दंड मिलेगा। नगर निगम में तैनात कर्मचारियों से उनके मूल पद के विपरीत काम लेने संबंधी सवाल से किनारा काट लिया। प्रमुख सचिव ने बताया कि मलिन बस्तियों समेत शहर की सड़कों व गलियों की मुकम्मल सफाई मंडलीय समीक्षा का मुख्य एजेंडा है। समीक्षा का शुरू यह दौर थमेगा नहीं वरन आगे जारी रहेगा। मलिन बस्तियों का निरीक्षण : प्रमुख सचिव ने शाम को तीन मलिन बस्तियों का निरीक्षण भी किया। इसमें बड़ी मलदहिया, दयानगर व सेनपुरा मलिन बस्ती शामिल है। मलिन बस्तियों में सफाई व्यवस्था ठीक रखने में निगम का अमला जुटा रहा। सचिव ने इन बस्तियों में विकास कार्य पूरे करने, सफाई व पेयजल आपूर्ति की कमी दूर करने के निर्देश दिए। बड़ी मलदहिया बस्ती में छतिग्रस्त सुलभ शौचालय को तत्काल दुरुस्त कराया जाए। इस दौरान अपर नगर आयुक्त सच्चिदानंद सिंह व अधिशासी अभियंता उपेंद्रनाथ त्रिपाठी समेत अन्य अधिकारी भी मौजूद थे
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